Sunday, May 19, 2013

अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा- वीर नाथूराम गोडसे...



अखण्ड भारत के स्वप्नद्रष्टा- वीर नाथूराम गोडसे...

19 मई 1910 को मुम्बई - पुणे के बीच ' बारामती ' में संस्कारित राष्ट्रवादी हिन्दु परिवार मेँ जन्मेँ वीर नाथूराम गोडसे एक ऐसा नाम है जिसके सुनते ही लोगोँ के मन-मस्तिष्क मेँ एक ही विचार आता है कि गांधी का हत्यारा।
इतिहास मेँ भी गोडसे जैसे परम राष्ट्रभक्त बलिदानी का इतिहास एक ही पंक्ति मेँ समाप्त हो जाता है...
नाथूराम गोडसे एक विचारक, समाज सुधारक, पत्रकार एवं सच्चे राष्ट्रभक्त थे और गांधी का सम्मान करने वालोँ मेँ भी अग्रिम पंक्ति मेँ थे। किन्तु सत्ता परिवर्तन के पश्चात गांधीवाद मेँ जो परिवर्तन देखने को मिला, उससे नाथूराम ही नहीँ करीब-करीब सम्पूर्ण राष्ट्रवादी युवा वर्ग आहत था। गांधीजी इस देश के विभाजन के पक्ष मेँ नहीँ थे। उनके लिए ऐसे देश की कल्पना भी असम्भव थी, जो किसी एक धर्म के अनुयायियोँ का बसेरा हो। उन्होँने प्रतिज्ञापूर्ण घोषणा की थी कि भारत का विभाजन उनकी लाश पर होगा। परन्तु न तो वे विभाजन रोक सके, न नरसंहार का वह घिनौना ताण्डव, जिसने न जाने कितनोँ की अस्मत लूट ली, कितनोँ को बेघर किया और कितने सदा - सदा के लिए अपनोँ से बिछड गये।
खण्डित भारत का निर्माण गांधीजी की लाश पर नहीँ, अपितु 25 लाख हिन्दू और सिक्खोँ की लाशोँ तथा असंख्य माताओँ और बहनोँ के शीलहरण पर हुआ।
किसी भी महापुरुष के जीवन मेँ उसके सिद्धांतोँ और आदर्शो की मौत ही वास्तविक मौत होती है। जब लाखोँ माताओँ, बहनोँ के शीलहरण तथा रक्तपात और विश्व की सबसे बडी त्रासदी द्विराष्ट्रवाद के आधार पर पाकिस्तान का निर्माण हुआ। उस समय गांधी के लिए हिन्दुस्थान की जनता मेँ जबर्दस्त आक्रोश फैल चुका था। प्रायः प्रत्येक की जुबान पर एक ही बात थी कि गांधी मुसलमानोँ के सामने घुटने चुके है। रही - सही कसर पाकिस्तान को 55 करोड रुपये देने के लिए गांधी के अनशन ने पूरी कर दी। उस समय सारा देश गांधी का घोर विरोध कर रहा था और परमात्मा से उनकी मृत्यु की कामना कर रहा था।
जहाँ एक और गांधीजी पाकिस्तान को 55 करोड रुपया देने के लिए हठ कर अनशन पर बैठ गये थे, वही दूसरी और पाकिस्तानी सेना हिन्दू निर्वासितोँ को अनेक प्रकार की प्रताडना से शोषण कर रही थी, हिन्दुओँ का जगह - जगह कत्लेआम कर रही थी, माँ और बहनोँ की अस्मतेँ लूटी जा रही थी, बच्चोँ को जीवित भूमि मेँ दबाया जा रहा था। जिस समय भारतीय सेना उस जगह पहुँचती, उसे मिलती जगह - जगह अस्मत लुटा चुकी माँ - बहनेँ, टूटी पडी चुडियाँ, चप्पले और बच्चोँ के दबे होने की आवाजेँ।
ऐसे मेँ जब गांधीजी से अपनी जिद छोडने और अनशन तोडने का अनुरोध किया जाता तो गांधी का केवल एक ही जबाब होता- "चाहे मेरी जान ही क्योँ न चली जाए, लेकिन मैँ न तो अपने कदम पीछे करुँगा और न ही अनशन समाप्त करुगा।"
