Saturday, July 8, 2023
Friday, June 16, 2023
अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई
*बांगरू बाण*
*संकलित:--*
श्रीपादावधूत
*एक संन्यासी अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा। वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे। संन्यासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछने लगा,*
*"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?"*
*शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, "क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”*
*"पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है। जो कहना है वो आप सामान्य आवाज़ में भी तो कह सकते हैं"*
*संन्यासी ने पुनः प्रश्न किया। कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देन का प्रयास किया पर बाकि लोग संतुष्ट नहीं हुए।*
*अंततः संन्यासी ने समझाया…!!!!*
*“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं! और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा। लेकिन जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है, और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”*
*इसी को सच्चा प्रेम कहते है जहाँ दिल की बात को दिल समझ लेता है उसे शब्दों की जरुरत नहीं होती।*
*इसीलिए हिंदू समाज में ईश्वर आराधना मौन होकर की जाती है क्योंकि हम उस परमपिता परमेश्वर से असीम प्रेम और श्रद्धा रखते हैं। जिन धर्मावलंबियों का ईश्वर से प्रेम ना होकर किसी पुस्तक या किसी व्यक्ति विशेष की बातों पर ही केवल भरोसा हो उन्हें अपनी बात कहने के लिए लाउडस्पीकर जैसे साधनों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि उनकी और उनके ईश्वर से इतनी दूरी है कि उन्हें चिल्लाकर ही अपनी बात को अभिव्यक्त करना पड़ता है।*
*कबीर ने कहा है*
*गुंगे केरी सरकरा, खाई और मुसकाई ।। "*
*कबीर दास जी कहते है कि "प्रेम की कहानी बड़ी अजीब है, इसे कहा नहीं जा सकता जैसे कोई कोई गूंगा आम का मीठा रस खाता है लेकिन उसकी मिठास को कह नहीं पाता इसी प्रकार जिसने इस प्रेम रस को पिया है वह सिर्फ मुसकाता है । वह गूंगे जैसा हो जाता है बोलने के लिए कुछ भी नही बचता।*
*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*
अमरनाथ की पवित्र गुफा के समान ही आस्ट्रिया में भी गुफा की खोज
ये आस्ट्रिया में सेल्जबर्ग क्षेत्र में गुफाओं के जाल के रूप में 40 किमी के दायरे में फैला है। 1879 में सेल्जबर्ग के एन्टन पोसेल्ट नामक वैज्ञानिक ने इन गुफाओं में 200 मीटर तक जाकर इनकी औपचारिक खोज अपने नाम दर्ज कराई और इसे माउन्टनोयरिंग मेगजीन में छपवाया, इससे पहले यहां सिर्फ शिकारी जाया करते थे। 1920 से यहां पर्यटकों का आवागमन शुरू हुआ। भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक परीक्षणों से ज्ञात होता है कि ये बर्फ की शिलाएं करीब 1000 साल पुरानी है।
