Saturday, July 8, 2023

बांगरू बाण 
श्रीपादावधूत की कलम से 

*शाब्दिक सुबह*
          *अर्थपूर्ण दिवस*

*यूनेस्को के अनुसार भाषा मात्र संपर्क, शिक्षा या विकास का माध्यम न होकर व्यक्ति की विशिष्ट पहचान और उसकी संस्कृति, परंपरा एवं इतिहास का भंडार है। इसके साथ ही सांस्कृतिक मूल्यों की विरासत को संजोने का कार्य भी मातृभाषा ही करती है। मातृभाषा का महत्व धर्म जाति पंथ संप्रदाय आदि से भी अधिक है। जब कहीं कोई भाषा विलुप्त होती है तो उसके साथ एक संस्कृति और परंपरा भी विलुप्त हो जाती है।*

भारत अपनी भाषाई विविधता के कारण अनेक देशों का एक देश प्रतीत होता हैं। लगभग एक सहस्त्र वर्ष की अवधि के बाद पराधीनता के कारण भारत में समय-समय पर विविध भाषाओं का प्रसार होता रहा। 
*वस्तुतः " यदि किसी जाति, धर्म अथवा देश को पराधीन रखना है तो उसके साहित्य को नष्ट कर देना चाहिए, वह स्वयं नष्ट हो जायेगा।"* 

इस बात को ध्यान में रखते हुए *विदेशियों द्वारा हमारी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य पर निरन्तर कुठाराघात होता रहा। साधारण आदमी कभी-कभी आत्म-बल की कमी के कारण, तो कभी उदर पालन की समस्याओं के कारण उनसे टक्कर लेने में असमर्थ रहा और उन्हीं के रंग में उसने अपने को रंग लिया।* 
*भारत की संस्कृति एवं विरासत को अगर किसी भाषा ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है तो वह निश्चित रूप से अंग्रेजी है। फिर भी हर एक भाषा की अपनी एक पहचान अपनी एक विशेषता होती है जिसके शब्दों से विशिष्टता झलकती है तो आज हम इसे अंग्रेजी भाषा के कुछ शब्दों के माध्यम से अंग्रेजी भाषा को जानने का प्रयास करेंगे।*

अंग्रेजी भाषा में प्रेम की अभिव्यक्ति या परस्पर प्रेम अनुभूति के लिए इन तीन शब्दों का प्रयोग किया जाता है .......

1. *Boyfriend*
 2. *Girlfriend*
  3. *Family*

किन्तु एक बात ध्यान देने वाली है कि .....

*Boyfriend* और 
*Girlfriend*   
 इन दो शब्दों के अन्तिम तीन अल्फाबेट है *end*  
इसलिये ये सम्बन्ध एक ना एक दिन ख़त्म हो जाते हैं ।

 परन्तु .....

तीसरा शब्द है :
*FAMILY* = *FAM* + *ILY*      
जिसके पहले तीन अल्फाबेट से बनता है :

*FAM* = *Father* And *Mother*  

और अन्तिम तीन अल्फाबेट से :
*ILY* = *I Love You*

अत: जिस शब्द का आरम्भ पिता एंव माता से और अन्त प्यार के साथ हो, *वह शब्द सही अर्थों में परिवार है !!!* 

*यही परिवार भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा का प्रतीक रहा है अंग्रेजी भाषा में तो केवल शब्दों के माध्यम से इसे समझाने का प्रयास किया है लेकिन भारत ने इसे अपने दैनंदिन व्यवहार में उतारकर जीवन जीने का एक आदर्श दृष्टिकोण समाज में स्थापित किया है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Friday, June 16, 2023

अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई

 *बांगरू बाण*


*संकलित:--* 

श्रीपादावधूत 


*एक संन्यासी  अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा। वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे। संन्यासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछने लगा,*

*"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?"* 

*शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, "क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”*

 *"पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है। जो कहना है वो आप सामान्य आवाज़ में भी तो कह सकते हैं"* 

*संन्यासी ने पुनः प्रश्न किया। कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देन का प्रयास किया पर बाकि लोग संतुष्ट नहीं हुए।*

*अंततः संन्यासी ने समझाया…!!!!*

*“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं! और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा। लेकिन जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है, और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”* 

*इसी को सच्चा प्रेम कहते है जहाँ दिल की बात को दिल समझ लेता है उसे शब्दों की जरुरत नहीं होती।*

*इसीलिए हिंदू समाज में ईश्वर आराधना मौन होकर की जाती है क्योंकि हम उस परमपिता परमेश्वर से असीम प्रेम और श्रद्धा रखते हैं। जिन धर्मावलंबियों का ईश्वर से प्रेम ना होकर किसी पुस्तक या किसी व्यक्ति विशेष की बातों पर ही केवल भरोसा हो उन्हें अपनी बात कहने के लिए लाउडस्पीकर जैसे साधनों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि उनकी और उनके ईश्वर से इतनी दूरी है कि उन्हें चिल्लाकर ही अपनी बात को अभिव्यक्त करना पड़ता है।*


