Saturday, July 8, 2023

बांगरू बाण 
श्रीपादावधूत की कलम से 

*शाब्दिक सुबह*
          *अर्थपूर्ण दिवस*

*यूनेस्को के अनुसार भाषा मात्र संपर्क, शिक्षा या विकास का माध्यम न होकर व्यक्ति की विशिष्ट पहचान और उसकी संस्कृति, परंपरा एवं इतिहास का भंडार है। इसके साथ ही सांस्कृतिक मूल्यों की विरासत को संजोने का कार्य भी मातृभाषा ही करती है। मातृभाषा का महत्व धर्म जाति पंथ संप्रदाय आदि से भी अधिक है। जब कहीं कोई भाषा विलुप्त होती है तो उसके साथ एक संस्कृति और परंपरा भी विलुप्त हो जाती है।*

भारत अपनी भाषाई विविधता के कारण अनेक देशों का एक देश प्रतीत होता हैं। लगभग एक सहस्त्र वर्ष की अवधि के बाद पराधीनता के कारण भारत में समय-समय पर विविध भाषाओं का प्रसार होता रहा। 
*वस्तुतः " यदि किसी जाति, धर्म अथवा देश को पराधीन रखना है तो उसके साहित्य को नष्ट कर देना चाहिए, वह स्वयं नष्ट हो जायेगा।"* 

इस बात को ध्यान में रखते हुए *विदेशियों द्वारा हमारी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य पर निरन्तर कुठाराघात होता रहा। साधारण आदमी कभी-कभी आत्म-बल की कमी के कारण, तो कभी उदर पालन की समस्याओं के कारण उनसे टक्कर लेने में असमर्थ रहा और उन्हीं के रंग में उसने अपने को रंग लिया।* 
*भारत की संस्कृति एवं विरासत को अगर किसी भाषा ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है तो वह निश्चित रूप से अंग्रेजी है। फिर भी हर एक भाषा की अपनी एक पहचान अपनी एक विशेषता होती है जिसके शब्दों से विशिष्टता झलकती है तो आज हम इसे अंग्रेजी भाषा के कुछ शब्दों के माध्यम से अंग्रेजी भाषा को जानने का प्रयास करेंगे।*

अंग्रेजी भाषा में प्रेम की अभिव्यक्ति या परस्पर प्रेम अनुभूति के लिए इन तीन शब्दों का प्रयोग किया जाता है .......

1. *Boyfriend*
 2. *Girlfriend*
  3. *Family*

किन्तु एक बात ध्यान देने वाली है कि .....

*Boyfriend* और 
*Girlfriend*   
 इन दो शब्दों के अन्तिम तीन अल्फाबेट है *end*  
इसलिये ये सम्बन्ध एक ना एक दिन ख़त्म हो जाते हैं ।

 परन्तु .....

तीसरा शब्द है :
*FAMILY* = *FAM* + *ILY*      
जिसके पहले तीन अल्फाबेट से बनता है :

*FAM* = *Father* And *Mother*  

और अन्तिम तीन अल्फाबेट से :
*ILY* = *I Love You*

अत: जिस शब्द का आरम्भ पिता एंव माता से और अन्त प्यार के साथ हो, *वह शब्द सही अर्थों में परिवार है !!!* 

*यही परिवार भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा का प्रतीक रहा है अंग्रेजी भाषा में तो केवल शब्दों के माध्यम से इसे समझाने का प्रयास किया है लेकिन भारत ने इसे अपने दैनंदिन व्यवहार में उतारकर जीवन जीने का एक आदर्श दृष्टिकोण समाज में स्थापित किया है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Friday, June 16, 2023

अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई

 *बांगरू बाण*


*संकलित:--* 

श्रीपादावधूत 


*एक संन्यासी  अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा। वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे। संन्यासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछने लगा,*

*"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?"* 

*शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, "क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”*

 *"पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है। जो कहना है वो आप सामान्य आवाज़ में भी तो कह सकते हैं"* 

*संन्यासी ने पुनः प्रश्न किया। कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देन का प्रयास किया पर बाकि लोग संतुष्ट नहीं हुए।*

*अंततः संन्यासी ने समझाया…!!!!*

*“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं! और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा। लेकिन जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है, और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”* 

*इसी को सच्चा प्रेम कहते है जहाँ दिल की बात को दिल समझ लेता है उसे शब्दों की जरुरत नहीं होती।*

*इसीलिए हिंदू समाज में ईश्वर आराधना मौन होकर की जाती है क्योंकि हम उस परमपिता परमेश्वर से असीम प्रेम और श्रद्धा रखते हैं। जिन धर्मावलंबियों का ईश्वर से प्रेम ना होकर किसी पुस्तक या किसी व्यक्ति विशेष की बातों पर ही केवल भरोसा हो उन्हें अपनी बात कहने के लिए लाउडस्पीकर जैसे साधनों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि उनकी और उनके ईश्वर से इतनी दूरी है कि उन्हें चिल्लाकर ही अपनी बात को अभिव्यक्त करना पड़ता है।*


*कबीर ने कहा है*

*"अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई ।* 

*गुंगे केरी सरकरा, खाई और मुसकाई ।। "* 

*कबीर दास जी कहते है कि "प्रेम की कहानी बड़ी अजीब है, इसे कहा नहीं जा सकता जैसे कोई कोई गूंगा आम का मीठा रस खाता है लेकिन उसकी मिठास को कह नहीं पाता  इसी प्रकार  जिसने इस प्रेम रस को पिया है वह सिर्फ मुसकाता है । वह गूंगे जैसा हो जाता है बोलने के लिए कुछ भी नही बचता।*


*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

अमरनाथ की पवित्र गुफा के समान ही आस्ट्रिया में भी गुफा की खोज

भगवान अमरनाथ की पवित्र गुफा के समान ही आस्ट्रिया में भी गुफा की खोज हुई है जिसमें ठीक उसी तरह का बर्फ से बना शिवलिंग मिला है। जैसा कि सैकड़ों सालों से अमरनाथ धाम में बनता आया है। इस तरह की शिवलिंग की शिलाएं सिर्फ यूरोप में पाई गईं। यूरोप मे
ं आस्ट्रिया की ईस्रीसनवेल्ट और स्लोवालिया में डिमेनोवस्का की गुफाएं अमरनाथ की तरह है। ईस्रीसनवेल्ट गुफाएं सबसे बड़ी है और इनकी बर्फ शिलाओं का आकार पवित्र अमरनाथ की तुलना में शिवलिंग से बहुत अधिक मिलता है।
ये आस्ट्रिया में सेल्जबर्ग क्षेत्र में गुफाओं के जाल के रूप में 40 किमी के दायरे में फैला है। 1879 में सेल्जबर्ग के एन्टन पोसेल्ट नामक वैज्ञानिक ने इन गुफाओं में 200 मीटर तक जाकर इनकी औपचारिक खोज अपने नाम दर्ज कराई और इसे माउन्टनोयरिंग मेगजीन में छपवाया, इससे पहले यहां सिर्फ शिकारी जाया करते थे। 1920 से यहां पर्यटकों का आवागमन शुरू हुआ। भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक परीक्षणों से ज्ञात होता है कि ये बर्फ की शिलाएं करीब 1000 साल पुरानी है।

ये बिल्कुल बर्फ के शिवलिंग के समान दिखती है।अमरनाथ के शिवलिंग मंदिर और ईस्रीसनवेल्ट गुफाओं में एक अन्यसमानता यह भी है कि यहां बर्फ का गठन बारहमासी नहीं है। ये दोनों गुफाएं गतिशील और चक्रीय मौसम परिवर्तनों से प्रभावित होती है। इनमें पड़ी दरारें यहां आने वाली हवा को तरल रूप में यहां से वहां प्रवाहित होने देती है। गुफाओं के भीतर का तापमान बाहर के तापमान की तुलना में सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रहता है। सर्दियों में जब गुफाओं में हवा अपेक्षाकृत गर्म होती है तो बाहर के वायुमण्डल की ठंडी हवा आकार गुफाओं की निचली सतह के क्षेत्र को जमाव बिंदु से नीचे ले आती है। गर्मियों में ये बर्फ की शिलाएं गलना शुरू हो जाती है और इनका प्रतिरूप उत्कृष्ठ प्रतिमाओं के रूप देखा जा सकता है ।

बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय।

*बांगरू बाण*

*संकलित:--*
श्रीपादावधूत 

*प्रस्तुत कथानक के बारे में लोगों की भिन्न-भिन्न राय है कि बाज इस प्रकार की कोई प्रक्रिया नहीं अपनाता यह केवल एक मिथक है लेकिन जो भी इस कथानक में वर्णित घटनाक्रम से एक सीख तो मिलती ही है। जीवन को किस प्रकार जीया जाये, बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय। अपने आप को किस प्रकार फिर तैयार किया जाय।*  

*बाज लगभग 70 वर्ष जीता है.... परन्तु अपने जीवन के 40 वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है । उस अवस्था में उसके शरीर के 3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं.....*
*1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं ।*
*2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है, और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है ।*
*3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूर्णरूप से खुल नहीं पाते हैं, उड़ान को सीमित कर देते हैं ।* *इस कारण भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना.. तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं ।*
*उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं....*
*1. देह त्याग दे,*
*2. अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे !!*
*3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।"*
*जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता। लेकिन बाज तीसरा रास्ता चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।*
*वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है .. और तब स्वयं को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है !!"*
*सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं है पक्षीराज के लिये ! और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का । उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है .. पंजों के पुनः उग आने का ।*
*नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है ! और प्रतीक्षा करता है .. पंखों के पुनः उग आने का ।*
*150/160 दिनों की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद... उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी.... इस पुनर्स्थापना के बाद वह लगभग 30 साल और जीता है .... ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ ।*

*ऐसी ही कुछ परिस्थिति हम मनुष्यों के साथ भी आती है जब हम 40/50 की उम्र में पहुँचते है तब इसी प्रकार इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं क्योंकि हम भूतकाल से जकडे हुए रहते है और आने वाली कठिनाईयों से लड़ने के लिए हम तैयार नहीं होते और इन परिस्थितियों से परिवार के नाम पर, समाज के नाम पर समझौता कर लेते है लेकिन हमें अस्तित्व के इस भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी तभी हम उसी ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ जी पायेंगे।* 
*इसके लिए हमें 150 दिन न सही.....पर कम से कम 30/40 दिन ही बिताए जा सकते है स्वयं को पुनर्स्थापित करने में ! इस प्रक्रिया को हम 15/15 या 20/20 दिनों के दो हिस्सों में बाँट कर भी कर सकते है* 
*किसी एकांत जगह में जाकर प्रकृति के सानिध्य में तन मन को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया अपनाए।* *आरएसएस द्वारा संचालित OTC केम्प या वर्ग भी एक अच्छा माध्यम हो सकता है। या योग और विपश्यना की साधना की जा सकती हैं। जो आसान नहीं है लेकिन जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही !! और इसका परिणाम यह होगा कि आप फिर से बाज की तरह उड़ानें भरने को तैयार होंगे.. इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी ।*
*हर दिन कुछ चिंतन किया जाए और आप ही वो व्यक्ति हैं जो स्वयं को दुसरो से बेहतर जानता है ।*
*इसी तरह एक सफल व्यक्ति भी परिवर्तनों से ही आगे बढ़ता है। समाज में कई बार ऐसे परिवर्तनों के कारण उसकी आलोचना होती है, उसे गलत कहा जाता है। लेकिन वो व्यक्ति अपने ध्येय की ओर लक्ष्य की ओर बढ़ जाता है। जिस तरह बाज एकांत में खुद को बदलता है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता की कोई क्या कहेगा। उसी प्रकार हमें भी एकचित्त होकर ईमानदारी से मेहनत करनी चाहिए और नकारात्मक चीजों से सदा दूर रहना चाहिए।*

*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

Wednesday, June 14, 2023

गुंडा शब्द का सही एवं समीचीन अर्थ।*

*बांगरू-बाण*

श्रीपादावधूत की कलम से 

*शाब्दिक सुबह*
     *अर्थपूर्ण दिवस*

      🌹 *गुंडा* 🌹

*यह शब्द सुनते ही हमारे मन-मस्तिष्क में एक बहुत ही दुर्दांत अपराधी समाजकंटक ऐसी तस्वीर उभरती है लेकिन क्या वास्तव में गुंडा शब्द इन लोगों के लिए जो प्रयुक्त होता है वह सही एवं सटीक है क्या..??* 

*जी नहीं गुंडा शब्द का अर्थ होता है गुणों से युक्त*

 *फिर प्रश्न उत्पन्न होता है कि गुंडा यह शब्द अपराधी बदमाश के अर्थ में कब क्यों और कैसे प्रचलित हो गया तो आइए आज जानते हैं गुंडा शब्द का सही एवं समीचीन अर्थ।*

*कबीर ने "गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?*

*नहीं।* 

*सूरदास ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं।* 

*तुलसी ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

 *नहीं ।*

*जायसी , बिहारी , मतिराम , चिंतामणि आदि प्राचीन कवियों में से किसी ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं ।*

*प्राचीन काल के कवियों को छोड़िए , आधुनिक काल में हिंदी साहित्य के पुरोधा माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं ।*

*20 वीं शताब्दी से पहले दुनिया में किसी ने भी बदमाश के अर्थ में " गुंडा " शब्द का प्रयोग नहीं किया है ।* 

*तो आइए जानते हैं गुंडा शब्द का असली अर्थ क्या है और यह कैसे प्रचलन में आया।*

*आज "गुंडा"  एक गाली है।* इसे आजकल किसी के ऊपर भी बड़ी सहजता से चस्पां कर दिया जाता है। और तो और *हमारे आर्मी चीफ, जनरल रावत, तक को “सड़क का गुंडा” बता दिया* गया। *बेनी प्रसाद वर्मा ने मोदी जी के प्रधान-मंत्री बनने से पहले आर एस एस के “सबसे बड़े गुंडे”* कहकर सम्मानित (?) किया था।

*अजब नहीं तुक्का, जो तीर हो जाए।*
*दूध फट जाए कभी तो, पनीर हो जाए।*
*मवालियों को न देखा करो, हिकारत से* 
*न जाने कौन सा गुंडा, वजीर हो जाए।*

*पुलिस को तो“वर्दी वाला गुंडा”* कहना आम बात है। *छोटे-मोटे अपराधी "गली-छाप गुंडे"* कहलाते हैं। कुछ टेक्स सरकार लगाती है, *कुछ गुंडे वसूल करते हैं। इसे "गुंडा-टेक्स"  कहा जाता है।* *गुंडों से बचने के लिए हमारे यहाँ बाकायदा "गुंडा-एक्ट" हैं, एंटी-रोमियो "गुंडा एक्ट" भी है। "गुंडा-स्क्वाड" है। आम जनता जो "गुंडों" और "गुंडा-एक्ट", दोनों से ही त्रस्त है,* अक्सर सवाल करती है, क्या गुंडा स्क्वैड वास्तव में गुंडों को बचाने के लिए गुंडों का ही स्क्वाड तो नहीं है ? और उसे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाता। सभी को विदित है कि *बहुत से सफ़ेद-पोश, नेता लोग अपने स्वार्थ साधने के लिए "किराए के गुंडे" भी पाल लेते हैं।*

 *उत्तर भारत में जो हिन्दुस्तानी ज़बान बोली जाती है, उसमें गुंडा शब्द का अर्थ बदमाश, दुर्वृत्त, खोंटे चाल-चलन वाला, उदंड और झगड़ालु व्यक्ति से लगाया जाता है।* 

*गुंडाशाही, गुंडागर्दी, गुंडई और गुंडाराज जैसे पद भी "गुंडा" शब्द से ही बने हैं। किन्तु दक्षिण भारत की भाषाओं में प्राय: "गुंड" और "गुंडा" शब्दों में कोई अनैतिक और नकारात्मक भाव नहीं है।* 

*मराठी में "गाँव-गुंड" ग्राम नायक या ग्राम-योद्धा है। वहां गुंडा के मूल में प्रधान या नेता का भाव है।* 
*इसी प्रकार मराठी के संत कवि जगद्गुरु तुकाराम महाराज ने भी अपने अभंग में  गुंडा शब्द का प्रयोग किया है वह अभंग इस प्रकार है।* 