ये बिल्कुल बर्फ के शिवलिंग के समान दिखती है।अमरनाथ के शिवलिंग मंदिर और ईस्रीसनवेल्ट गुफाओं में एक अन्यसमानता यह भी है कि यहां बर्फ का गठन बारहमासी नहीं है। ये दोनों गुफाएं गतिशील और चक्रीय मौसम परिवर्तनों से प्रभावित होती है। इनमें पड़ी दरारें यहां आने वाली हवा को तरल रूप में यहां से वहां प्रवाहित होने देती है। गुफाओं के भीतर का तापमान बाहर के तापमान की तुलना में सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रहता है। सर्दियों में जब गुफाओं में हवा अपेक्षाकृत गर्म होती है तो बाहर के वायुमण्डल की ठंडी हवा आकार गुफाओं की निचली सतह के क्षेत्र को जमाव बिंदु से नीचे ले आती है। गर्मियों में ये बर्फ की शिलाएं गलना शुरू हो जाती है और इनका प्रतिरूप उत्कृष्ठ प्रतिमाओं के रूप देखा जा सकता है ।
बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय।
Wednesday, June 14, 2023
गुंडा शब्द का सही एवं समीचीन अर्थ।*
मोक्षपट, मोक्षपात, मोक्ष पटामू, परम पदम अर्थात आज का "सांप-सीढीं" का खेल।*
Friday, June 9, 2023
नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।
*बदन दर्द, कमर दर्द, सर्वाइकल और चारपाई/खाट/खटिया*
Monday, May 29, 2023
संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*
Tuesday, May 23, 2023
आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये
*बांगरू बाण*
*संकलित:-* श्रीपादावधूत
*जापान में हमेशा से ही मछलियाँ खाने का एक ज़रुरी हिस्सा रही हैं और ये जितनी ताज़ी होतीं हैं लोग उसे उतना ही पसंद करते हैं । लेकिन जापान के तटों के आस-पास इतनी मछलियाँ नहीं होतीं की उनसे लोगों की डिमांड पूरी की जा सके ।नतीजतन मछुआरों को दूर समुद्र में जाकर मछलियाँ पकड़नी पड़ती हैं। जब इस तरह से मछलियाँ पकड़ने की शुरुआत हुई तो मछुआरों के सामने एक गंभीर समस्या सामने आई । वे जितनी दूर मछली पकडने जाते उन्हें लौटने में उतना ही अधिक समय लगता और मछलियाँ बाजार तक पहुँचते-पहुँचते बासी हो जातीं, और फिर कोई उन्हें खरीदना नहीं चाहता । इस समस्या से निपटने के लिए मछुआरों ने अपनी बोट्स पर फ्रीज़र लगवा लिये । वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें फ्रीजर में डाल देते । इस तरह से वे और भी देर तक मछलियाँ पकड़ सकते थे और उसे बाजार तक पहुंचा सकते थे । पर इसमें भी एक समस्या आ गयी । जापानी फ्रोजेन फ़िश ओर फ्रेश फिश में आसनी से अंतर कर लेते और फ्रोजेन मछलियों को खरीदने से कतराते। उन्हें तो किसी भी कीमत पर ताज़ी मछलियाँ ही चाहिए होतीं है। एक बार फिर मछुआरों ने इस समस्या से निपटने की सोची और इस बार एक शानदार तरीका निकाला, उन्होंने अपनी बड़े-बड़े जहाजों पर फ़िश टैंक्स बनवा लिए और अब वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें पानी से भरे टैंकों मे डाल देते । टैंक में डालने के बाद कुछ देर तो मछलियाँ इधर उधर भागती पर जगह कम होने के कारण वे जल्द ही एक जगह स्थिर हो जातीं, और जब ये मछलियाँ बाजार पहुँचती तो भले वे ही सांस ले रही होतीं लेकिन उनमें वो बात नहीं होती जो आज़ाद घूम रही ताज़ी मछलियों मे होती, और जापानी चखकर इन मछलियों में भी अंतर कर लेते । तो इतना कुछ करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई थी। अब मछुवारे क्या करते ? वे कौन सा उपाय लगाते कि ताज़ी मछलियाँ लोगों तक पहुँच पाती ? उन्होंने कुछ नया नहीं किया, वें अभी भी मछलियाँ टैंक्स में ही रखते, पर इस बार वो हर एक टैंक मे एक छोटी सी शार्क मछली भी डाल देते। शार्क कुछ मछलियों को जरूर खा जाती पर ज्यादातर मछलियाँ बिलकुल ताज़ी पहुंचती। ऐसा क्यों होता ? क्योंकि शार्क बाकि मछलियों की लिए एक चैलेंज की तरह थी। उसकी मौज़ूदगी बाकि मछलियों को हमेशा चौकन्ना रखती ओर अपनी जान बचाने के लिए वे हमेशा अलर्ट रहती। इसीलिए कई दिनों तक टैंक में रहने के बावज़ूद उनमे स्फूर्ति और ताजापन बना रहता।*
