Friday, June 16, 2023

बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय।

*बांगरू बाण*

*संकलित:--*
श्रीपादावधूत 

*प्रस्तुत कथानक के बारे में लोगों की भिन्न-भिन्न राय है कि बाज इस प्रकार की कोई प्रक्रिया नहीं अपनाता यह केवल एक मिथक है लेकिन जो भी इस कथानक में वर्णित घटनाक्रम से एक सीख तो मिलती ही है। जीवन को किस प्रकार जीया जाये, बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय। अपने आप को किस प्रकार फिर तैयार किया जाय।*  

*बाज लगभग 70 वर्ष जीता है.... परन्तु अपने जीवन के 40 वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है । उस अवस्था में उसके शरीर के 3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं.....*
*1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं ।*
*2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है, और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है ।*
*3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूर्णरूप से खुल नहीं पाते हैं, उड़ान को सीमित कर देते हैं ।* *इस कारण भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना.. तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं ।*
*उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं....*
*1. देह त्याग दे,*
*2. अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे !!*
*3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।"*
*जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता। लेकिन बाज तीसरा रास्ता चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।*
*वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है .. और तब स्वयं को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है !!"*
*सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं है पक्षीराज के लिये ! और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का । उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है .. पंजों के पुनः उग आने का ।*
*नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है ! और प्रतीक्षा करता है .. पंखों के पुनः उग आने का ।*
*150/160 दिनों की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद... उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी.... इस पुनर्स्थापना के बाद वह लगभग 30 साल और जीता है .... ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ ।*

*ऐसी ही कुछ परिस्थिति हम मनुष्यों के साथ भी आती है जब हम 40/50 की उम्र में पहुँचते है तब इसी प्रकार इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं क्योंकि हम भूतकाल से जकडे हुए रहते है और आने वाली कठिनाईयों से लड़ने के लिए हम तैयार नहीं होते और इन परिस्थितियों से परिवार के नाम पर, समाज के नाम पर समझौता कर लेते है लेकिन हमें अस्तित्व के इस भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी तभी हम उसी ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ जी पायेंगे।* 
*इसके लिए हमें 150 दिन न सही.....पर कम से कम 30/40 दिन ही बिताए जा सकते है स्वयं को पुनर्स्थापित करने में ! इस प्रक्रिया को हम 15/15 या 20/20 दिनों के दो हिस्सों में बाँट कर भी कर सकते है* 
*किसी एकांत जगह में जाकर प्रकृति के सानिध्य में तन मन को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया अपनाए।* *आरएसएस द्वारा संचालित OTC केम्प या वर्ग भी एक अच्छा माध्यम हो सकता है। या योग और विपश्यना की साधना की जा सकती हैं। जो आसान नहीं है लेकिन जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही !! और इसका परिणाम यह होगा कि आप फिर से बाज की तरह उड़ानें भरने को तैयार होंगे.. इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी ।*
*हर दिन कुछ चिंतन किया जाए और आप ही वो व्यक्ति हैं जो स्वयं को दुसरो से बेहतर जानता है ।*
*इसी तरह एक सफल व्यक्ति भी परिवर्तनों से ही आगे बढ़ता है। समाज में कई बार ऐसे परिवर्तनों के कारण उसकी आलोचना होती है, उसे गलत कहा जाता है। लेकिन वो व्यक्ति अपने ध्येय की ओर लक्ष्य की ओर बढ़ जाता है। जिस तरह बाज एकांत में खुद को बदलता है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता की कोई क्या कहेगा। उसी प्रकार हमें भी एकचित्त होकर ईमानदारी से मेहनत करनी चाहिए और नकारात्मक चीजों से सदा दूर रहना चाहिए।*

*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

No comments:

Post a Comment