*कबीर ने कहा है*

*"अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई ।* 

*गुंगे केरी सरकरा, खाई और मुसकाई ।। "* 

*कबीर दास जी कहते है कि "प्रेम की कहानी बड़ी अजीब है, इसे कहा नहीं जा सकता जैसे कोई कोई गूंगा आम का मीठा रस खाता है लेकिन उसकी मिठास को कह नहीं पाता  इसी प्रकार  जिसने इस प्रेम रस को पिया है वह सिर्फ मुसकाता है । वह गूंगे जैसा हो जाता है बोलने के लिए कुछ भी नही बचता।*


*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

अमरनाथ की पवित्र गुफा के समान ही आस्ट्रिया में भी गुफा की खोज

भगवान अमरनाथ की पवित्र गुफा के समान ही आस्ट्रिया में भी गुफा की खोज हुई है जिसमें ठीक उसी तरह का बर्फ से बना शिवलिंग मिला है। जैसा कि सैकड़ों सालों से अमरनाथ धाम में बनता आया है। इस तरह की शिवलिंग की शिलाएं सिर्फ यूरोप में पाई गईं। यूरोप मे
ं आस्ट्रिया की ईस्रीसनवेल्ट और स्लोवालिया में डिमेनोवस्का की गुफाएं अमरनाथ की तरह है। ईस्रीसनवेल्ट गुफाएं सबसे बड़ी है और इनकी बर्फ शिलाओं का आकार पवित्र अमरनाथ की तुलना में शिवलिंग से बहुत अधिक मिलता है।
ये आस्ट्रिया में सेल्जबर्ग क्षेत्र में गुफाओं के जाल के रूप में 40 किमी के दायरे में फैला है। 1879 में सेल्जबर्ग के एन्टन पोसेल्ट नामक वैज्ञानिक ने इन गुफाओं में 200 मीटर तक जाकर इनकी औपचारिक खोज अपने नाम दर्ज कराई और इसे माउन्टनोयरिंग मेगजीन में छपवाया, इससे पहले यहां सिर्फ शिकारी जाया करते थे। 1920 से यहां पर्यटकों का आवागमन शुरू हुआ। भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक परीक्षणों से ज्ञात होता है कि ये बर्फ की शिलाएं करीब 1000 साल पुरानी है।

ये बिल्कुल बर्फ के शिवलिंग के समान दिखती है।अमरनाथ के शिवलिंग मंदिर और ईस्रीसनवेल्ट गुफाओं में एक अन्यसमानता यह भी है कि यहां बर्फ का गठन बारहमासी नहीं है। ये दोनों गुफाएं गतिशील और चक्रीय मौसम परिवर्तनों से प्रभावित होती है। इनमें पड़ी दरारें यहां आने वाली हवा को तरल रूप में यहां से वहां प्रवाहित होने देती है। गुफाओं के भीतर का तापमान बाहर के तापमान की तुलना में सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रहता है। सर्दियों में जब गुफाओं में हवा अपेक्षाकृत गर्म होती है तो बाहर के वायुमण्डल की ठंडी हवा आकार गुफाओं की निचली सतह के क्षेत्र को जमाव बिंदु से नीचे ले आती है। गर्मियों में ये बर्फ की शिलाएं गलना शुरू हो जाती है और इनका प्रतिरूप उत्कृष्ठ प्रतिमाओं के रूप देखा जा सकता है ।

बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय।

*बांगरू बाण*

*संकलित:--*
श्रीपादावधूत 

*प्रस्तुत कथानक के बारे में लोगों की भिन्न-भिन्न राय है कि बाज इस प्रकार की कोई प्रक्रिया नहीं अपनाता यह केवल एक मिथक है लेकिन जो भी इस कथानक में वर्णित घटनाक्रम से एक सीख तो मिलती ही है। जीवन को किस प्रकार जीया जाये, बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय। अपने आप को किस प्रकार फिर तैयार किया जाय।*  

*बाज लगभग 70 वर्ष जीता है.... परन्तु अपने जीवन के 40 वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है । उस अवस्था में उसके शरीर के 3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं.....*
*1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं ।*
*2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है, और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है ।*
*3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूर्णरूप से खुल नहीं पाते हैं, उड़ान को सीमित कर देते हैं ।* *इस कारण भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना.. तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं ।*
*उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं....*
*1. देह त्याग दे,*
*2. अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे !!*
*3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।"*
*जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता। लेकिन बाज तीसरा रास्ता चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।*
*वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है .. और तब स्वयं को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है !!"*
*सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं है पक्षीराज के लिये ! और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का । उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है .. पंजों के पुनः उग आने का ।*
*नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है ! और प्रतीक्षा करता है .. पंखों के पुनः उग आने का ।*
*150/160 दिनों की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद... उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी.... इस पुनर्स्थापना के बाद वह लगभग 30 साल और जीता है .... ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ ।*

