Friday, June 9, 2023

नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।

बांगरू बाण

श्रीपादावधूत की कलम से 

नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।
आधुनिक युग की किसी भी शिक्षा को जानने का अर्थ उसे समझना नहीं है। जानने और समझने में अंतर है। एक व्यक्ति जिसने आठ बार शोधकार्य कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी वह एक संन्यासी से मिला। अपनी उपलब्धि पर उसे गर्व था इसी कारण वह अपनी आत्मप्रशंसा उस संन्यासी के सामने कर रहा था। उसके गर्व को देखकर संन्यासी ने कहा, 'तुम अपने जीवन में इतने मूर्ख क्यों रहे?' सन्यासी की इस बात से वह व्यक्ति थोड़ा विचलित हुआ और उस व्यक्ति ने कहा, 'आपको गलतफहमी हुई है, मैंने आठ बार पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।' 

'मैंने तुम्हें ठीक समझा है। चिडिय़ों, चांद और तारों का आनंद उठाने के बजाय जीवन के सर्वोत्तम भाग में केवल पढ़ते रहना मूर्खता ही तो है।' व्यक्ति के पास सारी विधाएं हो सकती हैं, पर स्पष्टता न हो और उसे बहुत कुछ मालूम हो, तो क्या लाभ? 

समझ और जानने के बीच स्पष्टता की कमी उलझन को उत्पन्न करती है। व्यक्ति को समझना चाहिए कि व्यक्ति के कई केंद्र होते हैं। बौद्धिक केंद्र, भावनात्मक केंद्र और शरीर का केंद्र। प्रत्येक केंद्र में यांत्रिक और चुंबकीय भाग होता है। यांत्रिक भाग यंत्र की तरह काम करता है। जबकि चुंबकीय भाग अधिक सचेतना के साथ काम करता है। व्यक्ति को स्वयं को परिवर्तित करना होता है। यांत्रिक गतिविधियों को बदलना पड़ता है। पसंद और नापसंद को बदलनी चाहिए। यांत्रिक भावना जैसे ईर्ष्या और घृणा को भी रूपांतरित होना चाहिए। 

चेतना को जाग्रत करो और जीवन को रूपांतरित होते देखो। जड़ वस्तु में भी प्राण होते हैं। प्रेम-भरी चेतना के साथ किसी भी वस्तु के साथ व्यवहार करो। यह रहस्यपूर्ण तरह से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी। इस संदेश को पाकर तुम्हारी सहज बुद्धि और पवित्रता बढ़नी चाहिए। जब तुम स्नान करते हो, तो प्रेम से पानी से बात करो। जब तुम सोते हो तो प्रेम-भरी चेतना के साथ तकिए से बात करो और एक दिव्य संबंध स्थापित हो जाता है। और यह मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है मेरी नानी रात को सोते समय तकिए को बोलकर सोती थी कि सुबह मुझे इतनी बजे उठना है उस जमाने में गांव में हर किसी के घर अलार्म घड़ी नहीं होती थी। और ठीक उसी समय उनकी नींद खुल जाती थी और वह अपने दैनंदिन कार्य कर लेती थी बचपन में मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कुतूहल होता था लेकिन अब जाकर के समझ में आ रहा है कि जिन्हें हम अनपढ़ मूर्ख गंवार कहते हैं वस्तुतः वही जीवन के असली सौंदर्य को आनंद को अनुभूत कर पाते हैं ।

