*बांगरू-बाण*
*जिज्ञासा-समाधान।*
*मेरे एक सहपाठी मित्र है मकरंद जी उन्होंने एक प्रश्न पूछा है कि "हम जिसे अपना आराध्य या गुरु मानते आए हैं। उस गुरु के संदर्भ में कुछ अनुचित बातें सामने आती है तो मन को बड़ा दुख होता है ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिए..??*
श्रीपादावधूत की कलम से
*मकरंद भाई परेशान होने की कोई बात ही नहीं है।*
*इसके दो पक्ष हैं।*
पहला पक्ष
*जो है जैसा है इतने वर्षों का विश्वास है तो उस पर किंतु परंतु नहीं करना चाहिए। उस पर पूर्ण विश्वास व श्रद्धा भाव रखना चाहिए।*
*वैसे भी हमारे आराध्य या उपास्य लौकिक मनुष्य होना ही नहीं चाहिए हमारे आराध्य या उपास्य वैदिक देव धर्म परंपरा से चली आ रही सनातन संस्कृति के लक्ष्मी-नारायण, गिरिजा-शंकर, सीता-राम, राधा-कृष्ण, दत्त, हनुमान, गणपति, दुर्गा आदि होने चाहिए।*
*संत या कोई महापुरुष केवल मार्गदर्शक के रूप में ही स्वीकार होना चाहिए।*
*कबीर दास जी के अनुसार।*
*जाति न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान*
*मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान*
*जब हम स्कूल में पढ़ने के लिए जाते हैं तो विषय को पढ़ाने वाला शिक्षक किस जाति का है..? स्कूल के बाहर उसका आचरण व्यवहार कैसा है.?? उसका चरित्र कैसा है..? यह हमारे चिंतन का एवं अध्ययन का विषय नहीं होना चाहिए।*
*आपका और मेरा शिक्षण देवास में ही हुआ है इसलिए उदाहरण भी देवास का ही दे रहा हूं। हम केमेस्ट्री पढ़ने के लिए देवास के एक विख्यात एवं सुप्रसिद्ध सर के यहां जाते थे जो शराब पीने के आदी थे। समाज में उनकी पहचान एक शराबी की ही थी।*
*गणित के ही एक सर जिन्होंने अपने यहां पढ़ने आने वाली एक छात्रा से ही लव मैरिज किया था। अर्थात उनका चारित्रिक पक्ष उपरोक्त कोटि के आधार पर स्वीकार्य नहीं किया जा सकता था। फिर भी पूरे देवास में इन दोनों शिक्षकों के प्रति अपार स्नेह श्रद्धा एवं आदर का भाव था। जो यही सिद्ध करता है कि हमें उनसे केवल ज्ञान की आवश्यकता थी और वह हमारी जिज्ञासाओं की पूर्ति अपने विषय के लौकिक ज्ञान से करते थे। उनका व्यावहारिक जीवन उनका चारित्रिक पक्ष कैसा भी रहा हो हमने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया।*
*मेरा मानना है कि आध्यात्मिक जीवन में संत की भी वही भूमिका होनी है।*
*दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है परंपराएं*
*जब हम परंपरा का अनुशीलन नहीं करते हैं तो इस तरह की विडंबनाओं का सामना करना पड़ता है।*
*हमारे यहां जीवन के प्रत्येक व्यवहार में परंपराओं का अनुशीलन अनिवार्य माना गया है।*
*हम अपने बच्चों को स्कूल में डालते समय उस स्कूल का ट्रैक रिकॉर्ड देखते है। पढ़ाने वाले कौन लोग हैं.?? किस तरह का परिवेश है..?? अच्छे संस्कार देते हैं या नहीं। शैक्षणिक गतिविधियों के अतिरिक्त अन्य कितने प्रकार की गतिविधियां करते हैं इत्यादि..!! दूसरे शब्दों में कहूं तो परंपराएं ही देखते हैं।*