*ऐसी ही कुछ परिस्थिति हम मनुष्यों के साथ भी आती है जब हम 40/50 की उम्र में पहुँचते है तब इसी प्रकार इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं क्योंकि हम भूतकाल से जकडे हुए रहते है और आने वाली कठिनाईयों से लड़ने के लिए हम तैयार नहीं होते और इन परिस्थितियों से परिवार के नाम पर, समाज के नाम पर समझौता कर लेते है लेकिन हमें अस्तित्व के इस भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी तभी हम उसी ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ जी पायेंगे।* 
*इसके लिए हमें 150 दिन न सही.....पर कम से कम 30/40 दिन ही बिताए जा सकते है स्वयं को पुनर्स्थापित करने में ! इस प्रक्रिया को हम 15/15 या 20/20 दिनों के दो हिस्सों में बाँट कर भी कर सकते है* 
*किसी एकांत जगह में जाकर प्रकृति के सानिध्य में तन मन को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया अपनाए।* *आरएसएस द्वारा संचालित OTC केम्प या वर्ग भी एक अच्छा माध्यम हो सकता है। या योग और विपश्यना की साधना की जा सकती हैं। जो आसान नहीं है लेकिन जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही !! और इसका परिणाम यह होगा कि आप फिर से बाज की तरह उड़ानें भरने को तैयार होंगे.. इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी ।*
*हर दिन कुछ चिंतन किया जाए और आप ही वो व्यक्ति हैं जो स्वयं को दुसरो से बेहतर जानता है ।*
*इसी तरह एक सफल व्यक्ति भी परिवर्तनों से ही आगे बढ़ता है। समाज में कई बार ऐसे परिवर्तनों के कारण उसकी आलोचना होती है, उसे गलत कहा जाता है। लेकिन वो व्यक्ति अपने ध्येय की ओर लक्ष्य की ओर बढ़ जाता है। जिस तरह बाज एकांत में खुद को बदलता है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता की कोई क्या कहेगा। उसी प्रकार हमें भी एकचित्त होकर ईमानदारी से मेहनत करनी चाहिए और नकारात्मक चीजों से सदा दूर रहना चाहिए।*

*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

Wednesday, June 14, 2023

गुंडा शब्द का सही एवं समीचीन अर्थ।*

*बांगरू-बाण*

श्रीपादावधूत की कलम से 

*शाब्दिक सुबह*
     *अर्थपूर्ण दिवस*

      🌹 *गुंडा* 🌹

*यह शब्द सुनते ही हमारे मन-मस्तिष्क में एक बहुत ही दुर्दांत अपराधी समाजकंटक ऐसी तस्वीर उभरती है लेकिन क्या वास्तव में गुंडा शब्द इन लोगों के लिए जो प्रयुक्त होता है वह सही एवं सटीक है क्या..??* 

*जी नहीं गुंडा शब्द का अर्थ होता है गुणों से युक्त*

 *फिर प्रश्न उत्पन्न होता है कि गुंडा यह शब्द अपराधी बदमाश के अर्थ में कब क्यों और कैसे प्रचलित हो गया तो आइए आज जानते हैं गुंडा शब्द का सही एवं समीचीन अर्थ।*

*कबीर ने "गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?*

*नहीं।* 

*सूरदास ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं।* 

*तुलसी ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

 *नहीं ।*

*जायसी , बिहारी , मतिराम , चिंतामणि आदि प्राचीन कवियों में से किसी ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं ।*

*प्राचीन काल के कवियों को छोड़िए , आधुनिक काल में हिंदी साहित्य के पुरोधा माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं ।*

*20 वीं शताब्दी से पहले दुनिया में किसी ने भी बदमाश के अर्थ में " गुंडा " शब्द का प्रयोग नहीं किया है ।* 

*तो आइए जानते हैं गुंडा शब्द का असली अर्थ क्या है और यह कैसे प्रचलन में आया।*

*आज "गुंडा"  एक गाली है।* इसे आजकल किसी के ऊपर भी बड़ी सहजता से चस्पां कर दिया जाता है। और तो और *हमारे आर्मी चीफ, जनरल रावत, तक को “सड़क का गुंडा” बता दिया* गया। *बेनी प्रसाद वर्मा ने मोदी जी के प्रधान-मंत्री बनने से पहले आर एस एस के “सबसे बड़े गुंडे”* कहकर सम्मानित (?) किया था।

*अजब नहीं तुक्का, जो तीर हो जाए।*
*दूध फट जाए कभी तो, पनीर हो जाए।*
*मवालियों को न देखा करो, हिकारत से* 
*न जाने कौन सा गुंडा, वजीर हो जाए।*

*पुलिस को तो“वर्दी वाला गुंडा”* कहना आम बात है। *छोटे-मोटे अपराधी "गली-छाप गुंडे"* कहलाते हैं। कुछ टेक्स सरकार लगाती है, *कुछ गुंडे वसूल करते हैं। इसे "गुंडा-टेक्स"  कहा जाता है।* *गुंडों से बचने के लिए हमारे यहाँ बाकायदा "गुंडा-एक्ट" हैं, एंटी-रोमियो "गुंडा एक्ट" भी है। "गुंडा-स्क्वाड" है। आम जनता जो "गुंडों" और "गुंडा-एक्ट", दोनों से ही त्रस्त है,* अक्सर सवाल करती है, क्या गुंडा स्क्वैड वास्तव में गुंडों को बचाने के लिए गुंडों का ही स्क्वाड तो नहीं है ? और उसे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाता। सभी को विदित है कि *बहुत से सफ़ेद-पोश, नेता लोग अपने स्वार्थ साधने के लिए "किराए के गुंडे" भी पाल लेते हैं।*