नकारात्मक भावनाएं जीवन को विषमय बना देती हैं। विषैले भोजन की तरह नकारात्मक भावनाओं को मत अपनाओ। अब तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि नकारात्मक भावनाओं के कारण आपके शरीर में विषैले हारमोंस स्त्रावित होते हैं जो आपके शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं वर्तमान समय में डायबिटीज ब्लड प्रेशर इन सब के पीछे सबसे प्रमुख कारण नकारात्मक विचारों से उत्पन्न  वे विषैले हारमोंस ही हैं जो आपको बीमारियों के रूप में आकर पीड़ित करते हैं। आजकल तो एक आम आदमी भी यह कहते हुए सुना जाता है की टेंशन बढ़ने से उसकी शुगर बढ़ गई है अत्यधिक क्रोध से उसका ब्लड प्रेशर बढ़ गया है यह सब इन्हीं हारमोंस की वजह से होता है। नकारात्मक भावों के प्रति सावधान और सचेत रहो। उन्हें आने दो, क्योंकि उनका आना स्वाभाविक है परिस्थितिजन्य है पर उनके साथ जुड़ो या एकरूप मत हो। अपने प्रिय व्यक्ति को आलिंगन करने से हमारे शरीर में ऑक्सीटॉनिन नामक हार्मोन सक्रिय होता है जो हमें पूर्णानंद परिपूर्णता सुरक्षा साहस आदि प्रदान करता है।
इसके साथ एक और कार्टिसोल नामक हार्मोन स्रावित होता है। जो हमें तनाव एंग्जाइटी ट्रेस आदि को नष्ट करता है।
किसी अच्छे स्पर्श से मस्तिष्क का सेरेब्रल ब्रेन सिस्टम (यह वह हिस्सा है जो हमारे अंदर प्यार और विश्वास की अनुभूति करवाता है) सक्रिय होता है।
कनाडा की एक यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार नियमित गले लगने हाथ मिलाने से संबंधों में प्रगाढ़ता आती है। जादू की झप्पी से पूरे दिन आपके अंदर उत्साह का भाव बना रहता है आत्मीय और पारिवारिक संबंधों के लिए रोज जादू की झप्पी अनिवार्य होती है।
द हग थेरेपी पुस्तक की लेखिका प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉक्टर कैथलीन किटिंग ने अपने अनुभव के आधार पर लिखा है कि हग अर्थात आलिंगन गले लगाना दवाइयों के सेवन के मुकाबले में अधिक फायदेमंद साबित होते हैं।
वृद्ध लोगों को प्यार से पकड़ने उन्हें गले लगाने से उनमें जीवन जीने की इच्छा शक्ति बढ़ती है गले लगाने से अकेलापन डर और भूलने की बीमारी अनिद्रा से मुक्ति मिलती है। इसलिए
नई इच्छाशक्ति की रचना करने का चुनाव करो। नकारात्मक भावों से चलित मत हो। वे तुम्हारी शक्ति को नष्ट करते हैं। वे तुम्हें सुलाए रखते हैं। वे हानिकारक और बोझिल हैं। वे तुम्हारे जीवन को जटिल बनाते हैं।

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

*बदन दर्द, कमर दर्द, सर्वाइकल और चारपाई/खाट/खटिया*

*बांगरू-बाण*

 श्रीपादावधूत की कलम से 


*बदन दर्द, कमर दर्द, सर्वाइकल और चारपाई/खाट/खटिया* 

*बदन दर्द, कमर दर्द और सर्वाइकल का चारपाई या खाट से क्या संबंध है यह प्रश्न आपके मन में उत्पन्न हुआ होगा?* 
*प्रथम दृष्टया तो इनका खटिया से कोई संबंध है यह हमारी जानकारी में ही नहीं होगा। लेकिन सच यही है। वर्तमान समय में अधिकांश लोगों को कमर दर्द सर्वाइकल का प्रॉब्लम केवल और केवल गैर पारंपरिक इंग्लिश बेड जिसे सामान्य भाषा में हम पलंग कहते हैं और जिस पर फोम के गद्दे बिछाए जाते हैं के कारण ही उत्पन्न होता है।*