आखिर मेँ नाथूराम गोडसे का मन जब पाकिस्तानी अत्याचारोँ से ज्यादा ही व्यथित हो उठा तो मजबूरन उन्हेँ हथियार उठाना पडा। नाथूराम गोडसे ने इससे पहले कभी हथियार को हाथ नही लगाया था। 30 जनवरी 1948 को गोडसे ने जब गांधी पर गोली चलायी तो गांधी गिर गये। उनके इर्द-गिर्द उपस्थित लोगोँ ने गांधी को बाहोँ मेँ ले लिया। कुछ लोग नाथूराम गोडसे के पास पहुँचे। गोडसे ने उन्हेँ प्रेमपूर्वक अपना हथियार सौप दिया और अपने हाथ खडे कर दिये। गोडसे ने कोई प्रतिरोध नहीँ किया। गांधीवध के पश्चात उस समय समूची भीड मेँ एक ही स्थिर मस्तिष्क वाला व्यक्ति था, नाथूराम गोडसे। गिरफ्तार होने के बाद गोडसे ने डाँक्टर से शांत मस्तिष्क होने का सर्टिफिकेट मांगा, जो उन्हेँ मिला भी।
नाथूराम गोडसे ने न्यायालय के सम्मुख अपना पक्ष रखते हुए गांधी का वध करने के 150 कारण बताये थे। उन्होँने जज से आज्ञा प्राप्त कर ली थी कि वह अपने बयानोँ को पढकर सुनाना चाहते है। अतः उन्होँने वो बयान माइक पर पढकर सुनाए। लेकिन नेहरु सरकार ने (डर से) गोडसे के गांधी वध के कारणोँ पर रोक लगा दी जिससे वे बयान भारत की जनता के समक्ष न पहुँच पाये। गोडसे के उन क्रमबद्ध बयानोँ मेँ से कुछ बयान आपके समक्ष प्रस्तुत कर रहा जिससे आप जान सके कि गोडसे के बयानोँ पर नेहरु ने रोक क्योँ लगाई.?
तथा गांधी वध उचित था या अनुचित.??
दक्षिण अफ्रिका मेँ गांधीजी ने भारतियोँ के हितोँ की रक्षा के लिए बहुत अच्छे काम किये थे। लेकिन जब वे भारत लोटे तो उनकी मानसिकता व्यक्तिवादी हो चुकी थी। वे सही और गलत के स्वयंभू निर्णायक बन बैठे थे। यदि देश को उनका नेतृत्व चाहिये था तो उनकी अनमनीयता को स्वीकार करना भी उनकी बाध्यता थी। ऐसा न होने पर गांधी कांग्रेस की नीतियोँ से हटकर स्वयं अकेले खडे हो जाते थे। वे हर किसी निर्णय के खुद ही निर्णायक थे। सुभाष चन्द्र बोस कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर रहते हुए गांधी की नीति पर नहीँ चलेँ। फिर भी वे इतने लोकप्रिय हुए कि गांधीजी की इच्छा के विपरीत पट्टाभी सीतारमैया के विरोध मेँ प्रबल बहुमत से चुने गये। गांधी को दुःख हुआ, उन्होँने कहा की सुभाष की जीत गांधी की हार है। जिस समय तक सुभाष चन्द्र बोस को कांग्रेस की गद्दी से नहीँ उतारा गया तब तक गांधी का क्रोध शांत नहीँ हुआ ।
मुस्लिम लीग देश की शान्ति को भंग कर रही थी और हिन्दुओँ पर अत्याचार कर रही थी । कांग्रेस इन अत्याचारोँ को रोकने के लिए कुछ भी नहीँ करना चाहती थी, क्योकि वह मुसलमानोँ को खुश रखना चाहती थी।गांधी जिस बात को अनुकूल नहीँ पाते थे उसे दबा देते थे । इसलिए मुझे यह सुनकर आश्चर्य होता है की आजादी गांधी ने प्राप्त की । मेरा विचार है की मुसलमानोँ के आगे झुकना आजादी के लिए लडाई नहीँ थी। गांधी व उसके साथी सुभाष को नष्ट करना चाहते थे ।
श्री नाथूराम गोडसे व अन्य राष्ट्रवादी युवा गांधीजी की हठधर्मिता और मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति से क्षुब्ध थे, हिन्दुस्थान की जनता के दिलोँ मेँ गांधीजी के झूठे अहिँसावाद और नेतृत्व के प्रति घृणा पैदा हो चुकी थी।उस समय गांधीजी के चरित्र पर भी अंगुली उठ रही थी जिसके चलते वरिष्ठ नेता जे. बी. कृपलानी और वल्लभ भाई पटेल आदि नेताओँ ने उनसे दूरी बना ली। यहा तक की कई लोगोँ ने उनका आश्रम छोड दिया था। अब उससे आगे के बयान....