*अब यह तो हो गई घटना की बात लेकिन इस सत्य घटना की आज क्या प्रासंगिकता है इस पर चर्चा करते हैं। आज बहुत से लोगों की ज़िन्दगी टैंक में पड़ी उन मछलियों की तरह हो गयी है जिन्हें जगाने के लिए कोई शार्क मौज़ूद नहीं है। और अगर दुर्भाग्य से आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो आपको भी आपने जीवन में नये चैलेंजेस स्वीकार करने होंगे।* *आप जिस रूटीन के आदी हों चुकें हैं उससे कुछ अलग़ करना होगा।आपको अपना दायरा बढ़ाना होगा और एक बार फिर ज़िन्दगी में रोमांच और नयापन लाना होगा तभी आप समाजोपयोगी व सार्थक बने रहेंगे । नहीं तो, बासी मछलियों की तरह आपका भी मोल कम हों जायेगा और लोग आपसे मिलने-जुलने की बजाय बचते नजर आएंगे। और दूसरी तरफ अगर आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये, कहीं ना कहीं ये आपको fresh and lively बनाये रखती हैं , इन्हें accept करिये, इन्हे overcome करिये और अपना तेज बनाये रखिये।*
*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*
Thursday, March 30, 2023
*राम..!*
*बांगरू बाण*
*श्रीपादावधूत की कलम से*
*राम..!*
*ये राम का देश है। यहां कण कण में राम हैं।* भाव की हर हिलोर में राम हैं। कर्म के हर छोर में राम हैं। राम यत्र-तत्र हैं। राम सर्वत्र हैं। जिसमें रम गए वही राम है। यहां सबके अपने-अपने राम हैं। *वाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है*। *भवभूति के राम दोनों से अलग हैं।* *कबीर ने राम को जाना। तुलसी ने माना। निराला ने बखाना।* राम एक ही हैं पर दृष्टि सबकी भिन्न। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यवत्ता और संयम का नाम है राम। आप ईश्वरवादी भले ही न हो, तो भी घर-घर में राम की गहरी व्याप्ति से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम तो मानना ही पड़ेगा। स्थितप्रज्ञ, असंम्पृक्त, अनासक्त। *एक ऐसा लोक नायक, जिसमें सत्ता के प्रति निरासक्ति का भाव है। जो जिस सत्ता का पालक है, उसी को छोड़ने के लिए सदा तैयार है।*
*राम हमारे देश की उत्तर दक्षिण एकता के अकेले सूत्रधार है*। *कबीर राम को परम ब्रह्म मानते है। “कस्तूरी कुण्डल बले मृग ढूँढे बन माही ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाहीं “*