*"पुत्र व्हावा ऐसा गुंडा। त्याचा तिही लोकी झेंडा। कन्या ऐसी देई। जैसी मिरा मुक्ताबाई ।।"*

*अर्थात पुत्र ऐसा होना चाहिए जिसका यश तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना चाहिए। यहां गुंडा शब्द का अर्थ उसका यश उसके प्रसिद्धि के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।*

*तमिल में भी गुंडा शब्द एक शक्तिशाली और ताकतवर नायक की अर्थवत्ता प्रदान करता है। "गुंडराव" "गुंडराज" जैसे पद इसके उदाहरण हैं। दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक के एक बड़े कांग्रेसी नेता का नाम आप सबको याद होगा आर. गुंडू राव। जो कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे। वर्तमान में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी है और इस सरकार में एक मंत्री इन्हीं आर. गुंडूराव के पुत्र हैं जिनका नाम है दिनेश गुंडू राव।*

*वस्तुत: "गुंड" का अर्थ किसी उभार या गाँठ से है। किसी समतल जगह पर कोई भी उभार अपनी एक विशिष्ठता की छाप छोड़ता है। इसी तरह समाज में किसी व्यक्ति का उभार उसे ख़ास बना देता है। वह समाज का नायक हो जाता है। गुंड का अर्थ इस प्रकार नायक, योद्धा या शूरवीर से लगाया जाता है।*

*हिन्दी के अधिकतर कोशों में "गुंड" और "गुंडा" शब्दों की व्युत्पत्ति संस्कृत के “गुन्डक:” पद से बताई गई है। संस्कृत में "गुन्डक:" का अर्थ "धूलि या धूलमिला आटा" है। तैलपात्र तथा मंद स्वर" को भी गुन्डक कहा जाता है। संस्कृत के गुन्डक में इस प्रकार न तो नायकत्व की भावना है और न ही कोई दुर्वृत्ति है।*

*हिंदी में " गुंडा " शब्द अंग्रेजों की फाइल से आया है , तब जब 20 वीं शताब्दी के पहले दशक में बस्तर के आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी "वीर गुंडा" को अंग्रेजों ने गुंडा ( बदमाश ) मान लिया ।* 

*भारतीयों की नजर में वीर गुंडा स्वतंत्रता सेनानी थे, मगर अंग्रेजों की नजर में बिगड़ैल, बदमाश अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने वाले।* 

*इसलिए अंग्रेजों ने एक कानून बनाया और उसे नाम दिया "गुंडा-एक्ट" । और जो भी भारतीय अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ खड़ा होता या विरोध करता उसे वे "गुंडा-एक्ट" के तहत जेल में बंद कर देते थे।*  

*वस्तुत:  "गुंडा" एक जनजाति के नायक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम है, जिसने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।* 
*इसीलिए "गुंडा" शब्द का प्रयोग पहली बार अंग्रेजों ने बदमाश" के अर्थ में किया।*

*इस योद्धा का पूरा नाम "गुंडा धुर" था। 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ छत्तीसगढ़ के बस्तर में  "भूमकाल-विद्रोह" में इस "गुंडा धुर" वीर ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। अंग्रेजी शासन के दस्तावेजों में "गुंडा धुर" को विद्रोही और "गुंडा"  (बदमाश, उद्दंडतापूर्वक आचरण करनेवाला) बतलाया गया है।* 

*अंग्रेजों की नजर में "गुंडा धुर" की छवि उद्दंड और बदमाश की थी पर अपने देशवासियों की नजर में वे स्वतंत्रता सेनानी और वीर थे। कालेन्द्र सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की सुनियोजित रूपरेखा तैयार की गई थी। रानी सुबरन कुँवर ने क्रांतिकारियों की सभा में "मुरिया राज" की स्थापना की घोषणा की। रानी के सुझाव पर "वीर गुंडा धुर" को "भूमकाल-विद्रोह" का नेता निर्वाचित किया गया।*
 *1 फरवरी, 1910 को संपूर्ण बस्तर में अंग्रेजी दासता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बज उठा।*

*विडंबना देखिए गुलामी की मानसिकता से ग्रस्त भारत के कोशकारों ने अंग्रेजों का अनुगमन करके "गुंडा" का अर्थ "बदमाश" कर दिया है।* 

*अब जब स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने को है और एक नया इतिहास लिखा जाना है भारतीय कोशकारों की जिम्मेदारी है कि अंग्रेजों द्वारा प्रयुक्त "बदमाश" के अर्थ में "गुंडा" शब्द को डिक्शनरी से बाहर करके, "वीर स्वतंत्रता सेनानी" के अर्थ में उसे प्रचलित किया जाना चाहिए। "बदमाश" के अर्थ में "गुंडा" शब्द एक जनजाति समाज के स्वतंत्रता सेनानी का अपमान है।*

 
*यह कहानी है गुंडा शब्द के कानून बनने और उसके बदमाश के अर्थ में प्रचलित होने की लेकिन दुर्भाग्य देखिए इस देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो गए हैं और आज भी आजाद भारत में "गुंडा-एक्ट" अस्तित्व में है।* 

*क्यों ?* 

*जिसने देश को आजाद कराया, वहीं गुंडा धुर* 
*गुंडा है बदमाश है*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त।

मोक्षपट, मोक्षपात, मोक्ष पटामू, परम पदम अर्थात आज का "सांप-सीढीं" का खेल।*

*बांगरू बाण*

श्रीपादावधूत की कलम से

*मोक्षपट, मोक्षपात, मोक्ष पटामू, परम पदम अर्थात आज का सांप सीढ़ी का खेल।*

*किसी भी देश की संस्कृति सभ्यता धरोहर को नष्ट करना हो तो सबसे पहले उस देश के निवासियों को उनकी भाषा और उनके इतिहास से अलग किया जाता है। क्योंकि भाषा और इतिहास उस देश के निवासियों में आत्म गौरव का स्वाभिमान का भाव जागृत करते हैं। यही कार्य इस देश में पहले मुसलमानों ने और बाद में अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने तो सुनियोजित षड्यंत्रपूर्वक इस देश के समस्त बौद्धिक संपदा को लूट कर उसका अनुवाद अंग्रेजी में कर संपूर्ण दुनिया में प्रसारित किया। पूरे विश्व में जितनी भी खोजें हुई है वह सारी खोजें 17 वी शताब्दी के बाद ही अस्तित्व में क्यों आती हैं? कारण स्पष्ट है अगर आप समझना चाहे तो। यह वही काल है जब इस देश पर अंग्रेजों का आक्रमण होता है । संपूर्ण देश पर धीरे-धीरे एकछत्र राज्य स्थापित हो जाता हैं और यहां की धन संपत्ति खनिज व बौद्धिक संपदा को लूटकर  इंग्लैंड भेजा जाता है और वही से वह सारी खोज व सारे आविष्कार वह सारी बातें अंग्रेजों के नाम से संपूर्ण विश्व में प्रचारित की जाती है। इसी का एक उदाहरण है यह सांप सीढ़ी का खेल।* 
*कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात होगी कि मोक्षपट या मोक्ष पटामू के रूप में जाना जाने वाला खेल मूल सांप और सीढ़ी था।* *"भारत महान आविष्कारों और नवाचारों की भूमि रहा है, हालांकि अधिकांश भारतीय शायद ही उनके बारे में जानते हैं। क्योंकि हमें यह सब ना तो बताया गया है ना पढ़ाया गया है जो पढ़ाया है वह गुलामी का इतिहास है और इस इतिहास में हम कितने जाहिल थे गंवार थे। यही सारी गलत बातें हमें इतिहास में पढ़ाई जाती हैं और यहां का व्यक्ति उस इतिहास को पढ़कर यह मान्य भी कर लेता है।* 

*तो आइए जानते हैं कि मोक्षपट क्या है?*
*हालाँकि इस खेल की उत्पत्ति का श्रेय संत ज्ञानेश्वर जी को दिया जाता है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से खेला जाता रहा है। इस खेल का उद्देश्य बच्चों में नैतिक शिक्षा देना था ।जिन चौकों पर सीढ़ी शुरू होती है वे पुण्य के लिए खड़े होते हैं जबकि सांप के सिर वाले वर्ग पाप या बुराई की विशेषता का प्रतीक होते हैं।*