इस बात को तो मैँ सदा से बिना छिपाए कहता रहा हूँ कि मैँ गांधीजी के सिद्धांतोँ के विरोधी सिद्धांतोँ का प्रचार कर रहा हूँ। यह मेरा पूर्ण विश्वास रहा है कि अहिँसा का अत्याधिक प्रचार हिन्दू जाति को अत्यन्त निर्बल बना देगा और अंत मेँ यह जाति ऐसी भी नहीँ रहेगी कि वह दूसरी जातियोँ से, विशेषकर मुसलमानोँ के अत्याचारोँ का प्रतिरोध कर सके ।
हम लोग गांधीजी की अहिँसा के विरोधी ही नहीँ थे, प्रत्युत इस बात के अधिक विरोधी थे कि गांधीजी अपने कार्यो और विचारोँ मेँ मुस्लिमोँ का अनुचित पक्ष लेते थे और उनके सिद्धांतोँ व कार्यो से हिन्दू जाति की अधिकाधिक हानि हो रही थी।
मालाबार, नोआख्याली, पंजाब, बंगाल, सीमाप्रांत मेँ हिन्दुओँ पर अत्याधिक अत्याचार हुयेँ । जिसको मोपला विद्रोह के नाम से जाना जाता है । उसमेँ हिन्दुओँ की संपत्ति, धन व जीवन पर सबसे बडा हमला हुआ।हिन्दुओँ को बलपूर्वक मुसलमान बनाया गया, स्त्रियोँ के अपमान हुये । गांधीजी अपनी नीतियोँ के कारण इसके उत्तरदायी थे, मौन रहे । प्रत्युत यह कहना शुरु कर दिया कि मालाबार मेँ हिन्दुओँ को मुसलमान नहीँ बनाया गया ।यद्यपि उनके मुस्लिम मित्रोँ ने यह स्वीकार किया कि सैकडोँ घटनाऐँ हुई है। और उल्टे मोपला मुसलमानोँ के लिए फंड शुरु कर दिया ।
कांग्रेस ने गांधीजी को सम्मान देने के लिए चरखे वाले ध्वज को राष्ट्रीय ध्वज बनाया। प्रत्येक अधिवेशन मेँ प्रचुर मात्रा मेँ ये ध्वज लगाये जाते थे । इस ध्वज के साथ कांग्रेस का अति घनिष्ट सम्बन्ध था। नोआख्याली के 1946 के दंगोँ के बाद वह ध्वज गांधीजी की कुटिया पर भी लहरा रहा था, परन्तु जब एक मुसलमान को ध्वज के लहराने पर आपत्ति हुई तो गांधी ने तत्काल उसे उतरवा दिया। इस प्रकार लाखोँ - करोडोँ देशवासियोँ की इस ध्वज के प्रति श्रद्धा को गांधी ने अपमानित किया। केवल इसलिए की ध्वज को उतारने से एक मुसलमान खुश होता था।
कश्मीर के विषय मेँ गांधी हमेशा यह कहते रहे की सत्ता शेख अब्दुल्ला को सौप दी जाये, केवल इसलिए की कश्मीर मेँ मुस्लिम है। इसलिए गांधीजी का मत था कि महाराजा हरिसिँह को संन्यास लेकर काशी चले जाना चाहिए, परन्तु हैदराबाद के विषय मेँ गांधी की नीति भिन्न थी । यद्यपि वहाँ हिन्दूओँ की जनसंख्या अधिक थी, परन्तु गांधीजी ने कभी नहीँ कहा की निजाम फकीरी लेकर मक्का चला जायेँ ।
जब खिलापत आंदोलन असफल हो गया तो मुसलमानोँ को बहुत निराशा हुई और अपना क्रोध हिन्दुओँ पर उतारा । गांधीजी ने गुप्त रुप से अफगानिस्तान के अमीर को भारत पर आक्रमण करने का निमन्त्रण दिया, जो गांधीजी के लेख के इस अंश से सिद्ध हो जाता है - "मैँ नही समझता कि जैसे खबर फैली है, अली भाईयोँ को क्योँ जेल मेँ डाला जायेगा और मैँ क्योँ आजाद रहूँगा? उन्होँने ऐसा कोई कार्य नही किया है जो मैँ न करु।यदि उन्होँने अमीर अफगानिस्तान को आक्रमण के लिए संदेश भेजा है, तो मैँ भी उनके पास संदेश भेज दूँगा कि जब वो भारत आयेँगे तो जहाँ तक मेरा बस चलेगा एक भी भारतवासी उनको हिन्द से निकालने मेँ सरकार की सहायता नहीँ करेगा।"
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए गांधी ने एक मुसलमान के द्वारा भूषण कवि के विरुद्ध पत्र लिखने पर उनकी अमर रचना शिवबवनी पर रोक लगवा दी, जबकि गांधी ने कभी भी भूषण का काव्य या शिवाजी की जीवनी नहीँ पढी। शिवबवनी 52 छंदोँ का एक संग्रह है जिसमेँ शिवाजी महाराज की प्रशंसा की गयी है । इसके एक छंद मेँ कहा गया है कि अगर शिवाजी न होते तो सारा देश मुसलमान हो जाता । गांधीजी को ज्ञात हुआ कि मुसलमान वन्देमातरम् पसंद नही करते तो जहाँ तक सम्भव हो सका गांधीजी ने उसे बंद करा दिया ।