*हमारे पूर्वज बहुत ही जानकार थे वह विज्ञान को अच्छी तरह से जानते थे शरीर विज्ञान आरोग्य शास्त्र का उन्हें पूरा पूरा ज्ञान था और इसीलिए उनके प्रत्येक आचार, विचार, व्यवहार में विज्ञान व आयुर्वेद का मिलाजुला स्वरूप प्रयुक्त होता था जो उन्हें स्वस्थ रखने में सहायक होता था । सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वज क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई साइंस नहीं है, लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके। चारपाई बनाना एक कला है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है।*
*जब हम सोते हैं, तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की आवश्यकता होती है ; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की आवश्यकता होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की झोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है।*
*दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें, सभी में चारपाई की तरह झोली बनी होती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की झोली का था, लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है।* *चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द  कभी नही होता है। आजकल डॉक्टरों के द्वारा दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है। आज भी गांव में जच्चा और बच्चा को खटिया पर ही सुलाया जाता है। अधिकांश गांव में इस तरह की खटिया या चारपाई केवल और केवल उन महिलाओं के लिए ही बनी होती है जिन्होंने अभी अभी बच्चा पैदा किया है और वह इस खटिया पर लगभग सवा महीने तक सोती है।* 
*डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है, उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं, वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती। चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है।* *खटिया को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं। अगर किसी मरीज को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed -Soar शुरू हो जाता है । भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है। गर्मियों में इंग्लिश Bed जो कि फोम का या फाइबर का बना होता है गर्म हो जाता है इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है जबकि सनातन चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है ।*
*सूत की रस्सियों से बुनी चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शरीर का Acupressure होता रहता है ।*
*गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनंद ही कुछ और है। ताज़ी हवा, बदलता मौसम, तारों की छांव ,चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती है । हर घर में एक स्वदेशी बाण(सूत की रस्सी) की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी चाहिए ।50 वर्ष की आयु के बाद तो सोने के लिए चारपाई से अच्छा कोई साधन ही नहीं है। दिन में सोने के लिए या बैठने के लिए केवल चारपाई का प्रयोग करना चाहिए उस पर कुछ भी नहीं डालना चाहिए। उस पर बैठने या सोने से आपके शरीर के अधिकांश अंग सूत की रस्सी के संपर्क में आने से एक तरह से एक्यूप्रेशर का काम करते हैं। रात्रि में आवश्यक हो तो आप गादी या गद्दा बिछा लें लेकिन अगर केवल मोटी दरी डालकर सोएंगे तो ज्यादा लाभदायक रहेगा। अंग्रेजी में जिसे आप रिलैक्स कहते हैं वह रिलैक्सेशन की प्रक्रिया केवल और केवल चारपाई या खाट पर सोने से ही प्राप्त होती है।* 
*इसलिए प्राचीन सनातन भारतीय संस्कृति के आचार, विचार, व्यवहार और संस्कारों को अपनाते चलें जो आपके हित में है।* 

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त..!!!

Monday, May 29, 2023

संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*

*बांगरू बांण* 
श्रीपादावधूत की कलम से 

*संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*

*भारतीय पारिवारिक #सेंगोल जो प्रत्येक परिवार में हर बुजुर्ग के हाथ में सदैव रहता था।जिससे वे पूरे परिवार को नियंत्रित करते थे। वे ग़लती करने पर इसी #सेंगोल राजदंड से दंड भी देते थे। जो बहुत पीड़ादायक होता था और गलती करने वाला कभी भी उस गलती को दोहराने की हिम्मत नहीं करता था। लेकिन आजकल हमारे #बुजुर्गों का ये सेंगोल भी कहीं #विलुप्त हो गया है और इसी के परिणामस्वरूप सब परिवार #बिखराव की ओर बढ़ रहे हैं।* 
*मास्टरजी के पास भी यह कुटाई वाला #सेंगोल होता था। जो पढ़ाई-लिखाई में सहायक होता था। जो बच्चे अनुशासनहीनता करते थे। उनकी अच्छी तरह से खबर लेता था।*
*छड़ी बाजे छम छम* 
*विद्या आये घम घम* 
*यह शिक्षण का मूलमंत्र था। इसी कारण छात्रों को शिक्षित करने का यह रामबाण उपाय था। लेकिन मैकाल की शिक्षण पद्धति से इसे विस्मृत कर दिया गया। इसका ही यह परिणाम है कि वर्तमान में हमारे अपने बच्चे भी कई बार #विपक्षियों वाला बर्ताव करने लगते हैं।* 
*धर्मगुरुओं के पास भी धर्मदंड होता था जो राजदंड के गलत निर्णयों पर समाज की कुरीतियों पर सदैव चलता था।* 
*गांव के पंच परमेश्वरों के पास भी यह न्यायदंड होता था। जिससे वे पंचायत में न्याय करते थे।*

*जिस जिस घर/मंदिर/पंचायत में ये सब होता है उस घर/मंदिर/पंचायत के बड़े बुजुर्ग से #विनंती है के वो भी अपने सेंगोल को तलाश करें उसका #उपयोग करें।*
*फिर देखिए कैसे #बिखरे हुए और #अनियंत्रित लोग #एकजुट होते हैं फिर वो चाहे आपका परिवार हो या आपका देश।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Tuesday, May 23, 2023

आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये

 *बांगरू बाण*


*संकलित:-* श्रीपादावधूत 


*जापान में हमेशा से ही मछलियाँ खाने का एक ज़रुरी हिस्सा रही हैं और ये जितनी ताज़ी होतीं हैं लोग उसे उतना ही पसंद करते हैं । लेकिन जापान के तटों के आस-पास इतनी मछलियाँ नहीं होतीं की उनसे लोगों की डिमांड पूरी की जा सके ।नतीजतन मछुआरों को दूर समुद्र में जाकर मछलियाँ पकड़नी पड़ती हैं। जब इस तरह से मछलियाँ पकड़ने की शुरुआत हुई तो मछुआरों के सामने एक गंभीर समस्या सामने आई । वे जितनी दूर मछली पकडने जाते उन्हें लौटने में उतना ही अधिक समय लगता और मछलियाँ बाजार तक पहुँचते-पहुँचते बासी हो जातीं, और फिर कोई उन्हें खरीदना नहीं चाहता । इस समस्या से निपटने के लिए मछुआरों ने अपनी बोट्स पर फ्रीज़र लगवा लिये । वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें फ्रीजर में डाल देते । इस तरह से वे और भी देर तक मछलियाँ पकड़ सकते थे और उसे बाजार तक पहुंचा सकते थे । पर इसमें भी एक समस्या आ गयी । जापानी फ्रोजेन फ़िश ओर फ्रेश फिश में आसनी से अंतर कर लेते और फ्रोजेन मछलियों को खरीदने से कतराते। उन्हें तो किसी भी कीमत पर ताज़ी मछलियाँ ही चाहिए होतीं है। एक बार फिर मछुआरों ने इस समस्या से निपटने की सोची और इस बार एक शानदार तरीका निकाला, उन्होंने अपनी बड़े-बड़े जहाजों पर फ़िश टैंक्स बनवा लिए और अब वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें पानी से भरे टैंकों मे डाल देते । टैंक में डालने के बाद कुछ देर तो मछलियाँ इधर उधर भागती पर जगह कम होने के कारण वे जल्द ही एक जगह स्थिर हो जातीं, और जब ये मछलियाँ बाजार पहुँचती तो भले वे ही सांस ले रही होतीं लेकिन उनमें वो बात नहीं होती जो आज़ाद घूम रही ताज़ी मछलियों मे होती, और जापानी चखकर इन मछलियों में भी अंतर कर लेते । तो इतना कुछ करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई थी। अब मछुवारे क्या करते ? वे कौन सा उपाय लगाते कि ताज़ी मछलियाँ लोगों तक पहुँच पाती ? उन्होंने कुछ नया नहीं किया, वें अभी भी मछलियाँ टैंक्स में ही रखते, पर इस बार वो हर एक टैंक मे एक छोटी सी शार्क मछली भी डाल देते। शार्क कुछ मछलियों को जरूर खा जाती पर ज्यादातर मछलियाँ बिलकुल ताज़ी पहुंचती। ऐसा क्यों होता ? क्योंकि शार्क बाकि मछलियों की लिए एक चैलेंज की तरह थी। उसकी मौज़ूदगी बाकि मछलियों को हमेशा चौकन्ना रखती ओर अपनी जान बचाने के लिए वे हमेशा अलर्ट रहती। इसीलिए कई दिनों तक टैंक में रहने के बावज़ूद उनमे स्फूर्ति और ताजापन बना रहता।* 


*अब यह तो हो गई घटना की बात लेकिन इस सत्य घटना की आज क्या प्रासंगिकता है इस पर चर्चा करते हैं। आज बहुत से लोगों की ज़िन्दगी टैंक में पड़ी उन मछलियों की तरह हो गयी है जिन्हें जगाने के लिए कोई शार्क मौज़ूद नहीं है। और अगर दुर्भाग्य से आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो आपको भी आपने जीवन में नये चैलेंजेस स्वीकार करने होंगे।* *आप जिस रूटीन के आदी हों चुकें हैं उससे कुछ अलग़ करना होगा।आपको अपना दायरा बढ़ाना होगा और एक बार फिर ज़िन्दगी में रोमांच और नयापन लाना होगा तभी आप समाजोपयोगी व सार्थक बने रहेंगे । नहीं तो, बासी मछलियों की तरह आपका भी मोल कम हों जायेगा और लोग आपसे मिलने-जुलने की बजाय बचते नजर आएंगे। और दूसरी तरफ अगर आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये, कहीं ना कहीं ये आपको fresh and lively बनाये रखती हैं , इन्हें accept करिये, इन्हे overcome करिये और अपना तेज बनाये रखिये।*


