*बांगरू बाण*
*श्रीपादावधूत की कलम से*
*राम..!*
*ये राम का देश है। यहां कण कण में राम हैं।* भाव की हर हिलोर में राम हैं। कर्म के हर छोर में राम हैं। राम यत्र-तत्र हैं। राम सर्वत्र हैं। जिसमें रम गए वही राम है। यहां सबके अपने-अपने राम हैं। *वाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है*। *भवभूति के राम दोनों से अलग हैं।* *कबीर ने राम को जाना। तुलसी ने माना। निराला ने बखाना।* राम एक ही हैं पर दृष्टि सबकी भिन्न। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यवत्ता और संयम का नाम है राम। आप ईश्वरवादी भले ही न हो, तो भी घर-घर में राम की गहरी व्याप्ति से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम तो मानना ही पड़ेगा। स्थितप्रज्ञ, असंम्पृक्त, अनासक्त। *एक ऐसा लोक नायक, जिसमें सत्ता के प्रति निरासक्ति का भाव है। जो जिस सत्ता का पालक है, उसी को छोड़ने के लिए सदा तैयार है।*
*राम हमारे देश की उत्तर दक्षिण एकता के अकेले सूत्रधार है*। *कबीर राम को परम ब्रह्म मानते है। “कस्तूरी कुण्डल बले मृग ढूँढे बन माही ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाहीं “*
हमारे *राम लोकंकमंगलकारी है*। *मर्यादा पुरूषोत्तम है*। राम का आदर्श, लक्ष्मण रेखा की मर्यादा है। लांघी तो अनर्थ। सीमा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन। *राम जाति वर्ग से परे है। नर, वानर, आदिवासी, पशु, मानव, दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता है।* *अगड़े पिछड़े से ऊपर निषादराज हों या सुग्रीव, शबरी हों या जटायु, सभी को साथ ले चलने वाले वे अकेले देवता हैं। भरत के लिए आदर्श भाई। हनुमान के लिए स्वामी। प्रजा के लिए नीतिकुशल न्यायप्रिय राजा हैं।* परिवार नाम की संस्था में उन्होंने नए संस्कार जोड़े। पति पत्नी के प्रेम की नई परिभाषा दी। ऐसे वक्त जब खुद उनके पिता ने तीन विवाह किए थे। पर राम ने अपनी दृष्टि सिर्फ एक महिला तक सीमित रखी। उस निगाह से किसी दूसरी महिला को कभी देखा नहीं। जब सीता का अपहरण हुआ वे व्याकुल थे। रो-रो कर पेड़, पौधे, पहाड़ से उनका पता पूछ रहे थे। *अपरिमित असीमित सामर्थ्य शक्ति से अहंकार का एक खास रिश्ता हो जाता है। पर उनमें अंहकार छू तक नही गया था। यही वजह है कि अपार शक्ति के बावजूद राम मनमाने फैसले नहीं लेते थे। वे लोकतांत्रिक हैं। सामूहिकता को समर्पित विधान की मर्यादा जानते हैं*। धर्म और व्यवहार की मर्यादा भी और परिवार का बंधन भी। *नर हो या वानर इन सबके प्रति वे अपने कर्तव्यबोध पर सजग रहते हैं। वे मानवीय करुणा जानते हैं। वे मानते हैं- परहित सरिस धर्म नहीं भाई।*
*राम* का अर्थ है *‘प्रकाश’*। किरण एवं आभा (कांति) जैसे शब्दों के मूल में राम है। *‘रा’ का अर्थ है आभा* और *‘म’ का अर्थ है मैं; मेरा और मैं स्वयं।* राम का अर्थ है मेरे भीतर प्रकाश, मेरे ह्रदय में प्रकाश। निश्चय ही ‘राम’ ईश्वर का नाम है,
राम शब्द में दो अर्थ व्यंजित हैं,*सुखद होना..! और ठहर जाना..!!*
*राम शब्द की व्युत्पत्ति*
*राम शब्द* संस्कृत के दो धातुओं, *रम् और घम* से बना है। *रम् का अर्थ है रमना या निहित होना* और *घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान।* इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, *“रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते”* अर्थात, *योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं।*
*'राम' ही मात्र एक ऐसे विषय हैं, जो योगियों की आध्यात्मिक-मानसिक भूख हैं, भोजन हैं, हर्ष, आनन्द और उल्लास के मूल स्त्रोत हैं।*
*पुराण अनुसार राम नाम का अर्थ*
*ब्रह्मवैवर्त पुराण* को सबसे प्राचीनतम पुराण माना जाता हैं। राधा रानी कहती हैं -
*राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचक:।*
*विश्वानामीश्वरो यो हि तेन राम: प्रकीर्तत:।।*
*" रा " शब्द विश्ववाचक* है और *"म " शब्द ईश्वरवाचक* है, इसलिए जो *विश्व का ईश्वर* है , उसे *" राम "* कहा जाता है।
इसके अतिरिक्त *अग्नि पुराण , शिव पुराण , विष्णु पुराण, पद्म पुराण , स्कंद पुराण एवं भागवत पुराण आदि में राम जी की महिमा का वर्णन है ।*
*भगवान शिव पद्म पुराण में मां पार्वती जी से कहते हैं* -
*राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।*
*सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।*
सुमुखी ! मैं तो राम ! राम ! राम ! इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्री राम नाम में ही निरंतर रमण करता हूं । राम नाम संपूर्ण सहस्रनाम के समान है ।
*राम नाम का उपनिषदों में वर्णन*
प्रभु श्री राम के अनंत महिमा का वर्णन पुराणों के साथ साथ उपनिषदों में भी हैं। जैसे - *महोपनिषद , भिक्षुकोपनिषद , पैंगलोपनिषद , शांडिल्योपनिषद तथा योगशिखोपनिषद* । इतना ही नहीं, *प्रभु श्री राम के नाम से 2 उपनिषद (रामरहस्योपनिषद और श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद)* का नाम भी राम नाम से प्रारंभ होता है
*रामरहस्योपनिषद* के अनुसार सभी पुराणों, शास्त्रों, चारों विद्याओं और आध्यात्मिक दर्शन का मूल तत्व प्रभु श्रीराम को माना गया है। इस नाम का प्रताप इतना विशाल हैं कि *आदि कवि महर्षि वाल्मीकि* जी उल्टा राम नाम (मरा- मरा) जप कर भी पवित्र हो गए।
*अपने मार्ग से भटका हुआ कोई क्लांत पथिक किसी सुरम्य स्थान को देखकर ठहर जाता है। उसी ठहराव का नाम राम है क्योंकि उसमें विराम है, आराम है, विश्राम है।*
*अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं*
*'राम-राम' शब्द* जब भी अभिवादन करते समय बोला जाता है तो हमेशा 2 बार बोला जाता है। इसके पीछे एक वैदिक दृष्टिकोण माना जाता है। वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार *पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है।* वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है, क्योंकि *हिंदी वर्णमाला में ''र" 27वां अक्षर है।* *'आ' की मात्रा 2रा अक्षर और 'म' 25 वां अक्षर*, इसलिए सब मिलाकर जो योग बनता है वो है *27 + 2 + 25 = 54,* अर्थात *एक “राम” का योग 54* हुआ। और *2 बार राम राम कहने से 108* हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है। जब भी हम कोई जाप करते हैं तो हमे 108 बार जाप करने के लिए कहा जाता है।
*108 का वैज्ञानिक महत्व*
यहां हम अगर *वैज्ञानिक तथ्य की बात करें तो 108 मनके की माला और सूर्य की कलाओं का एक दूसरे से संबंध माना गया है।* वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार *1 वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता हैं।* इसमें वह 6 माह उत्तरायण रहता है और 6 माह दक्षिणायन रहता है। इस तरह से *6 माह में सूर्य की कलाएं 108000 बार बदलती हैं।* इसी तरह से अंत के *3 शून्य को अगर हटा दिया जाए तो 108 की संख्या बचती है।108 मनको को सूर्य की कलाओं का प्रतीक माना जाता है।*
हमने सुखद ठहराव का अर्थ देने वाले जितने भी शब्द गढ़े सभी में *राम* अंतर्निहित है.
यथा,
*आराम..!*
*विराम..!*
*विश्राम..!*
*अभिराम..!*
*उपराम..!*
*ग्राम..!*
#जो *रमने* के लिए *विवश* कर दे वह *राम..!*
जीवन की आपाधापी में पड़ा *अशांत* मन जिस आनंददायक *गंतव्य* की सतत तलाश में है, वह गंतव्य है *राम..!*
भारतीय मन हर स्थिति में *राम* को साक्षी बनाने का आदी है।
👉दुःख में,
*हे राम..!*
👉पीड़ा में,
*हे राम..!*
👉लज्जा में,
*हाय राम..!*
👉अशुभ में,
*अरे राम राम..!*
👉अभिवादन में,
*राम राम..!*
👉शपथ में,
*रामदुहाई..!*
👉अज्ञानता में,
*राम जाने..!*
👉अनिश्चितता में,
*राम भरोसे..!*
👉अचूकता के लिए,
*रामबाण..!*
👉मृत्यु के लिए,
*रामनाम सत्य..!*
👉सुशासन के लिए,
*रामराज्य..!*
जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर *राम* को साथ खड़ा करतीं हैं।
*राम* भी *इतने सरल हैं कि हर जगह खड़े हो जाते हैं। इसलिए हर भारतीय उन पर अपना अधिकार मानता है।*
👉जिसका कोई नहीं उसके लिए *राम हैं-*
*निर्बल के बल राम..!*
असंख्य बार देखी सुनी पढ़ी जा चुकी *रामकथा* का आकर्षण कभी नहीं खोता।
*राम पुनर्नवा हैं।*
हमारे भीतर जो कुछ भी अच्छा है, वह *राम* है। जो *शाश्वत* है, वह *राम* हैं।
*सब-कुछ लुट जाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही तो राम है। घोर निराशा के बीच जो उठ खड़ा होता है, वह भी राम ही है।*
*सीमाओं के बीच छुपे असीम को देखना हो तो राम को देखिए..!!*
*सियाराम मय सब जग जानी।*
*करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।*
