श्रीपादावधूत की कलम से
*शाब्दिक सुबह*
*अर्थपूर्ण दिवस*
*यूनेस्को के अनुसार भाषा मात्र संपर्क, शिक्षा या विकास का माध्यम न होकर व्यक्ति की विशिष्ट पहचान और उसकी संस्कृति, परंपरा एवं इतिहास का भंडार है। इसके साथ ही सांस्कृतिक मूल्यों की विरासत को संजोने का कार्य भी मातृभाषा ही करती है। मातृभाषा का महत्व धर्म जाति पंथ संप्रदाय आदि से भी अधिक है। जब कहीं कोई भाषा विलुप्त होती है तो उसके साथ एक संस्कृति और परंपरा भी विलुप्त हो जाती है।*
भारत अपनी भाषाई विविधता के कारण अनेक देशों का एक देश प्रतीत होता हैं। लगभग एक सहस्त्र वर्ष की अवधि के बाद पराधीनता के कारण भारत में समय-समय पर विविध भाषाओं का प्रसार होता रहा।
*वस्तुतः " यदि किसी जाति, धर्म अथवा देश को पराधीन रखना है तो उसके साहित्य को नष्ट कर देना चाहिए, वह स्वयं नष्ट हो जायेगा।"*
इस बात को ध्यान में रखते हुए *विदेशियों द्वारा हमारी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य पर निरन्तर कुठाराघात होता रहा। साधारण आदमी कभी-कभी आत्म-बल की कमी के कारण, तो कभी उदर पालन की समस्याओं के कारण उनसे टक्कर लेने में असमर्थ रहा और उन्हीं के रंग में उसने अपने को रंग लिया।*
*भारत की संस्कृति एवं विरासत को अगर किसी भाषा ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है तो वह निश्चित रूप से अंग्रेजी है। फिर भी हर एक भाषा की अपनी एक पहचान अपनी एक विशेषता होती है जिसके शब्दों से विशिष्टता झलकती है तो आज हम इसे अंग्रेजी भाषा के कुछ शब्दों के माध्यम से अंग्रेजी भाषा को जानने का प्रयास करेंगे।*
अंग्रेजी भाषा में प्रेम की अभिव्यक्ति या परस्पर प्रेम अनुभूति के लिए इन तीन शब्दों का प्रयोग किया जाता है .......
1. *Boyfriend*
2. *Girlfriend*
3. *Family*
किन्तु एक बात ध्यान देने वाली है कि .....
*Boyfriend* और
*Girlfriend*
इन दो शब्दों के अन्तिम तीन अल्फाबेट है *end*
इसलिये ये सम्बन्ध एक ना एक दिन ख़त्म हो जाते हैं ।
परन्तु .....
तीसरा शब्द है :
*FAMILY* = *FAM* + *ILY*
जिसके पहले तीन अल्फाबेट से बनता है :
*FAM* = *Father* And *Mother*
और अन्तिम तीन अल्फाबेट से :
*ILY* = *I Love You*
अत: जिस शब्द का आरम्भ पिता एंव माता से और अन्त प्यार के साथ हो, *वह शब्द सही अर्थों में परिवार है !!!*
*यही परिवार भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा का प्रतीक रहा है अंग्रेजी भाषा में तो केवल शब्दों के माध्यम से इसे समझाने का प्रयास किया है लेकिन भारत ने इसे अपने दैनंदिन व्यवहार में उतारकर जीवन जीने का एक आदर्श दृष्टिकोण समाज में स्थापित किया है।*
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त
