*बांगरू बाण*
*संकलित:--*
श्रीपादावधूत
*एक संन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा। वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे। संन्यासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछने लगा,*
*"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?"*
*शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, "क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”*
*"पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है। जो कहना है वो आप सामान्य आवाज़ में भी तो कह सकते हैं"*
*संन्यासी ने पुनः प्रश्न किया। कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देन का प्रयास किया पर बाकि लोग संतुष्ट नहीं हुए।*
*अंततः संन्यासी ने समझाया…!!!!*
*“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं! और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा। लेकिन जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है, और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”*
*इसी को सच्चा प्रेम कहते है जहाँ दिल की बात को दिल समझ लेता है उसे शब्दों की जरुरत नहीं होती।*
*इसीलिए हिंदू समाज में ईश्वर आराधना मौन होकर की जाती है क्योंकि हम उस परमपिता परमेश्वर से असीम प्रेम और श्रद्धा रखते हैं। जिन धर्मावलंबियों का ईश्वर से प्रेम ना होकर किसी पुस्तक या किसी व्यक्ति विशेष की बातों पर ही केवल भरोसा हो उन्हें अपनी बात कहने के लिए लाउडस्पीकर जैसे साधनों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि उनकी और उनके ईश्वर से इतनी दूरी है कि उन्हें चिल्लाकर ही अपनी बात को अभिव्यक्त करना पड़ता है।*
*कबीर ने कहा है*
*गुंगे केरी सरकरा, खाई और मुसकाई ।। "*
*कबीर दास जी कहते है कि "प्रेम की कहानी बड़ी अजीब है, इसे कहा नहीं जा सकता जैसे कोई कोई गूंगा आम का मीठा रस खाता है लेकिन उसकी मिठास को कह नहीं पाता इसी प्रकार जिसने इस प्रेम रस को पिया है वह सिर्फ मुसकाता है । वह गूंगे जैसा हो जाता है बोलने के लिए कुछ भी नही बचता।*
*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

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