 *उत्तर भारत में जो हिन्दुस्तानी ज़बान बोली जाती है, उसमें गुंडा शब्द का अर्थ बदमाश, दुर्वृत्त, खोंटे चाल-चलन वाला, उदंड और झगड़ालु व्यक्ति से लगाया जाता है।* 

*गुंडाशाही, गुंडागर्दी, गुंडई और गुंडाराज जैसे पद भी "गुंडा" शब्द से ही बने हैं। किन्तु दक्षिण भारत की भाषाओं में प्राय: "गुंड" और "गुंडा" शब्दों में कोई अनैतिक और नकारात्मक भाव नहीं है।* 

*मराठी में "गाँव-गुंड" ग्राम नायक या ग्राम-योद्धा है। वहां गुंडा के मूल में प्रधान या नेता का भाव है।* 
*इसी प्रकार मराठी के संत कवि जगद्गुरु तुकाराम महाराज ने भी अपने अभंग में  गुंडा शब्द का प्रयोग किया है वह अभंग इस प्रकार है।* 

*"पुत्र व्हावा ऐसा गुंडा। त्याचा तिही लोकी झेंडा। कन्या ऐसी देई। जैसी मिरा मुक्ताबाई ।।"*

*अर्थात पुत्र ऐसा होना चाहिए जिसका यश तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना चाहिए। यहां गुंडा शब्द का अर्थ उसका यश उसके प्रसिद्धि के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।*

*तमिल में भी गुंडा शब्द एक शक्तिशाली और ताकतवर नायक की अर्थवत्ता प्रदान करता है। "गुंडराव" "गुंडराज" जैसे पद इसके उदाहरण हैं। दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक के एक बड़े कांग्रेसी नेता का नाम आप सबको याद होगा आर. गुंडू राव। जो कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे। वर्तमान में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी है और इस सरकार में एक मंत्री इन्हीं आर. गुंडूराव के पुत्र हैं जिनका नाम है दिनेश गुंडू राव।*

*वस्तुत: "गुंड" का अर्थ किसी उभार या गाँठ से है। किसी समतल जगह पर कोई भी उभार अपनी एक विशिष्ठता की छाप छोड़ता है। इसी तरह समाज में किसी व्यक्ति का उभार उसे ख़ास बना देता है। वह समाज का नायक हो जाता है। गुंड का अर्थ इस प्रकार नायक, योद्धा या शूरवीर से लगाया जाता है।*

*हिन्दी के अधिकतर कोशों में "गुंड" और "गुंडा" शब्दों की व्युत्पत्ति संस्कृत के “गुन्डक:” पद से बताई गई है। संस्कृत में "गुन्डक:" का अर्थ "धूलि या धूलमिला आटा" है। तैलपात्र तथा मंद स्वर" को भी गुन्डक कहा जाता है। संस्कृत के गुन्डक में इस प्रकार न तो नायकत्व की भावना है और न ही कोई दुर्वृत्ति है।*

*हिंदी में " गुंडा " शब्द अंग्रेजों की फाइल से आया है , तब जब 20 वीं शताब्दी के पहले दशक में बस्तर के आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी "वीर गुंडा" को अंग्रेजों ने गुंडा ( बदमाश ) मान लिया ।* 

*भारतीयों की नजर में वीर गुंडा स्वतंत्रता सेनानी थे, मगर अंग्रेजों की नजर में बिगड़ैल, बदमाश अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने वाले।* 

*इसलिए अंग्रेजों ने एक कानून बनाया और उसे नाम दिया "गुंडा-एक्ट" । और जो भी भारतीय अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ खड़ा होता या विरोध करता उसे वे "गुंडा-एक्ट" के तहत जेल में बंद कर देते थे।*  

*वस्तुत:  "गुंडा" एक जनजाति के नायक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम है, जिसने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।* 
*इसीलिए "गुंडा" शब्द का प्रयोग पहली बार अंग्रेजों ने बदमाश" के अर्थ में किया।*

*इस योद्धा का पूरा नाम "गुंडा धुर" था। 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ छत्तीसगढ़ के बस्तर में  "भूमकाल-विद्रोह" में इस "गुंडा धुर" वीर ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। अंग्रेजी शासन के दस्तावेजों में "गुंडा धुर" को विद्रोही और "गुंडा"  (बदमाश, उद्दंडतापूर्वक आचरण करनेवाला) बतलाया गया है।* 

*अंग्रेजों की नजर में "गुंडा धुर" की छवि उद्दंड और बदमाश की थी पर अपने देशवासियों की नजर में वे स्वतंत्रता सेनानी और वीर थे। कालेन्द्र सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की सुनियोजित रूपरेखा तैयार की गई थी। रानी सुबरन कुँवर ने क्रांतिकारियों की सभा में "मुरिया राज" की स्थापना की घोषणा की। रानी के सुझाव पर "वीर गुंडा धुर" को "भूमकाल-विद्रोह" का नेता निर्वाचित किया गया।*
 *1 फरवरी, 1910 को संपूर्ण बस्तर में अंग्रेजी दासता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बज उठा।*

