Saturday, July 8, 2023
Friday, June 16, 2023
अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई
*बांगरू बाण*
*संकलित:--*
श्रीपादावधूत
*एक संन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा। वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे। संन्यासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछने लगा,*
*"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?"*
*शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, "क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”*
*"पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है। जो कहना है वो आप सामान्य आवाज़ में भी तो कह सकते हैं"*
*संन्यासी ने पुनः प्रश्न किया। कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देन का प्रयास किया पर बाकि लोग संतुष्ट नहीं हुए।*
*अंततः संन्यासी ने समझाया…!!!!*
*“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं! और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा। लेकिन जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है, और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”*
*इसी को सच्चा प्रेम कहते है जहाँ दिल की बात को दिल समझ लेता है उसे शब्दों की जरुरत नहीं होती।*
*इसीलिए हिंदू समाज में ईश्वर आराधना मौन होकर की जाती है क्योंकि हम उस परमपिता परमेश्वर से असीम प्रेम और श्रद्धा रखते हैं। जिन धर्मावलंबियों का ईश्वर से प्रेम ना होकर किसी पुस्तक या किसी व्यक्ति विशेष की बातों पर ही केवल भरोसा हो उन्हें अपनी बात कहने के लिए लाउडस्पीकर जैसे साधनों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि उनकी और उनके ईश्वर से इतनी दूरी है कि उन्हें चिल्लाकर ही अपनी बात को अभिव्यक्त करना पड़ता है।*
*कबीर ने कहा है*
*गुंगे केरी सरकरा, खाई और मुसकाई ।। "*
*कबीर दास जी कहते है कि "प्रेम की कहानी बड़ी अजीब है, इसे कहा नहीं जा सकता जैसे कोई कोई गूंगा आम का मीठा रस खाता है लेकिन उसकी मिठास को कह नहीं पाता इसी प्रकार जिसने इस प्रेम रस को पिया है वह सिर्फ मुसकाता है । वह गूंगे जैसा हो जाता है बोलने के लिए कुछ भी नही बचता।*
*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*
अमरनाथ की पवित्र गुफा के समान ही आस्ट्रिया में भी गुफा की खोज
ये आस्ट्रिया में सेल्जबर्ग क्षेत्र में गुफाओं के जाल के रूप में 40 किमी के दायरे में फैला है। 1879 में सेल्जबर्ग के एन्टन पोसेल्ट नामक वैज्ञानिक ने इन गुफाओं में 200 मीटर तक जाकर इनकी औपचारिक खोज अपने नाम दर्ज कराई और इसे माउन्टनोयरिंग मेगजीन में छपवाया, इससे पहले यहां सिर्फ शिकारी जाया करते थे। 1920 से यहां पर्यटकों का आवागमन शुरू हुआ। भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक परीक्षणों से ज्ञात होता है कि ये बर्फ की शिलाएं करीब 1000 साल पुरानी है।
ये बिल्कुल बर्फ के शिवलिंग के समान दिखती है।अमरनाथ के शिवलिंग मंदिर और ईस्रीसनवेल्ट गुफाओं में एक अन्यसमानता यह भी है कि यहां बर्फ का गठन बारहमासी नहीं है। ये दोनों गुफाएं गतिशील और चक्रीय मौसम परिवर्तनों से प्रभावित होती है। इनमें पड़ी दरारें यहां आने वाली हवा को तरल रूप में यहां से वहां प्रवाहित होने देती है। गुफाओं के भीतर का तापमान बाहर के तापमान की तुलना में सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रहता है। सर्दियों में जब गुफाओं में हवा अपेक्षाकृत गर्म होती है तो बाहर के वायुमण्डल की ठंडी हवा आकार गुफाओं की निचली सतह के क्षेत्र को जमाव बिंदु से नीचे ले आती है। गर्मियों में ये बर्फ की शिलाएं गलना शुरू हो जाती है और इनका प्रतिरूप उत्कृष्ठ प्रतिमाओं के रूप देखा जा सकता है ।