राष्ट्रभाषा के विषय पर जिस तरह से गांधी ने मुसलमानोँ का अनुचित पक्ष लिया उससे उनकी मुस्लिम समर्थक नीति का भ्रष्ट रुप प्रगट होता था । किसी भी दृष्टि से देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि इस देश की राष्ट्रभाषा बनने का अधिकार हिन्दी को है । गांधीजी ने अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत मेँ हिन्दी को बहुत प्रोत्साहन दिया। लेकिन जैसे ही उन्हेँ पता चला कि मुसलमान इसे पसन्द नही करते, तो वे उन्हेँ खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी का प्रचार करने लगे । बादशाह राम, बेगम सीता और मौलवी वशिष्ठ जैसे नामोँ का प्रयोग होने लगा। मुसलमानोँ को खुश करने के लिए हिन्दुस्तानी (हिन्दी और उर्दु का वर्ण संकर रुप) स्कूलोँ मेँ पढाई जाने लगी। इसी अवधारणा से मुस्लिम तुष्टिकरण का जन्म हुआ जिसके मूल से ही पाकिस्तान का निर्माण हुआ है ।
गांधीजी का हिन्दू मुस्लिम एकता का सिद्धांत तो उसी समय नष्ट हो गया जिस समय पाकिस्तान बना। प्रारम्भ से ही मुस्लिम लीग का मत था कि भारत एक देश नही है। हिन्दू तो गांधी के परामर्श पर चलते रहे किन्तु मुसलमानोँ ने गांधी की तरफ ध्यान नही दिया और अपने व्यवहार से वे सदा हिन्दुओँ का अपमान तथा अहित करते रहे। अंत मेँ देश का दो टुकडोँ मेँ विभाजन हो गया और भारत का एक तिहाई हिस्सा विदेशियोँ की भूमि बन गया।
32 वर्षो से गांधीजी मुसलमानोँ के पक्ष मेँ कार्य कर रहे थे और अंत मेँ उन्होँने जो पाकिस्तान को 55 करोड रुपये दिलाने के लिए धूर्ततापूर्ण अनशन करने का निश्चय किया, इन बातोँ ने मुझे गांधी वध करने का निर्णय लेने के लिए विवश कर दिया। 30 जनवरी 1948 को बिडला भवन की प्रार्थना सभा मेँ देश की रक्षा के लिए मैने गांधी को गोली मार दी।
वास्तव मेँ मेरे जीवन का उसी समय अन्त हो गया था जब मैने गांधी वध का निर्णय लिया था। गांधी और मेरे जीवन के सिद्धांत एक है, हम दोनोँ ही इस देश के लिए जीये, गांधीजी ने उन सिद्धांतोँ पर चलकर अपने जीवन का रास्ता बनाया और मैने अपनी मौत का। गांधी वध के पश्चात मैँ समाधि मेँ हूँ और अनासक्त जीवन बिता रहा हूँ।
मैँ मानता हूँ कि गांधीजी एक सोच है, एक संत है, एक मान्यता है और उन्होँने देश के लिए बहुत कष्ट उठाए। जिसके कारण मैँ उनकी सेवा के प्रति एवं उनके प्रति नतमस्तक हूँ, लेकिन इस देश के सेवक को भी जनता को धोखा देकर मातृभूमि के विभाजन का अधिकार नही था। किसी का वध करना हमारे धर्म मेँ पाप है, मै जानता हूँ कि इतिहास मेँ मुझे अपराधी समझा जायेगा लेकिन हिन्दुस्थान को संगठित करने के लिए गांधी वध आवश्यक था । मैँ किसी प्रकार की दया नही चाहता हँ । मैँ यह भी नही चाहता कि मेरी ओर से कोई और दया की याचना करेँ ।