*विवाह जैसी संस्था में भी सजातीय बंधुओं से विवाह के समय उनके कुल को, परिवार को देखने की परंपरा है। उनके संबंध कहां-कहां है..?? उन लोगों का समाज में किस तरह का स्थान व सम्मान है..!! यह सब देखने के बाद ही विवाह संबंध तय होते हैं। और यही बात अध्यात्म व धर्म में भी स्वीकार करनी चाहिए है।*
*भारत को सनातन वैदिक संस्कृति से जोड़ने का श्रेष्ठ कार्य करने वाले आदि शंकराचार्य की परंपरा का पूरे भारत में प्रभाव है। इसीलिए आज भी लोग शंकराचार्य जी को पूज्य एवं वंदनीय मानते हैं और वर्तमान में उनके जो उत्तराधिकारी हैं उनको भी वही आदर और सम्मान देते है।*
*महाराष्ट्र में वारकरी संप्रदाय व दत्त संप्रदाय जो परंपरा से चली आ रही उपासना पद्धति को अक्षुण्ण रखने की परंपरा का निर्वहन कर रहा है। हजारों वर्षों से चले आ रहे धर्म के समस्त क्रियाकलाप आज भी उसी तरह से निर्बाध गति से जारी रखें हुए है।*
*आषाढी एकादशी के निमित्त लाखों लोगों का जन समुदाय जिसे "जन-समुद्र" कहना ज्यादा समीचीन होगा जो बिना किसी निमंत्रण के, बुलावे के, प्रलोभन के यात्रा में सम्मिलित होता हैं।*
*यही हमारे श्रेष्ठ सनातन हिंदू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है, व्यवस्था है।*
*हमारे मध्य प्रदेश में भी अभी हजारों लोग "रामदेवरा" जो राजस्थान का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। इसकी यात्रा के लिए पैदल निकल रहे हैं। गांव/गांव से सैकड़ों/हजारों लोगों का जत्था प्रतिवर्ष रामदेवरा के लिए इसी श्रावण महीने में निकलता है।*
*तो यह वही परंपराएं हैं जो आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है और ऐसी ही परंपराओं का अनुशीलन एवं अनुकरण करना ही हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए। परंपराए हमें इस तरह की विषमताओं एवं विडंबनाओं से बचाती है।*
*दुर्भाग्य से कहे या अज्ञानता वश पिछले कुछ वर्षों में हम व्यक्तिवादी या व्यक्ति केंद्रित विचारधारा का अनुसरण करने लगे हैं और उसी का ही यह परिणाम सामने आ रहा है।*
*हम मनुष्य को ईश्वर के समकक्ष रखकर उनको ही अपना आराध्य एवं उपास्य देवता मानने लगे हैं। अपने गुरु की मूर्ति स्थापित करना उनके मंदिर बनाना उनके नाम के लॉकेट और अन्य धार्मिक वस्तुएं बनाकर पहनना उनके जीवन चरित्र को धार्मिक ग्रंथ के रूप में निर्मित कर उनका वाचन करना यह वह सारी बातें हैं। जो आज समाज का एक वर्ग करने लगा है। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि आने वाले कुछ वर्षों के बाद हमारे जो मूल देवता हैं जैसे राम कृष्ण शिव हनुमान उनके मंदिर उनकी उपासना पद्धति धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएगी जो कि एक चिंता का विषय है।*
*जब मानवोचित स्वभाव दुर्गुण मनोविकार या वासना के कारण इन संतों और गुरुजन के नैतिक आध्यात्मिक पतन की बातें जब उनके भक्त समुदाय के सामने आएंगी। तब आज जो स्थिति रामपाल, राम-रहीम, आसाराम बापू, सांई के भक्तों की है। वैसे ही उन्हें भी विचलित एवं दिग्भ्रमित करेगी।*
*राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरु के रूप में भगवाध्वज को ही अपना गुरु या आराध्य माना है। सिख धर्म में भी गुरु ग्रंथ साहिब को ही गुरु के रूप में स्थान दिया है। जो इस तरह से उत्पन्न होने वाली स्थिति से निपटने के लिए कारगर सिद्ध हो रहा है।*
