*बांगरू-बाण*
श्रीपादावधूत की कलम से
*74½ की कसम*
*जो लोग राजस्थान से हैं वे लोग इस 74½ की कसम को बहुत अच्छे से जानते हैं। लगभग 30/40 वर्ष पहले तक राजस्थान में गोपनीय पत्र व्यवहारों के लिए पत्र के ऊपर या पत्र के अंदर 74½ की कसम लिखने की परंपरा थी।*
*यह 74½ एक कसम है गोपनीयता की विश्वसनीयता की भरोसे की जो सरकारी सील से भी ज्यादा महत्व पूर्ण थी। जो यह कहती ही कसम तुम्हे उन साढ़े चौहत्तर मन जनेऊ की जिन्होंने अपने स्वाभिमान अपने देश/धर्म/कुल की परंपरा को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दीथी। इसलिए जो तुमने इस पत्र की गोपनीयता को तोड़ा तो।*
*इतिहास में वह दिन था 23 फरवरी 1568 का।*
*जी हाँ 23 फरवरी ठीक आज से 456 वर्ष पूर्व, यह घटना घटित हुई थी।* *अंग्रेजों के पोषित इतिहासकार एवं कम्युनिस्ट विचारों से ओतप्रोत इस्लामिक विचारधारा को श्रेष्ठ मानने वाले लिब्रांडू शर्मनिरपेक्ष इतिहासकारों ने इस घटना का उल्लेख ही नहीं किया है न हमे किसी पाठ्यक्रम में यह पढ़ाया गया।*
*भारत के इतिहास में कुल 12 जौहर और साकाओं का विवरण मिलता है। उसमें 3 चित्तौड़ में हुए थे।*
*1. रानी पद्मनी का*
*2. राजा उदय सिंह की माता रानी कर्णावती का जब उसने उदय सिंह को पन्ना धाय को सौंप कर किया था।*
*3.यह सबसे खूंखार और विभत्स था। इस दिन 23 फरवरी 1568 को तथाकथित "अकबर महान" के सौजन्य से* ।
*हमारे देश का इतिहास इस देश के रंगीले चाचा जिन्हें लोग जवाहरलाल नेहरू के नाम से जानते हैं के द्वारा लिखित एक पुस्तक जिसे नाम दिया गया "भारत एक खोज" मैं लिखा इतिहास सच्चा एवं सही माना जाता है। और आगे जाकर उन्हीं की वर्णसंकर संताने जो अपने आप को कम्युनिस्ट, मिशनरी एवं इस्लाम प्रणीत शर्मनिरपेक्ष इतिहासकार कहती हैं। जिनमें हबीब तनवीर, रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों ने भी वही इतिहास हमारे सामने रखा जिसमें भारतीयों की हिंदुओं की गुलामी की, पराजय की, और अपमान की कहानियां ही समाज के सामने लाई। इन्होंने मुगल कितने श्रेष्ठ थे आज भारत के विकास में सबसे बड़ा योगदान मुगलों का ही है। इसलिए भारत के इतिहास में मुगलों को कई तमगों से नवाजा गया।* *लेकिन दुर्भाग्य से हिंदुओं के शौर्य का, पराक्रम का, स्वाभिमान का जो इतिहास था वह किसी ने भी समाज के सामने लाने का प्रयत्न जानबूझकर नहीं किया। आज देश स्वतंत्रता के अमृत काल में पहुंच गया है इसीलिए यह इतिहास अब लोगों के सामने धीरे-धीरे आने लगा है उसी कड़ी में यह एक प्रयास है।*
*इस्लामिक मुस्लिम इतिहासकार अबुल फजल चितौड़ विजय के बारे में जो लिखते हैं वह आंखें खोलने वाला है।*
*"अकबर के आदेशानुसार प्रथम 8000 राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया गया और बाद में उनका वध कर दिया गया। उनके साथ-साथ विजय के बाद प्रात:काल से दोपहर तक अन्य 40000 हजार किसानों का भी वध कर दिया गया। जिनमें 3000 बच्चे और बूढ़े थे।"*
(अकबरनामा, अबुल फजल, अनुवाद एच. बैबरिज)
*जिस समय युद्ध का बिगुल बजा तब 25 अक्टूबर 1567 में उदय सिंह उदयपुर की सुरक्षा के लिए पीछे हट गए और किले के अंदर रहने वाले 60,000 नागरिकों के साथ चित्तौड़ की रक्षा के लिए 8,000 योद्धाओं को छोड़ दिया। इनमे राजपूतों के दो प्रमुख योद्धा जयमल राठौर और पत्ता/फत्ता चुंडावत थे।*
*जयमल और पत्ता/फत्ता का पूरा नाम जयमल मेड़तिया राठौड़ और फतेहसिंह सिसौदिया था। जयमल मेड़तिया राठौड़ , मीरा बाई के सौतेले भाई भी थे। जर्मन इतिहासकार द्वारा अकबर पर लिखी पुस्तक में जयमल को “Lion of Chittod” कहा गया है।*