*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

Thursday, March 30, 2023

*राम..!*

 *बांगरू बाण*

*श्रीपादावधूत की कलम से* 


*राम..!*


*ये राम का देश है। यहां कण कण में राम हैं।* भाव की हर हिलोर में राम हैं। कर्म के हर छोर में राम हैं। राम यत्र-तत्र हैं। राम सर्वत्र हैं। जिसमें रम गए वही राम है। यहां सबके अपने-अपने राम हैं। *वाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है*। *भवभूति के राम दोनों से अलग हैं।* *कबीर ने राम को जाना। तुलसी ने माना। निराला ने बखाना।* राम एक ही हैं पर दृष्टि सबकी भिन्न। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यवत्ता और संयम का नाम है राम। आप ईश्वरवादी भले ही न हो, तो भी घर-घर में राम की गहरी व्याप्ति से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम तो मानना ही पड़ेगा। स्थितप्रज्ञ, असंम्पृक्त, अनासक्त। *एक ऐसा लोक नायक, जिसमें सत्ता के प्रति निरासक्ति का भाव है। जो जिस सत्ता का पालक है, उसी को छोड़ने के लिए सदा तैयार है।*

*राम हमारे देश की उत्तर दक्षिण एकता के अकेले सूत्रधार है*। *कबीर राम को परम ब्रह्म मानते है। “कस्तूरी कुण्डल बले मृग ढूँढे बन माही ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाहीं “* 

हमारे *राम लोकंकमंगलकारी है*। *मर्यादा पुरूषोत्तम है*। राम का आदर्श, लक्ष्मण रेखा की मर्यादा है। लांघी तो अनर्थ। सीमा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन। *राम जाति वर्ग से परे है। नर, वानर, आदिवासी, पशु, मानव, दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता है।* *अगड़े पिछड़े से ऊपर निषादराज हों या सुग्रीव, शबरी हों या जटायु, सभी को साथ ले चलने वाले वे अकेले देवता हैं। भरत के लिए आदर्श भाई। हनुमान के लिए स्वामी। प्रजा के लिए नीतिकुशल न्यायप्रिय राजा हैं।* परिवार नाम की संस्था में उन्होंने नए संस्कार जोड़े। पति पत्नी के प्रेम की नई परिभाषा दी। ऐसे वक्त जब खुद उनके पिता ने तीन विवाह किए थे। पर राम ने अपनी दृष्टि सिर्फ एक महिला तक सीमित रखी। उस निगाह से किसी दूसरी महिला को कभी देखा नहीं। जब सीता का अपहरण हुआ वे व्याकुल थे। रो-रो कर पेड़, पौधे, पहाड़ से उनका पता पूछ रहे थे। *अपरिमित असीमित सामर्थ्य शक्ति  से अहंकार का एक खास रिश्ता हो जाता है। पर उनमें अंहकार छू तक नही गया था। यही वजह है कि  अपार शक्ति के बावजूद राम मनमाने फैसले नहीं लेते थे। वे लोकतांत्रिक हैं। सामूहिकता को समर्पित विधान की मर्यादा जानते हैं*। धर्म और व्यवहार की मर्यादा भी और परिवार का बंधन भी। *नर हो या वानर इन सबके प्रति वे अपने कर्तव्यबोध पर सजग रहते हैं। वे मानवीय करुणा जानते हैं। वे मानते हैं- परहित सरिस धर्म नहीं भाई।*



*राम* का अर्थ है *‘प्रकाश’*। किरण एवं आभा (कांति) जैसे शब्दों के मूल में राम है। *‘रा’ का अर्थ है आभा* और *‘म’ का अर्थ है मैं; मेरा और मैं स्वयं।* राम का अर्थ है मेरे भीतर प्रकाश, मेरे ह्रदय में प्रकाश। निश्चय ही ‘राम’ ईश्वर का नाम है,

राम शब्द में दो अर्थ व्यंजित हैं,*सुखद होना..! और ठहर जाना..!!*


*राम शब्द की व्युत्पत्ति* 


*राम शब्द* संस्कृत के दो धातुओं, *रम् और घम* से बना है। *रम् का अर्थ है रमना या निहित होना* और *घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान।* इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, *“रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते”* अर्थात, *योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं।* 