हमारे *राम लोकंकमंगलकारी है*। *मर्यादा पुरूषोत्तम है*। राम का आदर्श, लक्ष्मण रेखा की मर्यादा है। लांघी तो अनर्थ। सीमा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन। *राम जाति वर्ग से परे है। नर, वानर, आदिवासी, पशु, मानव, दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता है।* *अगड़े पिछड़े से ऊपर निषादराज हों या सुग्रीव, शबरी हों या जटायु, सभी को साथ ले चलने वाले वे अकेले देवता हैं। भरत के लिए आदर्श भाई। हनुमान के लिए स्वामी। प्रजा के लिए नीतिकुशल न्यायप्रिय राजा हैं।* परिवार नाम की संस्था में उन्होंने नए संस्कार जोड़े। पति पत्नी के प्रेम की नई परिभाषा दी। ऐसे वक्त जब खुद उनके पिता ने तीन विवाह किए थे। पर राम ने अपनी दृष्टि सिर्फ एक महिला तक सीमित रखी। उस निगाह से किसी दूसरी महिला को कभी देखा नहीं। जब सीता का अपहरण हुआ वे व्याकुल थे। रो-रो कर पेड़, पौधे, पहाड़ से उनका पता पूछ रहे थे। *अपरिमित असीमित सामर्थ्य शक्ति से अहंकार का एक खास रिश्ता हो जाता है। पर उनमें अंहकार छू तक नही गया था। यही वजह है कि अपार शक्ति के बावजूद राम मनमाने फैसले नहीं लेते थे। वे लोकतांत्रिक हैं। सामूहिकता को समर्पित विधान की मर्यादा जानते हैं*। धर्म और व्यवहार की मर्यादा भी और परिवार का बंधन भी। *नर हो या वानर इन सबके प्रति वे अपने कर्तव्यबोध पर सजग रहते हैं। वे मानवीय करुणा जानते हैं। वे मानते हैं- परहित सरिस धर्म नहीं भाई।*
*राम* का अर्थ है *‘प्रकाश’*। किरण एवं आभा (कांति) जैसे शब्दों के मूल में राम है। *‘रा’ का अर्थ है आभा* और *‘म’ का अर्थ है मैं; मेरा और मैं स्वयं।* राम का अर्थ है मेरे भीतर प्रकाश, मेरे ह्रदय में प्रकाश। निश्चय ही ‘राम’ ईश्वर का नाम है,
राम शब्द में दो अर्थ व्यंजित हैं,*सुखद होना..! और ठहर जाना..!!*
*राम शब्द की व्युत्पत्ति*
*राम शब्द* संस्कृत के दो धातुओं, *रम् और घम* से बना है। *रम् का अर्थ है रमना या निहित होना* और *घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान।* इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, *“रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते”* अर्थात, *योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं।*
*'राम' ही मात्र एक ऐसे विषय हैं, जो योगियों की आध्यात्मिक-मानसिक भूख हैं, भोजन हैं, हर्ष, आनन्द और उल्लास के मूल स्त्रोत हैं।*
*पुराण अनुसार राम नाम का अर्थ*
*ब्रह्मवैवर्त पुराण* को सबसे प्राचीनतम पुराण माना जाता हैं। राधा रानी कहती हैं -
*राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचक:।*
*विश्वानामीश्वरो यो हि तेन राम: प्रकीर्तत:।।*
*" रा " शब्द विश्ववाचक* है और *"म " शब्द ईश्वरवाचक* है, इसलिए जो *विश्व का ईश्वर* है , उसे *" राम "* कहा जाता है।
इसके अतिरिक्त *अग्नि पुराण , शिव पुराण , विष्णु पुराण, पद्म पुराण , स्कंद पुराण एवं भागवत पुराण आदि में राम जी की महिमा का वर्णन है ।*
*भगवान शिव पद्म पुराण में मां पार्वती जी से कहते हैं* -
*राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।*
*सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।*
सुमुखी ! मैं तो राम ! राम ! राम ! इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्री राम नाम में ही निरंतर रमण करता हूं । राम नाम संपूर्ण सहस्रनाम के समान है ।
*राम नाम का उपनिषदों में वर्णन*
प्रभु श्री राम के अनंत महिमा का वर्णन पुराणों के साथ साथ उपनिषदों में भी हैं। जैसे - *महोपनिषद , भिक्षुकोपनिषद , पैंगलोपनिषद , शांडिल्योपनिषद तथा योगशिखोपनिषद* । इतना ही नहीं, *प्रभु श्री राम के नाम से 2 उपनिषद (रामरहस्योपनिषद और श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद)* का नाम भी राम नाम से प्रारंभ होता है
