Monday, May 29, 2023

संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*

*बांगरू बांण* 
श्रीपादावधूत की कलम से 

*संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*

*भारतीय पारिवारिक #सेंगोल जो प्रत्येक परिवार में हर बुजुर्ग के हाथ में सदैव रहता था।जिससे वे पूरे परिवार को नियंत्रित करते थे। वे ग़लती करने पर इसी #सेंगोल राजदंड से दंड भी देते थे। जो बहुत पीड़ादायक होता था और गलती करने वाला कभी भी उस गलती को दोहराने की हिम्मत नहीं करता था। लेकिन आजकल हमारे #बुजुर्गों का ये सेंगोल भी कहीं #विलुप्त हो गया है और इसी के परिणामस्वरूप सब परिवार #बिखराव की ओर बढ़ रहे हैं।* 
*मास्टरजी के पास भी यह कुटाई वाला #सेंगोल होता था। जो पढ़ाई-लिखाई में सहायक होता था। जो बच्चे अनुशासनहीनता करते थे। उनकी अच्छी तरह से खबर लेता था।*
*छड़ी बाजे छम छम* 
*विद्या आये घम घम* 
*यह शिक्षण का मूलमंत्र था। इसी कारण छात्रों को शिक्षित करने का यह रामबाण उपाय था। लेकिन मैकाल की शिक्षण पद्धति से इसे विस्मृत कर दिया गया। इसका ही यह परिणाम है कि वर्तमान में हमारे अपने बच्चे भी कई बार #विपक्षियों वाला बर्ताव करने लगते हैं।* 
*धर्मगुरुओं के पास भी धर्मदंड होता था जो राजदंड के गलत निर्णयों पर समाज की कुरीतियों पर सदैव चलता था।* 
*गांव के पंच परमेश्वरों के पास भी यह न्यायदंड होता था। जिससे वे पंचायत में न्याय करते थे।*

*जिस जिस घर/मंदिर/पंचायत में ये सब होता है उस घर/मंदिर/पंचायत के बड़े बुजुर्ग से #विनंती है के वो भी अपने सेंगोल को तलाश करें उसका #उपयोग करें।*
*फिर देखिए कैसे #बिखरे हुए और #अनियंत्रित लोग #एकजुट होते हैं फिर वो चाहे आपका परिवार हो या आपका देश।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Tuesday, May 23, 2023

आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये

 *बांगरू बाण*


*संकलित:-* श्रीपादावधूत 


*जापान में हमेशा से ही मछलियाँ खाने का एक ज़रुरी हिस्सा रही हैं और ये जितनी ताज़ी होतीं हैं लोग उसे उतना ही पसंद करते हैं । लेकिन जापान के तटों के आस-पास इतनी मछलियाँ नहीं होतीं की उनसे लोगों की डिमांड पूरी की जा सके ।नतीजतन मछुआरों को दूर समुद्र में जाकर मछलियाँ पकड़नी पड़ती हैं। जब इस तरह से मछलियाँ पकड़ने की शुरुआत हुई तो मछुआरों के सामने एक गंभीर समस्या सामने आई । वे जितनी दूर मछली पकडने जाते उन्हें लौटने में उतना ही अधिक समय लगता और मछलियाँ बाजार तक पहुँचते-पहुँचते बासी हो जातीं, और फिर कोई उन्हें खरीदना नहीं चाहता । इस समस्या से निपटने के लिए मछुआरों ने अपनी बोट्स पर फ्रीज़र लगवा लिये । वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें फ्रीजर में डाल देते । इस तरह से वे और भी देर तक मछलियाँ पकड़ सकते थे और उसे बाजार तक पहुंचा सकते थे । पर इसमें भी एक समस्या आ गयी । जापानी फ्रोजेन फ़िश ओर फ्रेश फिश में आसनी से अंतर कर लेते और फ्रोजेन मछलियों को खरीदने से कतराते। उन्हें तो किसी भी कीमत पर ताज़ी मछलियाँ ही चाहिए होतीं है। एक बार फिर मछुआरों ने इस समस्या से निपटने की सोची और इस बार एक शानदार तरीका निकाला, उन्होंने अपनी बड़े-बड़े जहाजों पर फ़िश टैंक्स बनवा लिए और अब वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें पानी से भरे टैंकों मे डाल देते । टैंक में डालने के बाद कुछ देर तो मछलियाँ इधर उधर भागती पर जगह कम होने के कारण वे जल्द ही एक जगह स्थिर हो जातीं, और जब ये मछलियाँ बाजार पहुँचती तो भले वे ही सांस ले रही होतीं लेकिन उनमें वो बात नहीं होती जो आज़ाद घूम रही ताज़ी मछलियों मे होती, और जापानी चखकर इन मछलियों में भी अंतर कर लेते । तो इतना कुछ करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई थी। अब मछुवारे क्या करते ? वे कौन सा उपाय लगाते कि ताज़ी मछलियाँ लोगों तक पहुँच पाती ? उन्होंने कुछ नया नहीं किया, वें अभी भी मछलियाँ टैंक्स में ही रखते, पर इस बार वो हर एक टैंक मे एक छोटी सी शार्क मछली भी डाल देते। शार्क कुछ मछलियों को जरूर खा जाती पर ज्यादातर मछलियाँ बिलकुल ताज़ी पहुंचती। ऐसा क्यों होता ? क्योंकि शार्क बाकि मछलियों की लिए एक चैलेंज की तरह थी। उसकी मौज़ूदगी बाकि मछलियों को हमेशा चौकन्ना रखती ओर अपनी जान बचाने के लिए वे हमेशा अलर्ट रहती। इसीलिए कई दिनों तक टैंक में रहने के बावज़ूद उनमे स्फूर्ति और ताजापन बना रहता।* 


*अब यह तो हो गई घटना की बात लेकिन इस सत्य घटना की आज क्या प्रासंगिकता है इस पर चर्चा करते हैं। आज बहुत से लोगों की ज़िन्दगी टैंक में पड़ी उन मछलियों की तरह हो गयी है जिन्हें जगाने के लिए कोई शार्क मौज़ूद नहीं है। और अगर दुर्भाग्य से आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो आपको भी आपने जीवन में नये चैलेंजेस स्वीकार करने होंगे।* *आप जिस रूटीन के आदी हों चुकें हैं उससे कुछ अलग़ करना होगा।आपको अपना दायरा बढ़ाना होगा और एक बार फिर ज़िन्दगी में रोमांच और नयापन लाना होगा तभी आप समाजोपयोगी व सार्थक बने रहेंगे । नहीं तो, बासी मछलियों की तरह आपका भी मोल कम हों जायेगा और लोग आपसे मिलने-जुलने की बजाय बचते नजर आएंगे। और दूसरी तरफ अगर आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये, कहीं ना कहीं ये आपको fresh and lively बनाये रखती हैं , इन्हें accept करिये, इन्हे overcome करिये और अपना तेज बनाये रखिये।*


*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*