 *1892 में औपनिवेशिक शासकों द्वारा इसे ब्रिटेन में संशोधनों के साथ पेश किया गया था। जब खेल को इंग्लैंड ले जाया गया तो इसमें नैतिक पाठ और धार्मिक पहलुओं हटा दिया गया पाश्चात्य सभ्यता से परिपूर्ण मूल्यों में इसे बदल कर स्नेक एंड लैडर  के रूप में प्रचारित किया। पुराने भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत इस खेल में सांपों की संख्या अधिक थी एवं सीढ़ियां कम थी लेकिन अंग्रेजों ने सांप-सीढ़ी की संख्या भी बराबर कर दी गई। खेल को अमेरिका में च्यूट्स एंड लैडर्स के रूप में पेश किया गया था।"*

*प्राचीन भारतीयों की अन्य खोजें सिर्फ सांप-सीढ़ी ही नहीं बल्कि भारत कई प्राचीन खेलों का जन्मस्थान है। शतरंज की उत्पत्ति भारत में सिंधु सरस्वती सभ्यता के पुरातात्विक स्थलों में *"शतरंज"* *के समान एक खेल के प्रमाण के साथ हुई थी। इसे मूल रूप से "अष्टपद" कहा जाता था और *गुप्त काल" के दौरान "चतुरंग" के रूप में जाना जाने लगा। "लूडो" पहली बार छठी शताब्दी में खेला गया था, इसकी उत्पत्ति "पांडवों और कौरवों" द्वारा खेले जाने वाले "चौसर" नामक प्राचीन खेल से हुई है। इतिहासकार इस बात को प्रमाणित करते हैं कि एलोरा की गुफाओं में इस खेल का चित्रण है। मार्शल आर्ट जो बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया में फैला, भारत में उत्पन्न हुआ। दिलचस्प बात यह है कि बैडमिंटन का आधुनिक रूप भी भारत में पैदा हुआ था और बाद में औपनिवेशिक शासकों द्वारा इसे ब्रिटेन ले जाया गया।*

*भारत को अध्यात्म की भूमि के रूप में जाना जाता है, हमारे पूर्वज कई क्षेत्रों में बहुत उन्नत थे। हमारे ऋषि कई अन्य क्षेत्रों के अलावा गणित और खगोल विज्ञान से लेकर चिकित्सा जैसे विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ थे। उन्होंने इन शक्तियों का उपयोग किया और कई वैज्ञानिक खोजें कीं। इनका उपयोग आम नागरिकों के जीवन को आसान बनाने के लिए किया गया था। इन प्रतिभाशाली ऋषि-मुनियों दिमागों की एक झलक है, जिन्होंने भारत को ज्ञान की भूमि बनाया और यहां तक कि खेलों के माध्यम से मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा के दोहरे उद्देश्य को भी बहुत आसान ढंग से समाज में स्थापित किया।*

*"तो चलिए आज चर्चा सांप सीढ़ी के खेल पर करते हैं।*
*इस खेल के बारे में सबसे पहला उल्लेख 13वीं शताब्दी के महाराष्ट्र के संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज से मिलता है।* 
*डेनमार्क के इतिहासकार मिस्टर जेकॉब और पुणे के  इतिहास संशोधक वा. ल. मंजुळ इन्होंने सबसे पहले ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि इस खेल को संत ज्ञानेश्वर महाराज ने अपने दो छोटे भाई बहनों सोपान और मुक्ताबाई को खेलने हेतु यह खेल उनके निवास स्थान के बाहर एक चट्टान पर  बना करके दिया था। आपको विदित ही होगा कि संत ज्ञानेश्वरजी, निवृत्ति नाथ, सोपानदेव और मुक्ताबाई यह चार भाई बहन थे। इनमें दो बड़े भाई ज्ञानेश्वर और निवृत्तिनाथ जब भिक्षा लेने ने के लिए जाते थे तब अपने दो छोटे भाई बहनों को यह खेल खेलने के लिए देते थे। यह खेल खिलाने के पीछे उनका उद्देश्य सिर्फ इतना ही था कि 2 बड़े भाइयों की अनुपस्थिति में दो छोटे भाई बहन इस खेल को खेल कर अपना समय व्यतीत करें, साथ ही छोटे बच्चों को इस खेल के माध्यम से अच्छे संस्कार भारतीय संस्कृति के उद्देश्य उनकी शिक्षा यह सब मिलती रहे। इतनी उदात्तता को लेकर तैयार किया गया था यह "सांप-सीढ़ी" का खेल। लेकिन दुर्भाग्य देखिए अंग्रेजों ने इसे अपने नाम से चिपका कर हमारे सामने रखा और हमने आंख मूंदकर विदेशी है; आयातित हैं; तो अच्छा ही होगा इसके आधार पर स्वीकार कर लिया।* 
*डेनमार्क के इतिहासकार मिस्टर जेकॉब ने "मध्ययुगीन भारत में खेले जाने वाले खेल" यह विषय लेकर अपनी पीएचडी की उपाधि प्राप्त की तब उन्हें "इंडियन कल्चर ट्रेडीशन के संदर्भ में डेक्कन महाविद्यालय पुणे" के "प्रोफेसर रा. चि. ढेरे" के हस्तलिखित संग्रह से दो मोक्षपट प्राप्त हुए अर्थात "सांप सीढ़ी" के खेल प्राप्त हुए।* 
*इसी प्रकार विजुअल फैक्टफाइंडर हिस्ट्री टाइमलाइन इस पुस्तक में वर्ष 1199 से 1209 इस कालखंड में पूरे दुनिया में जो भी कोई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी या अविष्कार हुए उसमें संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा कौड़ी और पांसो के माध्यम से एक खेल खेला गया इस प्रकार का उल्लेख प्राप्त हुआ।* 

*13 वीं शताब्दी के कवि संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा रचित इस खेल में सीढ़ियां सद्गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं और सांप अवगुणों का। खेल कौड़ियों और पासों से खेला जाता था। बाद में समय के साथ, खेल में कई संशोधन हुए लेकिन अर्थ वही है अर्थात अच्छे कर्म हमें स्वर्ग में ले जाते हैं और बुरे कर्म पुनर्जन्म के चक्र में ले जाते हैं।* 

*एक बोर्ड पर सौ वर्ग होते हैं; सीढ़ियां ऊपर ले जाती हैं, सांप नीचे ले आते हैं। यहाँ अंतर यह है कि वर्ग सचित्र हैं। सीढ़ी का शीर्ष एक भगवान, या विभिन्न स्वर्गों ( कैलाश, वैकुंठ, ब्रह्मलोक ) और इसी तरह से एक को दर्शाता है, जबकि नीचे एक अच्छी गुणवत्ता का वर्णन करता है। इसके विपरीत, प्रत्येक साँप का सिर एक नकारात्मक गुण या एक असुर (राक्षस) है। जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ता है, विभिन्न कर्म और संस्कार, अच्छे कर्म और बुरे, आपको बोर्ड में ऊपर और नीचे ले जाते हैं।*
*मूल खेल वर्ग में 12 विश्वास था,* 
*51 विश्वसनीयता थी,* 
*57 उदारता थी,* 
*76 ज्ञान था,* और *78 वैराग्य था।* 
*ये वे चौक थे जहां सीढ़ी मिली थी।* 
*वर्ग 41 अवज्ञा के लिए,* 
*44 अहंकार के लिए,* 
*49 अश्लीलता के लिए,* 
*52 चोरी के लिए,* *58 झूठ बोलने के लिए,* 
*62 नशे के लिए,* *69 कर्ज के लिए,* *84 क्रोध के लिए*, *92 लालच के लिए*, *95 अभिमान के लिए,* *73 हत्या के लिए* और 
*99 वासना के लिए था।* 
*ये वो चौक थे जहां सांप मिला था।* 
*वर्ग 100 निर्वाण या मोक्ष का प्रतिनिधित्व करता है ।*