*विडंबना देखिए गुलामी की मानसिकता से ग्रस्त भारत के कोशकारों ने अंग्रेजों का अनुगमन करके "गुंडा" का अर्थ "बदमाश" कर दिया है।* 

*अब जब स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने को है और एक नया इतिहास लिखा जाना है भारतीय कोशकारों की जिम्मेदारी है कि अंग्रेजों द्वारा प्रयुक्त "बदमाश" के अर्थ में "गुंडा" शब्द को डिक्शनरी से बाहर करके, "वीर स्वतंत्रता सेनानी" के अर्थ में उसे प्रचलित किया जाना चाहिए। "बदमाश" के अर्थ में "गुंडा" शब्द एक जनजाति समाज के स्वतंत्रता सेनानी का अपमान है।*

 
*यह कहानी है गुंडा शब्द के कानून बनने और उसके बदमाश के अर्थ में प्रचलित होने की लेकिन दुर्भाग्य देखिए इस देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो गए हैं और आज भी आजाद भारत में "गुंडा-एक्ट" अस्तित्व में है।* 

*क्यों ?* 

*जिसने देश को आजाद कराया, वहीं गुंडा धुर* 
*गुंडा है बदमाश है*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त।

मोक्षपट, मोक्षपात, मोक्ष पटामू, परम पदम अर्थात आज का "सांप-सीढीं" का खेल।*

*बांगरू बाण*

श्रीपादावधूत की कलम से

*मोक्षपट, मोक्षपात, मोक्ष पटामू, परम पदम अर्थात आज का सांप सीढ़ी का खेल।*

*किसी भी देश की संस्कृति सभ्यता धरोहर को नष्ट करना हो तो सबसे पहले उस देश के निवासियों को उनकी भाषा और उनके इतिहास से अलग किया जाता है। क्योंकि भाषा और इतिहास उस देश के निवासियों में आत्म गौरव का स्वाभिमान का भाव जागृत करते हैं। यही कार्य इस देश में पहले मुसलमानों ने और बाद में अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने तो सुनियोजित षड्यंत्रपूर्वक इस देश के समस्त बौद्धिक संपदा को लूट कर उसका अनुवाद अंग्रेजी में कर संपूर्ण दुनिया में प्रसारित किया। पूरे विश्व में जितनी भी खोजें हुई है वह सारी खोजें 17 वी शताब्दी के बाद ही अस्तित्व में क्यों आती हैं? कारण स्पष्ट है अगर आप समझना चाहे तो। यह वही काल है जब इस देश पर अंग्रेजों का आक्रमण होता है । संपूर्ण देश पर धीरे-धीरे एकछत्र राज्य स्थापित हो जाता हैं और यहां की धन संपत्ति खनिज व बौद्धिक संपदा को लूटकर  इंग्लैंड भेजा जाता है और वही से वह सारी खोज व सारे आविष्कार वह सारी बातें अंग्रेजों के नाम से संपूर्ण विश्व में प्रचारित की जाती है। इसी का एक उदाहरण है यह सांप सीढ़ी का खेल।* 
*कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात होगी कि मोक्षपट या मोक्ष पटामू के रूप में जाना जाने वाला खेल मूल सांप और सीढ़ी था।* *"भारत महान आविष्कारों और नवाचारों की भूमि रहा है, हालांकि अधिकांश भारतीय शायद ही उनके बारे में जानते हैं। क्योंकि हमें यह सब ना तो बताया गया है ना पढ़ाया गया है जो पढ़ाया है वह गुलामी का इतिहास है और इस इतिहास में हम कितने जाहिल थे गंवार थे। यही सारी गलत बातें हमें इतिहास में पढ़ाई जाती हैं और यहां का व्यक्ति उस इतिहास को पढ़कर यह मान्य भी कर लेता है।* 

*तो आइए जानते हैं कि मोक्षपट क्या है?*
*हालाँकि इस खेल की उत्पत्ति का श्रेय संत ज्ञानेश्वर जी को दिया जाता है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से खेला जाता रहा है। इस खेल का उद्देश्य बच्चों में नैतिक शिक्षा देना था ।जिन चौकों पर सीढ़ी शुरू होती है वे पुण्य के लिए खड़े होते हैं जबकि सांप के सिर वाले वर्ग पाप या बुराई की विशेषता का प्रतीक होते हैं।*

 *1892 में औपनिवेशिक शासकों द्वारा इसे ब्रिटेन में संशोधनों के साथ पेश किया गया था। जब खेल को इंग्लैंड ले जाया गया तो इसमें नैतिक पाठ और धार्मिक पहलुओं हटा दिया गया पाश्चात्य सभ्यता से परिपूर्ण मूल्यों में इसे बदल कर स्नेक एंड लैडर  के रूप में प्रचारित किया। पुराने भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत इस खेल में सांपों की संख्या अधिक थी एवं सीढ़ियां कम थी लेकिन अंग्रेजों ने सांप-सीढ़ी की संख्या भी बराबर कर दी गई। खेल को अमेरिका में च्यूट्स एंड लैडर्स के रूप में पेश किया गया था।"*