यदि देशभक्ति पाप है तो मैँ स्वीकार करता हूँ कि यह पाप मैने किया है ।यदि पुण्य है तो उससे उत्पन्न पुण्य पर मेरा नम्र अधिकार है। मुझे विश्वास है कि मनुष्योँ के द्वारा स्थापित न्यायालय के ऊपर कोई न्यायालय हो तो उसमेँ मेरे काम को अपराध नही माना जायेगा । मैने देश और जाति की भलाई के लिए यह काम किया! मैने उस व्यक्ति पर गोली चलाई जिसकी नीतियोँ के कारण हिन्दुओँ पर घोर संकट आये और हिन्दू नष्ट हुए!!
मेरा विश्वास अडिग है कि मेरा कार्य 'नीति की दृष्टि' से पूर्णतया उचित है। मुझे इस बात मेँ लेश मात्र भी सन्देह नही की भविष्य मेँ किसी समय सच्चे इतिहासकार इतिहास लिखेँगे तो वे मेरे कार्य को उचित आंकेगे।
मोहनदास गांधीजी की हत्या करने के कारण नाथूराम गोडसेजी एवँ उनके मित्र नारायण आपटेजी को फाँसी की सजा सुनाई गई थी। न्यायालय मेँ जब गोडसे को फाँसी की सजा सुनाई गई तो पुरुषोँ के बाजू फडक रहे थे, और स्त्रियोँ की आँखोँ मेँ आँसू थे। नाथूराम गोडसे व नारायण आपटे को 15 नवम्बर 1949 को अम्बाला (हरियाणा) मेँ फासी दी गई। फाँसी दिये जाने से कुछ ही समय पहले नाथूराम गोडसे ने अपने भाई दत्तात्रेय को हिदायत देते हुए कहा था, कि
"मेरी अस्थियाँ पवित्र सिन्धू नदी मेँ ही उस समय प्रवाहित करना जब सिन्धू नदी एक स्वतन्त्र नदी के रुप मेँ भारत के झंडे तले बहने लगे, भले ही इसमेँ कितने भी वर्ष लग जायेँ, कितनी ही पीढियाँ जन्म लेँ, लेकिन तब तक मेरी अस्थियाँ विसर्जित न करना ।"
श्रीनाथूराम गोडसे ने तो न्यायालय से भी अपनी अन्तिम इच्छा मेँ सिर्फ यही माँगा था - " हिन्दुस्थान की सभी नदियाँ अपवित्र हो चुकी है, अतः मेरी अस्थियोँ को पवित्र सिन्धू नदी मेँ प्रवाहित कराया जाए ।"
वीर नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे ने वन्दे मातरम् का उद्घोष करते हुये फाँसी के फंदे को अखण्ड भारत का स्वप्न देखते हुये चूमा और देश के लिए आत्म बलिदान दे दिया ।
नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे के अन्तिम संस्कार के बाद उनकी अंतिम इच्छा को पूर्ण करना तो दूर उनकी राख भी उनके परिवार वालोँ को नहीँ सौँपी गई थी । जेल अधिकारियोँ ने अस्थियोँ और राख से भरा मटका रेलवे पुल के ऊपर से घग्गर मेँ फेँक दिया था । दोपहर बाद मेँ उन्ही जेल कर्मचारियोँ मेँ से किसी ने बाजार मेँ जाकर यह बात एक दुकानदार को बताई, उस दुकानदार ने तत्काल यह सूचना स्थानीय हिन्दू महासभा कार्यकर्ता इन्द्रसेन शर्मा तक पहुँचाई ।इन्द्रसेन उस समय ' द ट्रिब्यून ' के कर्मचारी भी थे। इन्द्रसेन तत्काल अपने दो मित्रोँ को साथ लेकर दुकानदार द्वारा बताये गये स्थान पर पहुँचेँ । उन दिनोँ घग्गर नदी मेँउस स्थान पर बहुत ही कम पानी था । उन्होँने वह मटका वहाँ से सुरक्षित निकालकर प्रोफेसर ओमप्रकाश कोहल को सौप दिया, जिन्होँने आगे उसे डाँ. एल वी परांजये को नासिक मेँ ले जाकर सुपुर्द किया। उसके पश्चात वह अस्थिकलश 1965 मेँ नाथूराम गोडसे के छोटे भाई गोपाल गोडसे तक पहुँचाया गया, जब वे जेल से रिहा हुए । वर्तमान मेँ यह अस्थिकलश पूना मेँ उनके निवास पर उनकी अंतिम इच्छा पूरी होने की प्रतिक्षा मेँ रखा हुआ है।
15 नवम्बर 1950 से अभी तक प्रत्येक 15 नवम्बर को महात्मा गोडसे का "शहीद दिवस" मनाया जाता है।
मेरा यह लेख लिखने का उद्देश्य किसी की भावनाओँ को ठेस पहुँचाना नहीँ, बल्कि उस सच को उजागर करना है, जिसे अभी तक इतिहासकार और भारत सरकार अनदेखा करती रही है।