*यह खेल एक दोहरे उद्देश्य को पूरा करता है: मनोरंजन, साथ ही क्या करें और क्या न करें, दैवीय पुरस्कार और दंड, नैतिक मूल्य और नैतिकता। अंतिम लक्ष्य वैकुंठ या स्वर्ग की ओर जाता है, जिसे विष्णु अपने भक्तों से घिरे हुए, या शिव, पार्वती, गणेश और स्कंद और उनके भक्तों के साथ कैलाश द्वारा दर्शाया गया है। धार्मिक सामाजिक और नैतिक पतन के इस युग में, यह उन बच्चों को मूल्य सिखाने का एक अच्छा तरीका था। यह खेल नैतिक मूल्यों की शिक्षा देता था, एकाग्रता, धैर्य जैसे कौशल और त्वरित सोच विकसित करता था।" क्षेत्रीयता, जाति और धार्मिक विविधताओं के साथ यह बच्चों, वृद्धों महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रिय था और इसके लिए एक अच्छी स्मृति और सतर्कता की आवश्यकता थी, क्योंकि उन्हें प्रतिद्वंद्वी द्वारा जमा किए गए सिक्कों या बीजों की संख्या को गिनना और याद रखना था।* 

*हमारा प्राचीन ज्ञान संस्कृति सभ्यता कितनी श्रेष्ठ थी यह इन छोटी-छोटी बातों से सिद्ध होती है लेकिन दुर्भाग्य देखिए हम हमारे पुराने वैभवशाली गौरवशाली इतिहास को झांकना ही नहीं चाहते उसमें हमारे विश्वगुरु होने के ऐसे कितने ही सबूत आज भी मौजूद हैं । आवश्यकता है केवल उन्हें ढूंढने की और ढूंढ कर समाज के सामने लाने की। और यही एक छोटा सा कार्य करने का प्रयत्न आपके सामने प्रस्तुत है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त।

Friday, June 9, 2023

नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।

बांगरू बाण

श्रीपादावधूत की कलम से 

नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।
आधुनिक युग की किसी भी शिक्षा को जानने का अर्थ उसे समझना नहीं है। जानने और समझने में अंतर है। एक व्यक्ति जिसने आठ बार शोधकार्य कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी वह एक संन्यासी से मिला। अपनी उपलब्धि पर उसे गर्व था इसी कारण वह अपनी आत्मप्रशंसा उस संन्यासी के सामने कर रहा था। उसके गर्व को देखकर संन्यासी ने कहा, 'तुम अपने जीवन में इतने मूर्ख क्यों रहे?' सन्यासी की इस बात से वह व्यक्ति थोड़ा विचलित हुआ और उस व्यक्ति ने कहा, 'आपको गलतफहमी हुई है, मैंने आठ बार पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।' 

'मैंने तुम्हें ठीक समझा है। चिडिय़ों, चांद और तारों का आनंद उठाने के बजाय जीवन के सर्वोत्तम भाग में केवल पढ़ते रहना मूर्खता ही तो है।' व्यक्ति के पास सारी विधाएं हो सकती हैं, पर स्पष्टता न हो और उसे बहुत कुछ मालूम हो, तो क्या लाभ? 

समझ और जानने के बीच स्पष्टता की कमी उलझन को उत्पन्न करती है। व्यक्ति को समझना चाहिए कि व्यक्ति के कई केंद्र होते हैं। बौद्धिक केंद्र, भावनात्मक केंद्र और शरीर का केंद्र। प्रत्येक केंद्र में यांत्रिक और चुंबकीय भाग होता है। यांत्रिक भाग यंत्र की तरह काम करता है। जबकि चुंबकीय भाग अधिक सचेतना के साथ काम करता है। व्यक्ति को स्वयं को परिवर्तित करना होता है। यांत्रिक गतिविधियों को बदलना पड़ता है। पसंद और नापसंद को बदलनी चाहिए। यांत्रिक भावना जैसे ईर्ष्या और घृणा को भी रूपांतरित होना चाहिए। 

चेतना को जाग्रत करो और जीवन को रूपांतरित होते देखो। जड़ वस्तु में भी प्राण होते हैं। प्रेम-भरी चेतना के साथ किसी भी वस्तु के साथ व्यवहार करो। यह रहस्यपूर्ण तरह से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी। इस संदेश को पाकर तुम्हारी सहज बुद्धि और पवित्रता बढ़नी चाहिए। जब तुम स्नान करते हो, तो प्रेम से पानी से बात करो। जब तुम सोते हो तो प्रेम-भरी चेतना के साथ तकिए से बात करो और एक दिव्य संबंध स्थापित हो जाता है। और यह मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है मेरी नानी रात को सोते समय तकिए को बोलकर सोती थी कि सुबह मुझे इतनी बजे उठना है उस जमाने में गांव में हर किसी के घर अलार्म घड़ी नहीं होती थी। और ठीक उसी समय उनकी नींद खुल जाती थी और वह अपने दैनंदिन कार्य कर लेती थी बचपन में मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कुतूहल होता था लेकिन अब जाकर के समझ में आ रहा है कि जिन्हें हम अनपढ़ मूर्ख गंवार कहते हैं वस्तुतः वही जीवन के असली सौंदर्य को आनंद को अनुभूत कर पाते हैं ।

नकारात्मक भावनाएं जीवन को विषमय बना देती हैं। विषैले भोजन की तरह नकारात्मक भावनाओं को मत अपनाओ। अब तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि नकारात्मक भावनाओं के कारण आपके शरीर में विषैले हारमोंस स्त्रावित होते हैं जो आपके शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं वर्तमान समय में डायबिटीज ब्लड प्रेशर इन सब के पीछे सबसे प्रमुख कारण नकारात्मक विचारों से उत्पन्न  वे विषैले हारमोंस ही हैं जो आपको बीमारियों के रूप में आकर पीड़ित करते हैं। आजकल तो एक आम आदमी भी यह कहते हुए सुना जाता है की टेंशन बढ़ने से उसकी शुगर बढ़ गई है अत्यधिक क्रोध से उसका ब्लड प्रेशर बढ़ गया है यह सब इन्हीं हारमोंस की वजह से होता है। नकारात्मक भावों के प्रति सावधान और सचेत रहो। उन्हें आने दो, क्योंकि उनका आना स्वाभाविक है परिस्थितिजन्य है पर उनके साथ जुड़ो या एकरूप मत हो। अपने प्रिय व्यक्ति को आलिंगन करने से हमारे शरीर में ऑक्सीटॉनिन नामक हार्मोन सक्रिय होता है जो हमें पूर्णानंद परिपूर्णता सुरक्षा साहस आदि प्रदान करता है।
इसके साथ एक और कार्टिसोल नामक हार्मोन स्रावित होता है। जो हमें तनाव एंग्जाइटी ट्रेस आदि को नष्ट करता है।
किसी अच्छे स्पर्श से मस्तिष्क का सेरेब्रल ब्रेन सिस्टम (यह वह हिस्सा है जो हमारे अंदर प्यार और विश्वास की अनुभूति करवाता है) सक्रिय होता है।
कनाडा की एक यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार नियमित गले लगने हाथ मिलाने से संबंधों में प्रगाढ़ता आती है। जादू की झप्पी से पूरे दिन आपके अंदर उत्साह का भाव बना रहता है आत्मीय और पारिवारिक संबंधों के लिए रोज जादू की झप्पी अनिवार्य होती है।
द हग थेरेपी पुस्तक की लेखिका प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉक्टर कैथलीन किटिंग ने अपने अनुभव के आधार पर लिखा है कि हग अर्थात आलिंगन गले लगाना दवाइयों के सेवन के मुकाबले में अधिक फायदेमंद साबित होते हैं।
वृद्ध लोगों को प्यार से पकड़ने उन्हें गले लगाने से उनमें जीवन जीने की इच्छा शक्ति बढ़ती है गले लगाने से अकेलापन डर और भूलने की बीमारी अनिद्रा से मुक्ति मिलती है। इसलिए
नई इच्छाशक्ति की रचना करने का चुनाव करो। नकारात्मक भावों से चलित मत हो। वे तुम्हारी शक्ति को नष्ट करते हैं। वे तुम्हें सुलाए रखते हैं। वे हानिकारक और बोझिल हैं। वे तुम्हारे जीवन को जटिल बनाते हैं।