*किले के अंदर अन्य लोग सैदास रावत, बल्लू सोलंकी, ठाकुर सांडा और ईसरदास चौहान थे। राजपूतों ने इतने दिनों मुग़लों को रोक रखा पर जब राशन की समाप्ति हो गयी तब इन्होंने चितौड़ के किले का द्वार खोल दिया।* *चित्तौड़ की पराजय होगी यह सोच महारानी जयमाल समेत 12000 क्षत्राणियों ने मुगलों के हरम में जाने की अपेक्षा जौहर की अग्नि में स्वयं को जलाकर भस्म कर लिया। जरा कल्पना कीजिए विशाल गड्ढों में धधकती आग और दिल दहला देने वाली चीखों-पुकार के बीच उसमें कूदती 12000 वीर क्षत्राणियां ।*
*8000 युवक राजपूतों ने माथे पर इस जोहर की राख लगा शाका किया।* *शाका कहते हैं कि वे युद्ध मे मरने के लिए निकल पड़े, एक एक योद्धा ने सैकड़ों का वध किया पर मुग़ल की सवा लाख की सेना के सामने कैसे टिकते।*
*उस एक दिन में मुग़लों ने 8000 राजपूतों के वीरगति प्राप्त होने के बाद 60000 किसानों, वृद्ध और बच्चों का कत्लेआम किया । बच्चों को भाले की नोंक पर उछाल उछाल कर मारा गया वृद्धों को तड़फा-तड़फा कर।*
*ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड लिखते हैं -*
*"अकबर ने अपनी सफलता को मारे गए हिंदुओं के शरीर से ली गई जनेउ की मात्रा से मापा जो कि साढ़े चौहत्तर मन हुई। एक मन 40 किलोग्राम का होता है। तो उस काले दिन में मारे गए हिंदुओं पर जनेऊ के धागों का वजन 2,980 किलोग्राम था।*
*अंदाजन एक जनेऊ एक छंटाक की होती है तो इस आधार पर जोड़ा जाए तो कुल 47680 हिंदू वीर बलिदान हुए। ऐसा कत्लेआम भारत के इतिहास में कभी न हुआ। यह सुन कर पढ़ कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।*
*इतना भयंकर विभत्स अत्याचार इतनी भयंकर नृशंस हत्याएं करने वाला जलालुद्दीन अकबर जिसे चचा नेहरू "अकबर द ग्रेट" कहते हैं कितनी विडंबना है यह।*
*हमारे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने भी अकबर को एक परोपकारी उदार, दयालु और धर्मनिरपेक्ष शासक बताया है।*
*अकबर के जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने साफ़ लिखा है कि अकबर एक दुष्कर्मी, घृणित एवं नृशंस-हत्याकांड करने वाला क्रूर शासक था।*
*चित्तौड़ की विजय के बाद अकबर ने कुछ फतहनामें प्रसारित करवाये थे।*
*जिससे हिन्दुओं के प्रति उसकी गहन आन्तरिक घृणा प्रकाशित होती हैं।*
*एक उदाहरण देखिए यह लिखने वाला भी अकबर के काल का एक मुसलमान इतिहासकार था और यह लिखित दस्तावेज आज भी नईदिल्ली के म्यूजियम में सुरक्षित है।*
*"अल्लाह की ख्याति बढ़े, इसके लिए हमारे कर्तव्य परायण मुजाहिदीनों ने अपवित्र काफिरों को अपनी बिजली की तरह चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर दिया। हमने अपना बहुमूल्य समय और अपनी शक्ति घिज़ा (जिहाद एक अरबी शब्द अर्थात् धर्म युद्ध अर्थ गैर मुस्लिमों का छल कपट से कटाई और गैर मुस्लिम स्त्रियों को वेश्या बनाना) में ही लगा दिया है और अल्लाह के सहयोग से काफिरों के अधीन बस्तियों, किलों, शहरों को विजय कर अपने अधीन कर लिया है। कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और उन सभी का विनाश कर दे। हमने पूजा स्थलों उसकी मूर्तियों को और काफिरों के अन्य स्थानों का विध्वंस कर दिया है।"*
(फतहनामा-ए-चित्तौड़ मार्च 1586,नई दिल्ली)
*स्वतंत्रता के अमृत काल में हमारा यह नैतिक कर्तव्य है कि जो हमारा गौरव का इतिहास है स्वाभिमान का इतिहास है, पुरुषार्थ का और पराक्रम का इतिहास है वह समाज के सामने लाएं और उस इतिहास से वर्तमान समय में सीख ले।*
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त