*'राम' ही मात्र एक ऐसे विषय हैं, जो योगियों की आध्यात्मिक-मानसिक भूख हैं, भोजन हैं, हर्ष, आनन्द और उल्लास के मूल स्त्रोत हैं।* 


*पुराण अनुसार राम नाम का अर्थ*

*ब्रह्मवैवर्त पुराण* को सबसे प्राचीनतम पुराण माना जाता हैं। राधा रानी कहती हैं -

*राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचक:।*

*विश्वानामीश्वरो यो हि तेन राम: प्रकीर्तत:।।*

*" रा " शब्द विश्ववाचक* है और *"म " शब्द ईश्वरवाचक* है, इसलिए जो *विश्व का ईश्वर* है , उसे *" राम "* कहा जाता है।


इसके अतिरिक्त *अग्नि पुराण , शिव पुराण , विष्णु पुराण, पद्म पुराण , स्कंद पुराण एवं भागवत पुराण आदि में राम जी की महिमा का वर्णन है ।*


*भगवान शिव पद्म पुराण में मां पार्वती जी से कहते हैं* -

*राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।*

*सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।*

सुमुखी ! मैं तो राम ! राम ! राम ! इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्री राम नाम में ही निरंतर रमण करता हूं । राम नाम संपूर्ण सहस्रनाम के समान है ।


*राम नाम का उपनिषदों में वर्णन*


प्रभु श्री राम के अनंत महिमा का वर्णन पुराणों के साथ साथ उपनिषदों में भी हैं। जैसे - *महोपनिषद , भिक्षुकोपनिषद , पैंगलोपनिषद , शांडिल्योपनिषद तथा योगशिखोपनिषद* । इतना ही नहीं, *प्रभु श्री राम के नाम से 2 उपनिषद (रामरहस्योपनिषद और श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद)* का नाम भी राम नाम से प्रारंभ होता है

*रामरहस्योपनिषद* के अनुसार सभी पुराणों, शास्त्रों, चारों विद्याओं और आध्यात्मिक दर्शन का मूल तत्व प्रभु श्रीराम को माना गया है। इस नाम का प्रताप इतना विशाल हैं कि *आदि कवि महर्षि वाल्मीकि* जी उल्टा राम नाम (मरा- मरा) जप कर भी पवित्र हो गए।


*अपने मार्ग से भटका हुआ कोई क्लांत पथिक किसी सुरम्य स्थान को देखकर ठहर जाता है। उसी ठहराव का नाम राम है क्योंकि उसमें विराम है, आराम है, विश्राम है।*


*अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं* 

*'राम-राम' शब्द* जब भी अभिवादन करते समय बोला जाता है तो हमेशा 2 बार बोला जाता है। इसके पीछे एक वैदिक दृष्टिकोण माना जाता है। वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार *पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है।* वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है, क्योंकि *हिंदी वर्णमाला में ''र" 27वां अक्षर है।* *'आ' की मात्रा 2रा अक्षर और 'म' 25 वां अक्षर*, इसलिए सब मिलाकर जो योग बनता है वो है *27 + 2 + 25 = 54,* अर्थात *एक “राम” का योग 54* हुआ। और *2 बार राम राम कहने से 108* हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है। जब भी हम कोई जाप करते हैं तो हमे 108 बार जाप करने के लिए कहा जाता है। 


*108 का वैज्ञानिक महत्व*

यहां हम अगर *वैज्ञानिक तथ्य की बात करें तो 108 मनके की माला और सूर्य की कलाओं का एक दूसरे से संबंध माना गया है।* वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार *1 वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता हैं।* इसमें वह 6 माह उत्तरायण रहता है और 6 माह दक्षिणायन रहता है। इस तरह से *6 माह में सूर्य की कलाएं 108000 बार बदलती हैं।* इसी तरह से अंत के *3 शून्य को अगर हटा दिया जाए तो 108 की संख्या बचती है।108 मनको को सूर्य की कलाओं का प्रतीक माना जाता है।* 


हमने सुखद ठहराव का अर्थ देने वाले जितने भी शब्द गढ़े सभी में *राम* अंतर्निहित है.