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

*बदन दर्द, कमर दर्द, सर्वाइकल और चारपाई/खाट/खटिया*

*बांगरू-बाण*

 श्रीपादावधूत की कलम से 


*बदन दर्द, कमर दर्द, सर्वाइकल और चारपाई/खाट/खटिया* 

*बदन दर्द, कमर दर्द और सर्वाइकल का चारपाई या खाट से क्या संबंध है यह प्रश्न आपके मन में उत्पन्न हुआ होगा?* 
*प्रथम दृष्टया तो इनका खटिया से कोई संबंध है यह हमारी जानकारी में ही नहीं होगा। लेकिन सच यही है। वर्तमान समय में अधिकांश लोगों को कमर दर्द सर्वाइकल का प्रॉब्लम केवल और केवल गैर पारंपरिक इंग्लिश बेड जिसे सामान्य भाषा में हम पलंग कहते हैं और जिस पर फोम के गद्दे बिछाए जाते हैं के कारण ही उत्पन्न होता है।*

*हमारे पूर्वज बहुत ही जानकार थे वह विज्ञान को अच्छी तरह से जानते थे शरीर विज्ञान आरोग्य शास्त्र का उन्हें पूरा पूरा ज्ञान था और इसीलिए उनके प्रत्येक आचार, विचार, व्यवहार में विज्ञान व आयुर्वेद का मिलाजुला स्वरूप प्रयुक्त होता था जो उन्हें स्वस्थ रखने में सहायक होता था । सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वज क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई साइंस नहीं है, लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके। चारपाई बनाना एक कला है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है।*
*जब हम सोते हैं, तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की आवश्यकता होती है ; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की आवश्यकता होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की झोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है।*
*दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें, सभी में चारपाई की तरह झोली बनी होती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की झोली का था, लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है।* *चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द  कभी नही होता है। आजकल डॉक्टरों के द्वारा दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है। आज भी गांव में जच्चा और बच्चा को खटिया पर ही सुलाया जाता है। अधिकांश गांव में इस तरह की खटिया या चारपाई केवल और केवल उन महिलाओं के लिए ही बनी होती है जिन्होंने अभी अभी बच्चा पैदा किया है और वह इस खटिया पर लगभग सवा महीने तक सोती है।* 
*डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है, उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं, वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती। चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है।* *खटिया को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं। अगर किसी मरीज को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed -Soar शुरू हो जाता है । भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है। गर्मियों में इंग्लिश Bed जो कि फोम का या फाइबर का बना होता है गर्म हो जाता है इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है जबकि सनातन चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है ।*
*सूत की रस्सियों से बुनी चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शरीर का Acupressure होता रहता है ।*
*गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनंद ही कुछ और है। ताज़ी हवा, बदलता मौसम, तारों की छांव ,चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती है । हर घर में एक स्वदेशी बाण(सूत की रस्सी) की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी चाहिए ।50 वर्ष की आयु के बाद तो सोने के लिए चारपाई से अच्छा कोई साधन ही नहीं है। दिन में सोने के लिए या बैठने के लिए केवल चारपाई का प्रयोग करना चाहिए उस पर कुछ भी नहीं डालना चाहिए। उस पर बैठने या सोने से आपके शरीर के अधिकांश अंग सूत की रस्सी के संपर्क में आने से एक तरह से एक्यूप्रेशर का काम करते हैं। रात्रि में आवश्यक हो तो आप गादी या गद्दा बिछा लें लेकिन अगर केवल मोटी दरी डालकर सोएंगे तो ज्यादा लाभदायक रहेगा। अंग्रेजी में जिसे आप रिलैक्स कहते हैं वह रिलैक्सेशन की प्रक्रिया केवल और केवल चारपाई या खाट पर सोने से ही प्राप्त होती है।* 
*इसलिए प्राचीन सनातन भारतीय संस्कृति के आचार, विचार, व्यवहार और संस्कारों को अपनाते चलें जो आपके हित में है।* 

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त..!!!

Monday, May 29, 2023

संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*

*बांगरू बांण* 
श्रीपादावधूत की कलम से 

*संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*

*भारतीय पारिवारिक #सेंगोल जो प्रत्येक परिवार में हर बुजुर्ग के हाथ में सदैव रहता था।जिससे वे पूरे परिवार को नियंत्रित करते थे। वे ग़लती करने पर इसी #सेंगोल राजदंड से दंड भी देते थे। जो बहुत पीड़ादायक होता था और गलती करने वाला कभी भी उस गलती को दोहराने की हिम्मत नहीं करता था। लेकिन आजकल हमारे #बुजुर्गों का ये सेंगोल भी कहीं #विलुप्त हो गया है और इसी के परिणामस्वरूप सब परिवार #बिखराव की ओर बढ़ रहे हैं।* 
*मास्टरजी के पास भी यह कुटाई वाला #सेंगोल होता था। जो पढ़ाई-लिखाई में सहायक होता था। जो बच्चे अनुशासनहीनता करते थे। उनकी अच्छी तरह से खबर लेता था।*
*छड़ी बाजे छम छम* 
*विद्या आये घम घम* 
*यह शिक्षण का मूलमंत्र था। इसी कारण छात्रों को शिक्षित करने का यह रामबाण उपाय था। लेकिन मैकाल की शिक्षण पद्धति से इसे विस्मृत कर दिया गया। इसका ही यह परिणाम है कि वर्तमान में हमारे अपने बच्चे भी कई बार #विपक्षियों वाला बर्ताव करने लगते हैं।* 
*धर्मगुरुओं के पास भी धर्मदंड होता था जो राजदंड के गलत निर्णयों पर समाज की कुरीतियों पर सदैव चलता था।* 
*गांव के पंच परमेश्वरों के पास भी यह न्यायदंड होता था। जिससे वे पंचायत में न्याय करते थे।*

*जिस जिस घर/मंदिर/पंचायत में ये सब होता है उस घर/मंदिर/पंचायत के बड़े बुजुर्ग से #विनंती है के वो भी अपने सेंगोल को तलाश करें उसका #उपयोग करें।*
*फिर देखिए कैसे #बिखरे हुए और #अनियंत्रित लोग #एकजुट होते हैं फिर वो चाहे आपका परिवार हो या आपका देश।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Tuesday, May 23, 2023

आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये

 *बांगरू बाण*


*संकलित:-* श्रीपादावधूत 


*जापान में हमेशा से ही मछलियाँ खाने का एक ज़रुरी हिस्सा रही हैं और ये जितनी ताज़ी होतीं हैं लोग उसे उतना ही पसंद करते हैं । लेकिन जापान के तटों के आस-पास इतनी मछलियाँ नहीं होतीं की उनसे लोगों की डिमांड पूरी की जा सके ।नतीजतन मछुआरों को दूर समुद्र में जाकर मछलियाँ पकड़नी पड़ती हैं। जब इस तरह से मछलियाँ पकड़ने की शुरुआत हुई तो मछुआरों के सामने एक गंभीर समस्या सामने आई । वे जितनी दूर मछली पकडने जाते उन्हें लौटने में उतना ही अधिक समय लगता और मछलियाँ बाजार तक पहुँचते-पहुँचते बासी हो जातीं, और फिर कोई उन्हें खरीदना नहीं चाहता । इस समस्या से निपटने के लिए मछुआरों ने अपनी बोट्स पर फ्रीज़र लगवा लिये । वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें फ्रीजर में डाल देते । इस तरह से वे और भी देर तक मछलियाँ पकड़ सकते थे और उसे बाजार तक पहुंचा सकते थे । पर इसमें भी एक समस्या आ गयी । जापानी फ्रोजेन फ़िश ओर फ्रेश फिश में आसनी से अंतर कर लेते और फ्रोजेन मछलियों को खरीदने से कतराते। उन्हें तो किसी भी कीमत पर ताज़ी मछलियाँ ही चाहिए होतीं है। एक बार फिर मछुआरों ने इस समस्या से निपटने की सोची और इस बार एक शानदार तरीका निकाला, उन्होंने अपनी बड़े-बड़े जहाजों पर फ़िश टैंक्स बनवा लिए और अब वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें पानी से भरे टैंकों मे डाल देते । टैंक में डालने के बाद कुछ देर तो मछलियाँ इधर उधर भागती पर जगह कम होने के कारण वे जल्द ही एक जगह स्थिर हो जातीं, और जब ये मछलियाँ बाजार पहुँचती तो भले वे ही सांस ले रही होतीं लेकिन उनमें वो बात नहीं होती जो आज़ाद घूम रही ताज़ी मछलियों मे होती, और जापानी चखकर इन मछलियों में भी अंतर कर लेते । तो इतना कुछ करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई थी। अब मछुवारे क्या करते ? वे कौन सा उपाय लगाते कि ताज़ी मछलियाँ लोगों तक पहुँच पाती ? उन्होंने कुछ नया नहीं किया, वें अभी भी मछलियाँ टैंक्स में ही रखते, पर इस बार वो हर एक टैंक मे एक छोटी सी शार्क मछली भी डाल देते। शार्क कुछ मछलियों को जरूर खा जाती पर ज्यादातर मछलियाँ बिलकुल ताज़ी पहुंचती। ऐसा क्यों होता ? क्योंकि शार्क बाकि मछलियों की लिए एक चैलेंज की तरह थी। उसकी मौज़ूदगी बाकि मछलियों को हमेशा चौकन्ना रखती ओर अपनी जान बचाने के लिए वे हमेशा अलर्ट रहती। इसीलिए कई दिनों तक टैंक में रहने के बावज़ूद उनमे स्फूर्ति और ताजापन बना रहता।* 