*समाज में प्रत्येक समय हर तरह के विमर्श प्रेषित एवं प्रसारित किए जाते हैं। फिर वह सच है या झूठ है कल्पनाओं पर आधारित है या जानबूझकर फैलाएं जा रहे हैं इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है।*
*इन बाबाओं को भी इन्हीं लोगों के माध्यम से प्रश्रय एवं प्रसिद्धि मिली। जो मीडिया में व्याप्ति के कारण कुछ बातें समाज में वायरल हो जाती हैं और कुछ बातें बच जाती हैं।*
*अभी इसी अधिक मास या श्रावण मास के निमित्त उज्जैन में 84 महादेव, सप्त सरोवर की यात्रा करने के लिए भीड़ उमड़ रही है। लेकिन इस अधिक मास में इन यात्राओं के प्रति जो आकर्षण देखने को मिल रहा है उसके पीछे का कारण क्या है यह वही विमर्श है जो पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपनी कथाओं के माध्यम से लोगों में प्रसारित कर दिया है।*
*आज इन यात्राओं को हम अच्छा या श्रेष्ठ इसलिए मान रहे हैं क्योंकि यह हिंदू धर्म के उन्नयन का कार्य कर रही है।*
*84 महादेव क्या पिछले कुछ वर्षों से ही स्थापित है। ऐसा भी नहीं है वह तो हजारों वर्षों से उज्जैन में स्थापित हैं। ऐसा माना जाता है कि जितना प्राचीन भगवान महाकालेश्वर का मंदिर है उतने ही पुराने यह 84 महादेव मंदिर हैं। इनमें से अधिकांश मंदिरों की रोज ठीक से पूजा पाठ भी नहीं होती थी। लेकिन परिस्थितियां बदली है और आज हजारों लोग रोज इनके दर्शन कर रहे हैं। जोकि सनातन हिंदू संस्कृति के लिए एक अच्छी बात है।*
*कम्युनिस्ट और मुस्लिम परस्त व ईसाई मिशनरी समर्थक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष समाज जिसे आज हम लिब्रांडू या टुकड़े-टुकड़े गैंग कहते हैं इस विचारधारा के लोगों द्वारा जानबूझकर समाज में कुछ गलत बातें भी प्रचारित एवं प्रसारित की जाती है। जिससे हमारी महान परंपराओं संस्कृति धर्म और अध्यात्म को झूठा गलत एवं निरर्थक बताने का कार्य किया जाता है जो एक प्रोपेगेंडा का एक हिस्सा है।*
*मनोविज्ञान कहता है कि जो बातें हमारी सोच या विचारधारा को सूट करती है। उसे हम स्वीकार कर लेते हैं और जो हमारी विचारधारा को सूट नहीं करती। उसका हम विरोध करते हैं। फिर चाहे वो राजनीति हो या धर्म हो या अध्यात्म।*
*"इसलिए किसी भी बात को लेकर ना तो विचलित होने की आवश्यकता है ना परेशान होने की आवश्यकता है।*
*समाज में जो हो रहा है उसे कर्ता भाव से देखने का प्रयत्न या प्रयास करना चाहिए और हमारे यहां परंपरा से चली आ रही बातों को ही हमारे दैनंदिन जीवन में अपनाना चाहिए।*
*नोट:--आपने जो जिज्ञासा या प्रश्न किया था उसका उत्तर मैंने मेरी सोच समझ या मेरे पास उपलब्ध अनुभव और ज्ञान से देने का प्रयत्न किया है। मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने जो बातें लिखी हैं वह सब आपको स्वीकार्य हो या वह सब आपके अनुकूल सत्य हो क्योंकि सत्य सार्वत्रिक है लेकिन वह प्रत्येक व्यक्ति के समझ देश काल परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।*
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

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