यथा,

*आराम..!*

*विराम..!*

*विश्राम..!*

*अभिराम..!*

*उपराम..!*

*ग्राम..!*

#जो *रमने* के लिए *विवश* कर दे वह *राम..!*

जीवन की आपाधापी में पड़ा *अशांत* मन जिस आनंददायक *गंतव्य* की सतत तलाश में है, वह गंतव्य है *राम..!*


भारतीय मन हर स्थिति में *राम* को साक्षी बनाने का आदी है।

👉दुःख में,

*हे राम..!*

👉पीड़ा में,

*हे राम..!*

👉लज्जा में,

*हाय राम..!*

👉अशुभ में,

*अरे राम राम..!*

👉अभिवादन में,

*राम राम..!*

👉शपथ में,

*रामदुहाई..!*

👉अज्ञानता में,

*राम जाने..!*

👉अनिश्चितता में,

*राम भरोसे..!*

👉अचूकता के लिए,

*रामबाण..!*

👉मृत्यु के लिए,

*रामनाम सत्य..!*

👉सुशासन के लिए,

*रामराज्य..!*


जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर *राम* को साथ खड़ा करतीं हैं।

*राम* भी *इतने सरल हैं कि हर जगह खड़े हो जाते हैं। इसलिए  हर भारतीय उन पर अपना अधिकार मानता है।* 

👉जिसका कोई नहीं उसके लिए *राम हैं-*

*निर्बल के बल राम..!*

असंख्य बार देखी सुनी पढ़ी जा चुकी *रामकथा* का आकर्षण कभी नहीं खोता।

*राम पुनर्नवा हैं।*

हमारे भीतर जो कुछ भी अच्छा है, वह *राम* है। जो *शाश्वत* है, वह *राम* हैं।

*सब-कुछ लुट जाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही तो राम है। घोर निराशा के बीच जो उठ खड़ा होता है, वह भी राम ही है।*

*सीमाओं के बीच छुपे असीम को देखना हो तो राम को देखिए..!!*

  


*सियाराम मय सब जग जानी।* 

*करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।*

Monday, March 27, 2023

बांगरू बाण

 *बांगरू बाण*

*श्रीपादावधूत की कलम से* 


**आइए आज जानते हैं ठाकुर, भंवर/भंवरी, तंवर/तंवरी, कुंवर, यह नाम नहीं उपाधियां है और यह किन को प्राप्त होती है।*


*राजस्थानी संस्कृति में राजपूतों को ठाकुर कहने की परंपरा है। लेकिन हमें यह नहीं पता कि ठाकुर कहते किसको है।*

*शोले का संजीव कुमार का कैरेक्टर ठाकुर सबको पता है इसीलिए हम सभी राजपूत भाइयों को ठाकुर कह देते हैं जो सही नहीं है।*

*ठाकुर यह वह पदवी है जो किसी पुत्र को तब मिलती है जब वह परिवार का मुखिया बनता है अर्थात जब उसके पिता का देहांत होता है और पिता के स्थान पर जब उसके पास मुखिया का पद आता है तब वह ठाकुर कहलाता है इसलिए कोई भी व्यक्ति ठाकुर कहलाना इसलिए पसंद नहीं करता क्योंकि इसके लिए उनके पिता का देहांत होना आवश्यक होता है और कोई भी बेटा अपने पिता का देहांत नहीं चाहता।* *इसलिए आगे से आप ठाकुर उसी व्यक्ति को कहिए जिसके पिता जीवित नहीं है और वह घर का मुखिया है।*

*इसी प्रकार एक नाम आपने भंवर सुना होगा। आपने कई लोगों के नाम भंवर या भंवरी सुना होगा यह भी एक तरह की पदवी है। जिस बच्चे के दादा जीवित होते हैं और वह बच्चा होता है तो उसका नामकरण भंवर अगर वह लड़का है और लड़की है तो भंवरी यह रखा जाता था।* 