*अब यह तो हो गई घटना की बात लेकिन इस सत्य घटना की आज क्या प्रासंगिकता है इस पर चर्चा करते हैं। आज बहुत से लोगों की ज़िन्दगी टैंक में पड़ी उन मछलियों की तरह हो गयी है जिन्हें जगाने के लिए कोई शार्क मौज़ूद नहीं है। और अगर दुर्भाग्य से आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो आपको भी आपने जीवन में नये चैलेंजेस स्वीकार करने होंगे।* *आप जिस रूटीन के आदी हों चुकें हैं उससे कुछ अलग़ करना होगा।आपको अपना दायरा बढ़ाना होगा और एक बार फिर ज़िन्दगी में रोमांच और नयापन लाना होगा तभी आप समाजोपयोगी व सार्थक बने रहेंगे । नहीं तो, बासी मछलियों की तरह आपका भी मोल कम हों जायेगा और लोग आपसे मिलने-जुलने की बजाय बचते नजर आएंगे। और दूसरी तरफ अगर आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये, कहीं ना कहीं ये आपको fresh and lively बनाये रखती हैं , इन्हें accept करिये, इन्हे overcome करिये और अपना तेज बनाये रखिये।*


*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

Thursday, March 30, 2023

*राम..!*

 *बांगरू बाण*

*श्रीपादावधूत की कलम से* 


*राम..!*


*ये राम का देश है। यहां कण कण में राम हैं।* भाव की हर हिलोर में राम हैं। कर्म के हर छोर में राम हैं। राम यत्र-तत्र हैं। राम सर्वत्र हैं। जिसमें रम गए वही राम है। यहां सबके अपने-अपने राम हैं। *वाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है*। *भवभूति के राम दोनों से अलग हैं।* *कबीर ने राम को जाना। तुलसी ने माना। निराला ने बखाना।* राम एक ही हैं पर दृष्टि सबकी भिन्न। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यवत्ता और संयम का नाम है राम। आप ईश्वरवादी भले ही न हो, तो भी घर-घर में राम की गहरी व्याप्ति से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम तो मानना ही पड़ेगा। स्थितप्रज्ञ, असंम्पृक्त, अनासक्त। *एक ऐसा लोक नायक, जिसमें सत्ता के प्रति निरासक्ति का भाव है। जो जिस सत्ता का पालक है, उसी को छोड़ने के लिए सदा तैयार है।*

*राम हमारे देश की उत्तर दक्षिण एकता के अकेले सूत्रधार है*। *कबीर राम को परम ब्रह्म मानते है। “कस्तूरी कुण्डल बले मृग ढूँढे बन माही ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाहीं “* 

हमारे *राम लोकंकमंगलकारी है*। *मर्यादा पुरूषोत्तम है*। राम का आदर्श, लक्ष्मण रेखा की मर्यादा है। लांघी तो अनर्थ। सीमा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन। *राम जाति वर्ग से परे है। नर, वानर, आदिवासी, पशु, मानव, दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता है।* *अगड़े पिछड़े से ऊपर निषादराज हों या सुग्रीव, शबरी हों या जटायु, सभी को साथ ले चलने वाले वे अकेले देवता हैं। भरत के लिए आदर्श भाई। हनुमान के लिए स्वामी। प्रजा के लिए नीतिकुशल न्यायप्रिय राजा हैं।* परिवार नाम की संस्था में उन्होंने नए संस्कार जोड़े। पति पत्नी के प्रेम की नई परिभाषा दी। ऐसे वक्त जब खुद उनके पिता ने तीन विवाह किए थे। पर राम ने अपनी दृष्टि सिर्फ एक महिला तक सीमित रखी। उस निगाह से किसी दूसरी महिला को कभी देखा नहीं। जब सीता का अपहरण हुआ वे व्याकुल थे। रो-रो कर पेड़, पौधे, पहाड़ से उनका पता पूछ रहे थे। *अपरिमित असीमित सामर्थ्य शक्ति  से अहंकार का एक खास रिश्ता हो जाता है। पर उनमें अंहकार छू तक नही गया था। यही वजह है कि  अपार शक्ति के बावजूद राम मनमाने फैसले नहीं लेते थे। वे लोकतांत्रिक हैं। सामूहिकता को समर्पित विधान की मर्यादा जानते हैं*। धर्म और व्यवहार की मर्यादा भी और परिवार का बंधन भी। *नर हो या वानर इन सबके प्रति वे अपने कर्तव्यबोध पर सजग रहते हैं। वे मानवीय करुणा जानते हैं। वे मानते हैं- परहित सरिस धर्म नहीं भाई।*



*राम* का अर्थ है *‘प्रकाश’*। किरण एवं आभा (कांति) जैसे शब्दों के मूल में राम है। *‘रा’ का अर्थ है आभा* और *‘म’ का अर्थ है मैं; मेरा और मैं स्वयं।* राम का अर्थ है मेरे भीतर प्रकाश, मेरे ह्रदय में प्रकाश। निश्चय ही ‘राम’ ईश्वर का नाम है,

राम शब्द में दो अर्थ व्यंजित हैं,*सुखद होना..! और ठहर जाना..!!*


*राम शब्द की व्युत्पत्ति* 


*राम शब्द* संस्कृत के दो धातुओं, *रम् और घम* से बना है। *रम् का अर्थ है रमना या निहित होना* और *घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान।* इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, *“रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते”* अर्थात, *योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं।* 

*'राम' ही मात्र एक ऐसे विषय हैं, जो योगियों की आध्यात्मिक-मानसिक भूख हैं, भोजन हैं, हर्ष, आनन्द और उल्लास के मूल स्त्रोत हैं।* 


*पुराण अनुसार राम नाम का अर्थ*

*ब्रह्मवैवर्त पुराण* को सबसे प्राचीनतम पुराण माना जाता हैं। राधा रानी कहती हैं -

*राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचक:।*

*विश्वानामीश्वरो यो हि तेन राम: प्रकीर्तत:।।*

*" रा " शब्द विश्ववाचक* है और *"म " शब्द ईश्वरवाचक* है, इसलिए जो *विश्व का ईश्वर* है , उसे *" राम "* कहा जाता है।


इसके अतिरिक्त *अग्नि पुराण , शिव पुराण , विष्णु पुराण, पद्म पुराण , स्कंद पुराण एवं भागवत पुराण आदि में राम जी की महिमा का वर्णन है ।*


*भगवान शिव पद्म पुराण में मां पार्वती जी से कहते हैं* -

*राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।*

*सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।*

सुमुखी ! मैं तो राम ! राम ! राम ! इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्री राम नाम में ही निरंतर रमण करता हूं । राम नाम संपूर्ण सहस्रनाम के समान है ।


*राम नाम का उपनिषदों में वर्णन*


प्रभु श्री राम के अनंत महिमा का वर्णन पुराणों के साथ साथ उपनिषदों में भी हैं। जैसे - *महोपनिषद , भिक्षुकोपनिषद , पैंगलोपनिषद , शांडिल्योपनिषद तथा योगशिखोपनिषद* । इतना ही नहीं, *प्रभु श्री राम के नाम से 2 उपनिषद (रामरहस्योपनिषद और श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद)* का नाम भी राम नाम से प्रारंभ होता है