*रामरहस्योपनिषद* के अनुसार सभी पुराणों, शास्त्रों, चारों विद्याओं और आध्यात्मिक दर्शन का मूल तत्व प्रभु श्रीराम को माना गया है। इस नाम का प्रताप इतना विशाल हैं कि *आदि कवि महर्षि वाल्मीकि* जी उल्टा राम नाम (मरा- मरा) जप कर भी पवित्र हो गए।
*अपने मार्ग से भटका हुआ कोई क्लांत पथिक किसी सुरम्य स्थान को देखकर ठहर जाता है। उसी ठहराव का नाम राम है क्योंकि उसमें विराम है, आराम है, विश्राम है।*
*अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं*
*'राम-राम' शब्द* जब भी अभिवादन करते समय बोला जाता है तो हमेशा 2 बार बोला जाता है। इसके पीछे एक वैदिक दृष्टिकोण माना जाता है। वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार *पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है।* वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है, क्योंकि *हिंदी वर्णमाला में ''र" 27वां अक्षर है।* *'आ' की मात्रा 2रा अक्षर और 'म' 25 वां अक्षर*, इसलिए सब मिलाकर जो योग बनता है वो है *27 + 2 + 25 = 54,* अर्थात *एक “राम” का योग 54* हुआ। और *2 बार राम राम कहने से 108* हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है। जब भी हम कोई जाप करते हैं तो हमे 108 बार जाप करने के लिए कहा जाता है।
*108 का वैज्ञानिक महत्व*
यहां हम अगर *वैज्ञानिक तथ्य की बात करें तो 108 मनके की माला और सूर्य की कलाओं का एक दूसरे से संबंध माना गया है।* वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार *1 वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता हैं।* इसमें वह 6 माह उत्तरायण रहता है और 6 माह दक्षिणायन रहता है। इस तरह से *6 माह में सूर्य की कलाएं 108000 बार बदलती हैं।* इसी तरह से अंत के *3 शून्य को अगर हटा दिया जाए तो 108 की संख्या बचती है।108 मनको को सूर्य की कलाओं का प्रतीक माना जाता है।*
हमने सुखद ठहराव का अर्थ देने वाले जितने भी शब्द गढ़े सभी में *राम* अंतर्निहित है.
यथा,
*आराम..!*
*विराम..!*
*विश्राम..!*
*अभिराम..!*
*उपराम..!*
*ग्राम..!*
#जो *रमने* के लिए *विवश* कर दे वह *राम..!*
जीवन की आपाधापी में पड़ा *अशांत* मन जिस आनंददायक *गंतव्य* की सतत तलाश में है, वह गंतव्य है *राम..!*
भारतीय मन हर स्थिति में *राम* को साक्षी बनाने का आदी है।
👉दुःख में,
*हे राम..!*
👉पीड़ा में,
*हे राम..!*
👉लज्जा में,
*हाय राम..!*
👉अशुभ में,
*अरे राम राम..!*
👉अभिवादन में,
*राम राम..!*
👉शपथ में,
*रामदुहाई..!*
👉अज्ञानता में,
*राम जाने..!*
👉अनिश्चितता में,
*राम भरोसे..!*
👉अचूकता के लिए,
*रामबाण..!*
👉मृत्यु के लिए,
*रामनाम सत्य..!*
👉सुशासन के लिए,
*रामराज्य..!*
जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर *राम* को साथ खड़ा करतीं हैं।
*राम* भी *इतने सरल हैं कि हर जगह खड़े हो जाते हैं। इसलिए हर भारतीय उन पर अपना अधिकार मानता है।*
👉जिसका कोई नहीं उसके लिए *राम हैं-*
*निर्बल के बल राम..!*
असंख्य बार देखी सुनी पढ़ी जा चुकी *रामकथा* का आकर्षण कभी नहीं खोता।