वन्दे मातरम्..
जय हिंद...जय भारत....

Monday, April 1, 2013

इन 50 प्रश्नों के उत्तर दीजिए .. क्यों..??



सलारगाजी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलात्कारी, मूर्ती भंजक दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है।


हिन्दू हमेशा से अज्ञानता के अन्धकार में लिप्त रहा है,वो मजारो को पूजता है चाहे वो किसी हत्यारे की क्यों न हो.
इसका जीता-जागता उदाहरण पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक शहर बहराइच है।
बहराइच में हिन्दू समाज का सबसे मुख्य पूजा स्थल है गाजी बाबा की मजार।
मूर्ख हिंदू लाखों रूपये हर वर्ष इस पीर पर चढाते है। इतिहास को जानने वाला हर व्यक्ति यह जानता है कि महमूद गजनवी के भारत को १७ बार लूटने व बर्बाद करने के कुछ समय बाद उसका भांजा सलार गाजी भारत को दारूल इस्लाम बनाने के उद्देश्य से भारत पर आक्रान्ता बन कर आया था ।
महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर में भयानक मार काट के बाद मंदिर में लूटा गया धन इसी सालार गाजी की निगरानी में गजनी ले जाया गया था. सन 1030 में जब महमूद गजनवी की मृत्यु हो गई, तो सालार गाजी गजनी का बादशाह हुआ. बाद में 1040 में तुर्को ने गजनी को जीत लिया और सालार गाजी भारत की ओर भागा. उसे अपने इसी चारागाह की याद आई, जिसमें उसने अपने पिता के साथ बिना किसी खास रोक-टोक के लूटपाट , मारकाट की थी. यह याद आते ही सालार मसूद गाजी ने भारत में मारकाट और लूटपाट के साथ प्रवेश किया वह पंजाब ,सिंध, आज के उत्तर प्रदेश को रोंद्ता हुआ बहराइच तक आ पहुँचा था । रास्ते में उसने लाखों हिन्दुओं का कत्लेआम किया, लाखों हिंदू औरतों के साथ बलात्कार हुए, हजारों मन्दिर तोड़ डाले गए ।
राह में उसे एक भी ऐसा हिन्दू वीर नही मिला जो उसका मान मर्दन कर सके। इस्लाम की जेहाद की आंधी को रोक सके। परंतु बहराइच के राजा सुहेल देव पासी ने उसको थामने का बीडा उठाया । वे अपनी सेना के साथ सलार गाजी के हत्याकांड को रोकने के लिए जा पहुंचे । महाराजा व हिन्दू वीरों ने सलार गाजी व उसकी दानवी सेना को मूली गाजर की तरह काट डाला । सलार गाजी मारा गया। उसकी भागती सेना के एक एक हत्यारे को काट डाला गया। हिंदू ह्रदय राजा सुहेल देव पासी ने अपने धर्म का पालन करते हुए, सलार गाजी को इस्लाम के अनुसार कब्र में दफ़न करा दिया। कुछ समय पश्चात् जब दिल्ली पर तुगलक वंश के आने पर फिरोजशाह तुगलक ने सलारगाजी को इस्लाम का सच्चा संत सिपाही घोषित करते हुए उसकी मजार बनवा दी।