*प्राचीन भारतीयों की अन्य खोजें सिर्फ सांप-सीढ़ी ही नहीं बल्कि भारत कई प्राचीन खेलों का जन्मस्थान है। शतरंज की उत्पत्ति भारत में सिंधु सरस्वती सभ्यता के पुरातात्विक स्थलों में *"शतरंज"* *के समान एक खेल के प्रमाण के साथ हुई थी। इसे मूल रूप से "अष्टपद" कहा जाता था और *गुप्त काल" के दौरान "चतुरंग" के रूप में जाना जाने लगा। "लूडो" पहली बार छठी शताब्दी में खेला गया था, इसकी उत्पत्ति "पांडवों और कौरवों" द्वारा खेले जाने वाले "चौसर" नामक प्राचीन खेल से हुई है। इतिहासकार इस बात को प्रमाणित करते हैं कि एलोरा की गुफाओं में इस खेल का चित्रण है। मार्शल आर्ट जो बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया में फैला, भारत में उत्पन्न हुआ। दिलचस्प बात यह है कि बैडमिंटन का आधुनिक रूप भी भारत में पैदा हुआ था और बाद में औपनिवेशिक शासकों द्वारा इसे ब्रिटेन ले जाया गया।*

*भारत को अध्यात्म की भूमि के रूप में जाना जाता है, हमारे पूर्वज कई क्षेत्रों में बहुत उन्नत थे। हमारे ऋषि कई अन्य क्षेत्रों के अलावा गणित और खगोल विज्ञान से लेकर चिकित्सा जैसे विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ थे। उन्होंने इन शक्तियों का उपयोग किया और कई वैज्ञानिक खोजें कीं। इनका उपयोग आम नागरिकों के जीवन को आसान बनाने के लिए किया गया था। इन प्रतिभाशाली ऋषि-मुनियों दिमागों की एक झलक है, जिन्होंने भारत को ज्ञान की भूमि बनाया और यहां तक कि खेलों के माध्यम से मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा के दोहरे उद्देश्य को भी बहुत आसान ढंग से समाज में स्थापित किया।*

*"तो चलिए आज चर्चा सांप सीढ़ी के खेल पर करते हैं।*
*इस खेल के बारे में सबसे पहला उल्लेख 13वीं शताब्दी के महाराष्ट्र के संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज से मिलता है।* 
*डेनमार्क के इतिहासकार मिस्टर जेकॉब और पुणे के  इतिहास संशोधक वा. ल. मंजुळ इन्होंने सबसे पहले ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि इस खेल को संत ज्ञानेश्वर महाराज ने अपने दो छोटे भाई बहनों सोपान और मुक्ताबाई को खेलने हेतु यह खेल उनके निवास स्थान के बाहर एक चट्टान पर  बना करके दिया था। आपको विदित ही होगा कि संत ज्ञानेश्वरजी, निवृत्ति नाथ, सोपानदेव और मुक्ताबाई यह चार भाई बहन थे। इनमें दो बड़े भाई ज्ञानेश्वर और निवृत्तिनाथ जब भिक्षा लेने ने के लिए जाते थे तब अपने दो छोटे भाई बहनों को यह खेल खेलने के लिए देते थे। यह खेल खिलाने के पीछे उनका उद्देश्य सिर्फ इतना ही था कि 2 बड़े भाइयों की अनुपस्थिति में दो छोटे भाई बहन इस खेल को खेल कर अपना समय व्यतीत करें, साथ ही छोटे बच्चों को इस खेल के माध्यम से अच्छे संस्कार भारतीय संस्कृति के उद्देश्य उनकी शिक्षा यह सब मिलती रहे। इतनी उदात्तता को लेकर तैयार किया गया था यह "सांप-सीढ़ी" का खेल। लेकिन दुर्भाग्य देखिए अंग्रेजों ने इसे अपने नाम से चिपका कर हमारे सामने रखा और हमने आंख मूंदकर विदेशी है; आयातित हैं; तो अच्छा ही होगा इसके आधार पर स्वीकार कर लिया।* 
*डेनमार्क के इतिहासकार मिस्टर जेकॉब ने "मध्ययुगीन भारत में खेले जाने वाले खेल" यह विषय लेकर अपनी पीएचडी की उपाधि प्राप्त की तब उन्हें "इंडियन कल्चर ट्रेडीशन के संदर्भ में डेक्कन महाविद्यालय पुणे" के "प्रोफेसर रा. चि. ढेरे" के हस्तलिखित संग्रह से दो मोक्षपट प्राप्त हुए अर्थात "सांप सीढ़ी" के खेल प्राप्त हुए।* 
*इसी प्रकार विजुअल फैक्टफाइंडर हिस्ट्री टाइमलाइन इस पुस्तक में वर्ष 1199 से 1209 इस कालखंड में पूरे दुनिया में जो भी कोई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी या अविष्कार हुए उसमें संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा कौड़ी और पांसो के माध्यम से एक खेल खेला गया इस प्रकार का उल्लेख प्राप्त हुआ।* 

*13 वीं शताब्दी के कवि संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा रचित इस खेल में सीढ़ियां सद्गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं और सांप अवगुणों का। खेल कौड़ियों और पासों से खेला जाता था। बाद में समय के साथ, खेल में कई संशोधन हुए लेकिन अर्थ वही है अर्थात अच्छे कर्म हमें स्वर्ग में ले जाते हैं और बुरे कर्म पुनर्जन्म के चक्र में ले जाते हैं।* 