*हां जी यह सुनकर आपको बड़ा अजीब लग सकता है कि दादा के जीवित रहते हर व्यक्ति का नाम भंवर या भंवरी रखना इसमें क्या औचित्य है। क्योंकि सामान्यतया हर बच्चे के जन्म के समय उसके दादा जीवित रहते ही हैं इसलिए यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है इसी को आधार बनाया जाए तो लगभग 90 से 95% बच्चों का नाम भंवर या भंवरी होना चाहिए। लेकिन यह घटना है उस समय की है जब राजस्थान की राजपूताना कौम सदैव युद्ध में रत रहती थी और युद्ध में राजपूत वीरों का बलिदान होते ही रहता था इसलिए बहुत ही वीर और पराक्रम शाली राजपूत ही अपने जिंदा रहते दादा बन पाता था । अर्थात अपने आंखों से अपने पोते या पोती को देख पाता था। इसीलिए वह अपने पोते या पोती का नाम भंवर या भंवरी रखता था। भंवर या भंवरी यह नाम समाज में उस बच्चे को एक अलग से प्रतिष्ठा दिलाते थे कि वह कितना सौभाग्यशाली है कि उसके सर पर उसके दादा का आशीर्वाद अभी तक बना हुआ है।*

*इसी प्रकार तंवर या तंवरी यह नामकरण भी भंवर या भंवरी से ज्यादा श्रेष्ठ माना जाता था। क्योंकि तंवर या तंवरी यह नाम उस बालक या बालिका का रखा जाता था जिसके परदादा जीवित रहे हो जो अपने आप में बहुत ही रेयर ऑफ द रेयर अर्थात बहुत ही कम देखने को मिलता था। इसलिए तंवर नाम की श्रेष्ठता भंवर नाम से अधिक मानी गई है*

*बाकी आप सब लोग तो जानते ही हैं कुंवर यह उपाधि हर उस बालक को प्राप्त होती है जिनके पिताजी जीवित हैं।*

Thursday, February 3, 2022

Shrimant Bajirao Peshwa samadhi Raverkhedi

 *मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग ने श्रीमंत बाजीराव पेशवा समाधि स्थल रावेर खेड़ी के पुनरुद्धार के कार्यों के टेंडर जारी कर दिए ।* 


 *पहला टेंडर 5 जनवरी 2022 को जारी किया गया था इस टेंडर में समाधि के आसपास के जीर्णोद्धार हेतु 782.48 लाख रुपए अर्थात (7 करोड़ 82 लाख 48 हजार रुपए) स्वीकृत किए गए थे। इसमें समाधि स्थल के पास घाट समाधि से रामेश्वर मंदिर तक पुल वृंदावन दरवाजे के पास एक बगीचा आदि अन्य निर्माण सम्मिलित हैं।*


*इसी प्रकार दूसरा टेंडर* 


*31 जनवरी 2022 को जारी किया गया इसमें श्रीमंत बाजीराव पेशवा समाधि स्थल के समीप म्यूजियम, टीएफसी यात्री निवास, जन सुविधाएं टॉयलेट बाथरूम आदि, सोविनियर शॉप, एक ऑडियो वीडियो के लिए सभागृह जिसकी क्षमता 250 लोगों के बैठने की होगी, और अन्य छोटे-मोटे निर्माण जिसमें रामेश्वर मंदिर का सौंदर्य करण व जीर्णोद्धार भी सम्मिलित है।* 

इस कार्य हेतु *शासन ने 800.91 लाख रुपए अर्थात 8 करोड़ 91 लाख रुपए स्वीकृत किए हैं।* 


*इस प्रकार दोनों टेंडर मिलाकर अब तक 1583.39 रुपए अर्थात 15 करोड़ 83 लाख 29 हजार रुपए स्वीकृत हो चुके हैं।* 


लाखों लाख श्रीमंत बाजीराव पेशवा के भक्तों और प्रेमियों की वर्षों पुरानी लंबित मांग को पूरा करने में निम्नलिखित महानुभावों का महत्वपूर्ण योगदान है। इसीलिए *समस्त श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रेमियों एवं श्रीमंत बाजीराव पेशवा स्मृति प्रतिष्ठान के समस्त कार्यकर्ताओं की तरफ से *धन्यवाद कोटि-कोटि आभार*


 *देश के गृह मंत्री श्री अमित भाई शाह* 


*नागरिक उड्डयन मंत्री श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया* 


*राज्यसभा सांसद श्री विनय जी सहस्त्रबुद्धे*


*मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान* 


*पर्यटन मंत्री मध्यप्रदेश शासन श्री उषा दीदी ठाकुर*


*एवं समस्त श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रतिष्ठान के सदस्य गण।*


भवदीय


*संस्थापक एवं संरक्षक*


*श्रीपाद कुलकर्णी बांगर*


*श्रीमंत बाजीराव पेशवा स्मृति प्रतिष्ठान मध्य प्रदेश*