आज उसी हिन्दुओं के हत्यारे, हिंदू औरतों के बलात्कारी, मूर्ती भंजक दानव को हिंदू समाज एक देवता की तरह पूजता है। सलार गाजी हिन्दुओं का गाजी बाबा हो गया है। कितने दुर्भाग्य की बात है की हिंदू वीर शिरोमणि सुहेल देव पासी सिर्फ़ पासी समाज के हीरो बनकर रह गएँ है। और सलार गाजी हिन्दुओं का भगवान बनकर हिन्दू समाज में पूजनीय हो गया है। अब ऐसे हरामखोर हिन्दुओ को जो गाजी की मजार पूजने वाले, क्या कहे? जो आज उसी गाजी मियां को हिन्दु अपना कुल देवता बनाकर पूज रहें हैं. जो उन्हीं को काटने चला था. अगर वह जिन्दा होकर उठ सकता, तो अपनी कब्र पूजने वाले काफ़िर हिन्दुओं का सिर धड़ से अलग कर देता. आज गाजीमियां की तो हिन्दु धूमधाम से पूजा कर रहा है, जो उन्हें काटने आया था. लेकिन सालार मसूद गाजी को मारकर हिन्दुओं को कटने से बचाने वाले सुहेलदेव पासी का कोई नाम तक नही जानता. तैंतीस करोड़ देवताओं में क्या ऐसा कोई भी काबिल देवता था जिसे ऐसे मूर्ख हिन्दु अपना कुल देवता बना सकते? संसार में इससे बड़ी धार्मिक अनुशासनहीनता और मूर्खता का उदाहरण आपको नही मिलेगा. इस गाजी पूजा को हिन्दु-मुस्लिम एकता का बेजोड़ उदाहरण बताया जाता है. एक और मुर्खता का उदाहरण देखिये गाजी मियाँ की दरगाह पर 'जेठ मेला' की धूम देखने लायक होती है। सालार गाजी मियाँ की मजार पर हर साल जेठ में बारात भी उठती है। बिल्कुल हिंदू बारातों की तर्ज पर गाजे-बाजे के साथ उठने वाली इस बारात की धूम देखने लायक होती है।

भारत में मूर्ति भंजक के रूप में विख्यात महमूद गजनवी के भाँजे गाजी मियाँ के मुरीदों में 90 फीसदी हिंदू हैं। पूरब के जिलों के गाजी मियाँ के ये भक्त बाकायदा झंडे लेकर जेठ मेले में आते हैं। उनका विवाह नहीं हुआ था इसीलिए हर साल इनकी बारात उठती है। यहाँ इतना चढ़ावा आता है कि साल भर तक गिनती की जाती है। जेठ मेले के अलावा साल में चार बार गाजी मियाँ की दरगाह पर मेला लगता है।
आज अगर किसी मन्दिर के पास में कोई मजार है, तो हिन्दु मंदिर में कम, मजार में अधिक जायेंगे. इसके पीछे आज के हिन्दुओं के धर्म में सच्चाई, त्याग, वीरता, उत्साह और साहस के स्थान पर, स्वार्थ तथा लालच पैदा करने वाली झूठे चमत्कारों वाली कथायें हैं. हिन्दु बचपन से लेकर बूढे होने तक चमत्कारों की झूठी कहानियाँ सुनता रहता है. इसलिये वह ऐसे ही चमत्कारों को देखने की इच्छा लेकर बाबाओं, कब्रों, मज़ारों या दरगाहों में भटकता रहता है. जहाँ हाथ की सफ़ाई या चेलों द्वारा किये जा रहे नाटक से प्रभावित होकर ठगा जाता है.


अब ज़रा गाजी शब्द का अर्थ भी समझले तो आपको समझ में आयेगा की यह शब्द कितना हिन्दू विरोधी है
गाजी शब्द का अर्थ होता है वह मुस्लिम जिसने इस्लाम धर्म के प्रचार के रास्ते में आने वाले हर काफ़िर(हिन्दू ) को मिटा दिया हो या सीधे सीधे जिसने हिन्दुओ का क़त्ल करके हिंदुत्व को ही मिटाने का महान काम किया हो. काफ़िर को ईमानवाला बनाने में सफलता कैसे मिली इन गाजियों को, सीधे सीधे नरसंहार किया जाता रहा है, बाबर को भी गाजी की अपाधि दी गयी जिसने अवध के सबसे बड़े अयोध्या के भव्य राम मदिर को हिन्दुओ के नरसंहार के साथ ही मिटा दिया था और इस्लामिक राज्य स्थापित किया था. इसी तरह के सभी गाजी बाबा की मजार पर हिंदू अपने को समृद्ध करने की दुआ मागने जाता है, यही सच्चाई है, इसे जो नकारे. या तो उसे कुछ भी नहीं मालूम है या वह मजबूरी में झूठ बोल रहा है.
इसीलिए हिन्दुओं को इन आक्रान्ताओं मुस्लिमो की मजार पर नहीं जाना चाहिए; इसलिए नहीं की कोई भी मुस्लिम हिंदू मंदिरों में नहीं जाता है हिन्दुओ का दिया हुआ प्रसाद नहीं खाता है, उसका कारन बहुत ही स्पष्ट और सीधा है. कोई भी मुस्लिम कभी भी धर्म पर बहस क्यों नहीं करता है, उसके बहुत गुढ़ रहस्य हैं.