*एक बोर्ड पर सौ वर्ग होते हैं; सीढ़ियां ऊपर ले जाती हैं, सांप नीचे ले आते हैं। यहाँ अंतर यह है कि वर्ग सचित्र हैं। सीढ़ी का शीर्ष एक भगवान, या विभिन्न स्वर्गों ( कैलाश, वैकुंठ, ब्रह्मलोक ) और इसी तरह से एक को दर्शाता है, जबकि नीचे एक अच्छी गुणवत्ता का वर्णन करता है। इसके विपरीत, प्रत्येक साँप का सिर एक नकारात्मक गुण या एक असुर (राक्षस) है। जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ता है, विभिन्न कर्म और संस्कार, अच्छे कर्म और बुरे, आपको बोर्ड में ऊपर और नीचे ले जाते हैं।*
*मूल खेल वर्ग में 12 विश्वास था,* 
*51 विश्वसनीयता थी,* 
*57 उदारता थी,* 
*76 ज्ञान था,* और *78 वैराग्य था।* 
*ये वे चौक थे जहां सीढ़ी मिली थी।* 
*वर्ग 41 अवज्ञा के लिए,* 
*44 अहंकार के लिए,* 
*49 अश्लीलता के लिए,* 
*52 चोरी के लिए,* *58 झूठ बोलने के लिए,* 
*62 नशे के लिए,* *69 कर्ज के लिए,* *84 क्रोध के लिए*, *92 लालच के लिए*, *95 अभिमान के लिए,* *73 हत्या के लिए* और 
*99 वासना के लिए था।* 
*ये वो चौक थे जहां सांप मिला था।* 
*वर्ग 100 निर्वाण या मोक्ष का प्रतिनिधित्व करता है ।*

*यह खेल एक दोहरे उद्देश्य को पूरा करता है: मनोरंजन, साथ ही क्या करें और क्या न करें, दैवीय पुरस्कार और दंड, नैतिक मूल्य और नैतिकता। अंतिम लक्ष्य वैकुंठ या स्वर्ग की ओर जाता है, जिसे विष्णु अपने भक्तों से घिरे हुए, या शिव, पार्वती, गणेश और स्कंद और उनके भक्तों के साथ कैलाश द्वारा दर्शाया गया है। धार्मिक सामाजिक और नैतिक पतन के इस युग में, यह उन बच्चों को मूल्य सिखाने का एक अच्छा तरीका था। यह खेल नैतिक मूल्यों की शिक्षा देता था, एकाग्रता, धैर्य जैसे कौशल और त्वरित सोच विकसित करता था।" क्षेत्रीयता, जाति और धार्मिक विविधताओं के साथ यह बच्चों, वृद्धों महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रिय था और इसके लिए एक अच्छी स्मृति और सतर्कता की आवश्यकता थी, क्योंकि उन्हें प्रतिद्वंद्वी द्वारा जमा किए गए सिक्कों या बीजों की संख्या को गिनना और याद रखना था।* 

*हमारा प्राचीन ज्ञान संस्कृति सभ्यता कितनी श्रेष्ठ थी यह इन छोटी-छोटी बातों से सिद्ध होती है लेकिन दुर्भाग्य देखिए हम हमारे पुराने वैभवशाली गौरवशाली इतिहास को झांकना ही नहीं चाहते उसमें हमारे विश्वगुरु होने के ऐसे कितने ही सबूत आज भी मौजूद हैं । आवश्यकता है केवल उन्हें ढूंढने की और ढूंढ कर समाज के सामने लाने की। और यही एक छोटा सा कार्य करने का प्रयत्न आपके सामने प्रस्तुत है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त।

Friday, June 9, 2023

नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।

बांगरू बाण

श्रीपादावधूत की कलम से 

नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।
आधुनिक युग की किसी भी शिक्षा को जानने का अर्थ उसे समझना नहीं है। जानने और समझने में अंतर है। एक व्यक्ति जिसने आठ बार शोधकार्य कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी वह एक संन्यासी से मिला। अपनी उपलब्धि पर उसे गर्व था इसी कारण वह अपनी आत्मप्रशंसा उस संन्यासी के सामने कर रहा था। उसके गर्व को देखकर संन्यासी ने कहा, 'तुम अपने जीवन में इतने मूर्ख क्यों रहे?' सन्यासी की इस बात से वह व्यक्ति थोड़ा विचलित हुआ और उस व्यक्ति ने कहा, 'आपको गलतफहमी हुई है, मैंने आठ बार पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।' 

'मैंने तुम्हें ठीक समझा है। चिडिय़ों, चांद और तारों का आनंद उठाने के बजाय जीवन के सर्वोत्तम भाग में केवल पढ़ते रहना मूर्खता ही तो है।' व्यक्ति के पास सारी विधाएं हो सकती हैं, पर स्पष्टता न हो और उसे बहुत कुछ मालूम हो, तो क्या लाभ? 