*राम पुनर्नवा हैं।*
हमारे भीतर जो कुछ भी अच्छा है, वह *राम* है। जो *शाश्वत* है, वह *राम* हैं।
*सब-कुछ लुट जाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही तो राम है। घोर निराशा के बीच जो उठ खड़ा होता है, वह भी राम ही है।*
*सीमाओं के बीच छुपे असीम को देखना हो तो राम को देखिए..!!*
*सियाराम मय सब जग जानी।*
*करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।*
Monday, March 27, 2023
बांगरू बाण
*बांगरू बाण*
*श्रीपादावधूत की कलम से*
**आइए आज जानते हैं ठाकुर, भंवर/भंवरी, तंवर/तंवरी, कुंवर, यह नाम नहीं उपाधियां है और यह किन को प्राप्त होती है।*
*राजस्थानी संस्कृति में राजपूतों को ठाकुर कहने की परंपरा है। लेकिन हमें यह नहीं पता कि ठाकुर कहते किसको है।*
*शोले का संजीव कुमार का कैरेक्टर ठाकुर सबको पता है इसीलिए हम सभी राजपूत भाइयों को ठाकुर कह देते हैं जो सही नहीं है।*
*ठाकुर यह वह पदवी है जो किसी पुत्र को तब मिलती है जब वह परिवार का मुखिया बनता है अर्थात जब उसके पिता का देहांत होता है और पिता के स्थान पर जब उसके पास मुखिया का पद आता है तब वह ठाकुर कहलाता है इसलिए कोई भी व्यक्ति ठाकुर कहलाना इसलिए पसंद नहीं करता क्योंकि इसके लिए उनके पिता का देहांत होना आवश्यक होता है और कोई भी बेटा अपने पिता का देहांत नहीं चाहता।* *इसलिए आगे से आप ठाकुर उसी व्यक्ति को कहिए जिसके पिता जीवित नहीं है और वह घर का मुखिया है।*
*इसी प्रकार एक नाम आपने भंवर सुना होगा। आपने कई लोगों के नाम भंवर या भंवरी सुना होगा यह भी एक तरह की पदवी है। जिस बच्चे के दादा जीवित होते हैं और वह बच्चा होता है तो उसका नामकरण भंवर अगर वह लड़का है और लड़की है तो भंवरी यह रखा जाता था।*
*हां जी यह सुनकर आपको बड़ा अजीब लग सकता है कि दादा के जीवित रहते हर व्यक्ति का नाम भंवर या भंवरी रखना इसमें क्या औचित्य है। क्योंकि सामान्यतया हर बच्चे के जन्म के समय उसके दादा जीवित रहते ही हैं इसलिए यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है इसी को आधार बनाया जाए तो लगभग 90 से 95% बच्चों का नाम भंवर या भंवरी होना चाहिए। लेकिन यह घटना है उस समय की है जब राजस्थान की राजपूताना कौम सदैव युद्ध में रत रहती थी और युद्ध में राजपूत वीरों का बलिदान होते ही रहता था इसलिए बहुत ही वीर और पराक्रम शाली राजपूत ही अपने जिंदा रहते दादा बन पाता था । अर्थात अपने आंखों से अपने पोते या पोती को देख पाता था। इसीलिए वह अपने पोते या पोती का नाम भंवर या भंवरी रखता था। भंवर या भंवरी यह नाम समाज में उस बच्चे को एक अलग से प्रतिष्ठा दिलाते थे कि वह कितना सौभाग्यशाली है कि उसके सर पर उसके दादा का आशीर्वाद अभी तक बना हुआ है।*
*इसी प्रकार तंवर या तंवरी यह नामकरण भी भंवर या भंवरी से ज्यादा श्रेष्ठ माना जाता था। क्योंकि तंवर या तंवरी यह नाम उस बालक या बालिका का रखा जाता था जिसके परदादा जीवित रहे हो जो अपने आप में बहुत ही रेयर ऑफ द रेयर अर्थात बहुत ही कम देखने को मिलता था। इसलिए तंवर नाम की श्रेष्ठता भंवर नाम से अधिक मानी गई है*
*बाकी आप सब लोग तो जानते ही हैं कुंवर यह उपाधि हर उस बालक को प्राप्त होती है जिनके पिताजी जीवित हैं।*