जिन मुस्लिमो की मज़ार पर हिंदू जाते हैं वे असली ईमान वाले मुस्लिम रहे थे उन्होंने इस्लाम को अक्षरसः माना था. और उनका एक ही ध्येय था साम-दाम-दंड-भेद से हर काफ़िर (मुख्यतः हिंदू) को येन-केन प्रकारेण मुसलमान बनाना था और यदि इतने पर भी उसकी बुद्धि नहीं खुलती है तो उसे क़त्ल कर दो तथा उसकी संपत्ति और औरतो को लुट लो. जिस आदमी ने जीतेजी सनातनियो (हिन्दुओ) के भले के बारे न सोचकर सिर्फ उसे मिटाने के बारे में ही सोचा, मरने के बाद उसका आशीर्वाद भला कैसे देगा.

इन्ही सच्चाइयो की वजह से हिन्दुओ को कभी भी किसी मुस्लिम की मजार पर नहीं जाना चाहिए क्योकि यदि वह हिंदू परिवार हिंदू बचा रह पाया तो अपने स्वाभिमानी पुरखो के शौर्य के बल पर और उस हिंदू को अपने इन महान पुरखो की समाधी पर जाकर उनकी पूजा करनी चाहिए नाकि उसके पुरखो को मिटाने वाले जेहादी मुस्लिमो की मजार पर शीश नवाना चाहिए.

यदि आप शिक्षित हैं तो शिक्षित होने के लक्षण भी दिखाएँ. और यदि आप ऊपर में लिखी किसी भी बात से असहमत हैं तो उसे अवश्य ही व्यक्त करे जिससे की गलत फहमी का निराकरण किया जा सके. धार्मिक विद्वानों की भी मदद लिया जा सकता है. अपनी टिप्पणी जरुर देवें.
 

इस्लामाबाद, पाकिस्तान में फ़िर एक बार हिंदू मंदिर को निशाना बनाया गया है।

इस्लामाबाद, पाकिस्तान में फ़िर एक बार हिंदू मंदिर को निशाना बनाया गया है।(Source: IBTL)
पेशावर शहर स्थित ऐतिहासिक हिंदू मंदिर पर रविवार की शाम अज्ञात लोगों ने हमला किया और उसे तहस नहस कर डाला। गोरखनाथ मंदिर के नाम से मशहूर 160 साल पुराने इस मंदिर को पेशावर हाई कोर्ट के आदेश पर तीस सालों बाद पिछले ही साल फिर से खोला गया था। देश के विभाजन के बाद से तब तक यह मंदिर बंद पड़ा था।

पुलिस ने बताया कि हमलावरों ने मंदिर में लगी तस्वीरों को जला दिया और मंदिर के अंदर स्थापित शिवलिंग को क्षतिग्रस्त कर दिया। वे गोर गथरी इलाके के पुरातात्विक परिसर में स्थित इस मंदिर की कुछ मूर्तियां भी उठा ले गए। मंदिर के संरक्षक ने मीडिया को बताया कि पिछले दो महीने में मंदिर पर यह तीसरा हमला है। उसने अनुसार, शाम साढ़े छह बजे जब वह मंदिर पहुंचा तो मंदिर के अंदर आठ लोगों का एक समूह था। उन लोगों ने भागने से पहले मंदिर में लगी तस्वीरें और धार्मिक पुस्तकें जला दीं। इसके बाद अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय के लोग मंदिर पर पहुंचे।


टीवी फुटेज में जले हुए कागज और फर्श पर बिखरे बर्तन दिखाई दे रहे हैं। पुलिस अधिकारियों ने मंदिर के अंदर जाकर जांच की। हिंदू नेताओं ने पुलिस से मंदिर की पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था करने का आग्रह किया है ताकि ऐसी घटनाएं रोकी जा सकें। पाकिस्तान में हिंदूओ पर आये दिन इस तरह के अत्याचार होते रहते है। बहुत बार हिंदू मंदिरों को निशाना बनाकर उसकी तोडफ़ोड की जाती है। हिंदू लडकियों का अपहरण कर के उनका जबरन धर्मपरिवर्तन कराया जाता है।

हाल ही में रिंकल कुमारी नामक लडकी के जबरन धर्मपरिवर्तन की घटना सामने आयी थी। दुर्भाग्य की बात ये है कि हिंदूओ के साथ हो रही इस नाइंसाफ़ी को स्थानिक प्रशासन और पाकिस्तान सरकार अनदेखा कर रही है।