समझ और जानने के बीच स्पष्टता की कमी उलझन को उत्पन्न करती है। व्यक्ति को समझना चाहिए कि व्यक्ति के कई केंद्र होते हैं। बौद्धिक केंद्र, भावनात्मक केंद्र और शरीर का केंद्र। प्रत्येक केंद्र में यांत्रिक और चुंबकीय भाग होता है। यांत्रिक भाग यंत्र की तरह काम करता है। जबकि चुंबकीय भाग अधिक सचेतना के साथ काम करता है। व्यक्ति को स्वयं को परिवर्तित करना होता है। यांत्रिक गतिविधियों को बदलना पड़ता है। पसंद और नापसंद को बदलनी चाहिए। यांत्रिक भावना जैसे ईर्ष्या और घृणा को भी रूपांतरित होना चाहिए। 

चेतना को जाग्रत करो और जीवन को रूपांतरित होते देखो। जड़ वस्तु में भी प्राण होते हैं। प्रेम-भरी चेतना के साथ किसी भी वस्तु के साथ व्यवहार करो। यह रहस्यपूर्ण तरह से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी। इस संदेश को पाकर तुम्हारी सहज बुद्धि और पवित्रता बढ़नी चाहिए। जब तुम स्नान करते हो, तो प्रेम से पानी से बात करो। जब तुम सोते हो तो प्रेम-भरी चेतना के साथ तकिए से बात करो और एक दिव्य संबंध स्थापित हो जाता है। और यह मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है मेरी नानी रात को सोते समय तकिए को बोलकर सोती थी कि सुबह मुझे इतनी बजे उठना है उस जमाने में गांव में हर किसी के घर अलार्म घड़ी नहीं होती थी। और ठीक उसी समय उनकी नींद खुल जाती थी और वह अपने दैनंदिन कार्य कर लेती थी बचपन में मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कुतूहल होता था लेकिन अब जाकर के समझ में आ रहा है कि जिन्हें हम अनपढ़ मूर्ख गंवार कहते हैं वस्तुतः वही जीवन के असली सौंदर्य को आनंद को अनुभूत कर पाते हैं ।

नकारात्मक भावनाएं जीवन को विषमय बना देती हैं। विषैले भोजन की तरह नकारात्मक भावनाओं को मत अपनाओ। अब तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि नकारात्मक भावनाओं के कारण आपके शरीर में विषैले हारमोंस स्त्रावित होते हैं जो आपके शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं वर्तमान समय में डायबिटीज ब्लड प्रेशर इन सब के पीछे सबसे प्रमुख कारण नकारात्मक विचारों से उत्पन्न  वे विषैले हारमोंस ही हैं जो आपको बीमारियों के रूप में आकर पीड़ित करते हैं। आजकल तो एक आम आदमी भी यह कहते हुए सुना जाता है की टेंशन बढ़ने से उसकी शुगर बढ़ गई है अत्यधिक क्रोध से उसका ब्लड प्रेशर बढ़ गया है यह सब इन्हीं हारमोंस की वजह से होता है। नकारात्मक भावों के प्रति सावधान और सचेत रहो। उन्हें आने दो, क्योंकि उनका आना स्वाभाविक है परिस्थितिजन्य है पर उनके साथ जुड़ो या एकरूप मत हो। अपने प्रिय व्यक्ति को आलिंगन करने से हमारे शरीर में ऑक्सीटॉनिन नामक हार्मोन सक्रिय होता है जो हमें पूर्णानंद परिपूर्णता सुरक्षा साहस आदि प्रदान करता है।
इसके साथ एक और कार्टिसोल नामक हार्मोन स्रावित होता है। जो हमें तनाव एंग्जाइटी ट्रेस आदि को नष्ट करता है।
किसी अच्छे स्पर्श से मस्तिष्क का सेरेब्रल ब्रेन सिस्टम (यह वह हिस्सा है जो हमारे अंदर प्यार और विश्वास की अनुभूति करवाता है) सक्रिय होता है।
कनाडा की एक यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार नियमित गले लगने हाथ मिलाने से संबंधों में प्रगाढ़ता आती है। जादू की झप्पी से पूरे दिन आपके अंदर उत्साह का भाव बना रहता है आत्मीय और पारिवारिक संबंधों के लिए रोज जादू की झप्पी अनिवार्य होती है।
द हग थेरेपी पुस्तक की लेखिका प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉक्टर कैथलीन किटिंग ने अपने अनुभव के आधार पर लिखा है कि हग अर्थात आलिंगन गले लगाना दवाइयों के सेवन के मुकाबले में अधिक फायदेमंद साबित होते हैं।
वृद्ध लोगों को प्यार से पकड़ने उन्हें गले लगाने से उनमें जीवन जीने की इच्छा शक्ति बढ़ती है गले लगाने से अकेलापन डर और भूलने की बीमारी अनिद्रा से मुक्ति मिलती है। इसलिए
नई इच्छाशक्ति की रचना करने का चुनाव करो। नकारात्मक भावों से चलित मत हो। वे तुम्हारी शक्ति को नष्ट करते हैं। वे तुम्हें सुलाए रखते हैं। वे हानिकारक और बोझिल हैं। वे तुम्हारे जीवन को जटिल बनाते हैं।

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त