*रामरहस्योपनिषद* के अनुसार सभी पुराणों, शास्त्रों, चारों विद्याओं और आध्यात्मिक दर्शन का मूल तत्व प्रभु श्रीराम को माना गया है। इस नाम का प्रताप इतना विशाल हैं कि *आदि कवि महर्षि वाल्मीकि* जी उल्टा राम नाम (मरा- मरा) जप कर भी पवित्र हो गए।


*अपने मार्ग से भटका हुआ कोई क्लांत पथिक किसी सुरम्य स्थान को देखकर ठहर जाता है। उसी ठहराव का नाम राम है क्योंकि उसमें विराम है, आराम है, विश्राम है।*


*अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं* 

*'राम-राम' शब्द* जब भी अभिवादन करते समय बोला जाता है तो हमेशा 2 बार बोला जाता है। इसके पीछे एक वैदिक दृष्टिकोण माना जाता है। वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार *पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है।* वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है, क्योंकि *हिंदी वर्णमाला में ''र" 27वां अक्षर है।* *'आ' की मात्रा 2रा अक्षर और 'म' 25 वां अक्षर*, इसलिए सब मिलाकर जो योग बनता है वो है *27 + 2 + 25 = 54,* अर्थात *एक “राम” का योग 54* हुआ। और *2 बार राम राम कहने से 108* हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है। जब भी हम कोई जाप करते हैं तो हमे 108 बार जाप करने के लिए कहा जाता है। 


*108 का वैज्ञानिक महत्व*

यहां हम अगर *वैज्ञानिक तथ्य की बात करें तो 108 मनके की माला और सूर्य की कलाओं का एक दूसरे से संबंध माना गया है।* वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार *1 वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता हैं।* इसमें वह 6 माह उत्तरायण रहता है और 6 माह दक्षिणायन रहता है। इस तरह से *6 माह में सूर्य की कलाएं 108000 बार बदलती हैं।* इसी तरह से अंत के *3 शून्य को अगर हटा दिया जाए तो 108 की संख्या बचती है।108 मनको को सूर्य की कलाओं का प्रतीक माना जाता है।* 


हमने सुखद ठहराव का अर्थ देने वाले जितने भी शब्द गढ़े सभी में *राम* अंतर्निहित है.

यथा,

*आराम..!*

*विराम..!*

*विश्राम..!*

*अभिराम..!*

*उपराम..!*

*ग्राम..!*

#जो *रमने* के लिए *विवश* कर दे वह *राम..!*

जीवन की आपाधापी में पड़ा *अशांत* मन जिस आनंददायक *गंतव्य* की सतत तलाश में है, वह गंतव्य है *राम..!*


भारतीय मन हर स्थिति में *राम* को साक्षी बनाने का आदी है।

👉दुःख में,

*हे राम..!*

👉पीड़ा में,

*हे राम..!*

👉लज्जा में,

*हाय राम..!*

👉अशुभ में,

*अरे राम राम..!*

👉अभिवादन में,

*राम राम..!*

👉शपथ में,

*रामदुहाई..!*

👉अज्ञानता में,

*राम जाने..!*

👉अनिश्चितता में,

*राम भरोसे..!*

👉अचूकता के लिए,

*रामबाण..!*

👉मृत्यु के लिए,

*रामनाम सत्य..!*

👉सुशासन के लिए,

*रामराज्य..!*


जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर *राम* को साथ खड़ा करतीं हैं।

*राम* भी *इतने सरल हैं कि हर जगह खड़े हो जाते हैं। इसलिए  हर भारतीय उन पर अपना अधिकार मानता है।* 

👉जिसका कोई नहीं उसके लिए *राम हैं-*

*निर्बल के बल राम..!*

असंख्य बार देखी सुनी पढ़ी जा चुकी *रामकथा* का आकर्षण कभी नहीं खोता।

*राम पुनर्नवा हैं।*

हमारे भीतर जो कुछ भी अच्छा है, वह *राम* है। जो *शाश्वत* है, वह *राम* हैं।

*सब-कुछ लुट जाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही तो राम है। घोर निराशा के बीच जो उठ खड़ा होता है, वह भी राम ही है।*

*सीमाओं के बीच छुपे असीम को देखना हो तो राम को देखिए..!!*

  


*सियाराम मय सब जग जानी।* 

*करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।*

Monday, March 27, 2023

बांगरू बाण

 *बांगरू बाण*

*श्रीपादावधूत की कलम से* 


**आइए आज जानते हैं ठाकुर, भंवर/भंवरी, तंवर/तंवरी, कुंवर, यह नाम नहीं उपाधियां है और यह किन को प्राप्त होती है।*


*राजस्थानी संस्कृति में राजपूतों को ठाकुर कहने की परंपरा है। लेकिन हमें यह नहीं पता कि ठाकुर कहते किसको है।*

*शोले का संजीव कुमार का कैरेक्टर ठाकुर सबको पता है इसीलिए हम सभी राजपूत भाइयों को ठाकुर कह देते हैं जो सही नहीं है।*

*ठाकुर यह वह पदवी है जो किसी पुत्र को तब मिलती है जब वह परिवार का मुखिया बनता है अर्थात जब उसके पिता का देहांत होता है और पिता के स्थान पर जब उसके पास मुखिया का पद आता है तब वह ठाकुर कहलाता है इसलिए कोई भी व्यक्ति ठाकुर कहलाना इसलिए पसंद नहीं करता क्योंकि इसके लिए उनके पिता का देहांत होना आवश्यक होता है और कोई भी बेटा अपने पिता का देहांत नहीं चाहता।* *इसलिए आगे से आप ठाकुर उसी व्यक्ति को कहिए जिसके पिता जीवित नहीं है और वह घर का मुखिया है।*

*इसी प्रकार एक नाम आपने भंवर सुना होगा। आपने कई लोगों के नाम भंवर या भंवरी सुना होगा यह भी एक तरह की पदवी है। जिस बच्चे के दादा जीवित होते हैं और वह बच्चा होता है तो उसका नामकरण भंवर अगर वह लड़का है और लड़की है तो भंवरी यह रखा जाता था।* 

*हां जी यह सुनकर आपको बड़ा अजीब लग सकता है कि दादा के जीवित रहते हर व्यक्ति का नाम भंवर या भंवरी रखना इसमें क्या औचित्य है। क्योंकि सामान्यतया हर बच्चे के जन्म के समय उसके दादा जीवित रहते ही हैं इसलिए यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है इसी को आधार बनाया जाए तो लगभग 90 से 95% बच्चों का नाम भंवर या भंवरी होना चाहिए। लेकिन यह घटना है उस समय की है जब राजस्थान की राजपूताना कौम सदैव युद्ध में रत रहती थी और युद्ध में राजपूत वीरों का बलिदान होते ही रहता था इसलिए बहुत ही वीर और पराक्रम शाली राजपूत ही अपने जिंदा रहते दादा बन पाता था । अर्थात अपने आंखों से अपने पोते या पोती को देख पाता था। इसीलिए वह अपने पोते या पोती का नाम भंवर या भंवरी रखता था। भंवर या भंवरी यह नाम समाज में उस बच्चे को एक अलग से प्रतिष्ठा दिलाते थे कि वह कितना सौभाग्यशाली है कि उसके सर पर उसके दादा का आशीर्वाद अभी तक बना हुआ है।*

*इसी प्रकार तंवर या तंवरी यह नामकरण भी भंवर या भंवरी से ज्यादा श्रेष्ठ माना जाता था। क्योंकि तंवर या तंवरी यह नाम उस बालक या बालिका का रखा जाता था जिसके परदादा जीवित रहे हो जो अपने आप में बहुत ही रेयर ऑफ द रेयर अर्थात बहुत ही कम देखने को मिलता था। इसलिए तंवर नाम की श्रेष्ठता भंवर नाम से अधिक मानी गई है*

*बाकी आप सब लोग तो जानते ही हैं कुंवर यह उपाधि हर उस बालक को प्राप्त होती है जिनके पिताजी जीवित हैं।*