Friday, May 10, 2024

*बांगरू-बाण* *मानव विकास के संवर्धक व समरसता के पुरोधा भगवान परशुराम*

*बांगरू-बाण* 

*मानव विकास के संवर्धक व समरसता के पुरोधा भगवान परशुराम* 

श्रीपादावधूत की कलम से 

*अक्षय तृतीया।* 

*आज भगवान परशुराम जी का जन्मोत्सव मनाया जाता है।* 

*सनातन हिंदू समाज में गुलामी के कालखंड में विधर्मियों की शासन व्यवस्था में हमारा धर्म, उपासना पद्धति, उपास्य देव भगवान व सामाजिक धार्मिक जननायको के प्रति एक दुराग्रह पूर्ण भ्रामक इतिहास प्रस्तुत कर उनके महान कार्य को बौना सिद्ध करने का प्रयत्न हुआ है।* 
*यही बात भगवान परशुराम पर भी लागू होती हैं। भगवान परशुराम केवल क्षत्रियों के संहारक के रूप में ही हमारे समक्ष प्रस्तुत किए गए हैं। सोचने वाली बात है कि क्या कोई व्यक्ति हिंसा के बूते जननायक बन सकता है ?*

*समाज सुधार और समाज कल्याण में परशुराम जी की महती भूमिका है।* 
*भगवान परशुराम प्रतीक है एक स्वाभिमानी पितृ भक्त होने का, अपने वचनों पर अडिग रहने का व अन्याय के विरुद्ध युद्ध करके न्याय की पुनर्स्थापना करने का सामाजिक समरसता के प्रथम संवाहक होने का।*

*भगवान शिव साक्षात जिसके गुरु रहे हो ऐसे भगवान परशुराम समाज सुधार से जुड़े क्रांतिकारी अवतारी थे। विष्णु के दशावतारों में से छठवें अवतार  वाले भगवान परशुराम के साथ भी कमोबेश यही हुआ। उनके आक्रोश और पृथ्वी को इक्कीस बार क्षत्रियविहीन करने की घटना को खूब प्रचारित करके वैमस्यता फैलाने का उपक्रम किया जाता है। पिता की आज्ञा पर मां रेणुका का सिर धड़ से अलग करने की घटना को भी एक आज्ञाकारी पुत्र के रुप में एक प्रेरक आख्यान बनाकर सुनाया जाता है। किंतु यहां यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या व्यक्ति केवल चरम हिंसा के बूते जन-नायक के रुप में स्थापित होकर लोकप्रिय हो सकता हैं ?* 

*क्या हैहय वंश के प्रतापी महिष्मति नरेश कार्तवीर्य अर्जुन के वंश का समूल नाश करने के बावजूद पृथ्वी क्षत्रियों से विहीन हो पाई ?* 

*रामायण और महाभारत काल से संपूर्ण पृथ्वी पर क्षत्रिय राजाओं के राज्य हैं। वे ही उनके अधिपति हैं। इक्ष्वाकु वंश के मर्यादा पुरुषोत्तम राम को आशीर्वाद देने वाले, कौरव नरेश धृतराष्ट को पाण्डवों से संधि करने की सलाह देने वाले और सूत-पुत्र कर्ण को ब्रह्मशास्त्र की दीक्षा देने वाले परशुराम ही थे। ये सब क्षत्रिय थे। अर्थात परशुराम क्षत्रियों के शत्रु नहीं शुभचिंतक थे।* *भगवान परशुराम केवल आतातायी क्षत्रियों के प्रबल विरोधी थे।* 

        *समाज सुधार और जनता को रोजगार से जोड़ने में भी परशुराम की अंहम् भूमिका अतंनिर्हित है। केरल, कच्छ और कोंकण क्षेत्रों में जहां परशुराम ने समुद्र में डूबी खेती योग्य भूमि निकालने की तकनीक सुझाई, वहीं परशु का उपयोग जंगलों का सफाया कर भूमि को कृषि योग्य बनाने के काम में भी किया। यहीं परशुराम ने शूद्र माने जाने वाले दरिद्र नारायणों को शिक्षित व दीक्षित कर उन्हें ब्राह्मण बनाया। यज्ञोपवीत संस्कार से जोड़ा और उस समय जो दुराचारी व आचरणहीन ब्राह्मण थे, उन्हें शूद्र घोषित कर उनका सामाजिक बहिष्कार किया। परशुराम के अंत्योदय के प्रकल्प अनूठे व अनुकरणीय हैं। जिन्हें रेखांकित किए जाने की आवश्यकता है।*

        *भगवान परशुराम का समय बहुत प्राचीन है। आज उनके कालखंड को निर्धारित करना इसका आकलन करना कठिन है।  जमदग्नि परशुराम का जन्म हरिशचन्द्रकालीन विश्वामित्र से एक-दो पीढ़ी बाद का माना जाता है। यह समय प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में 'अष्टादश परिवर्तन युग' के नाम से जाना गया है। अर्थात यह समय ऐसे संक्रमण काल के रुप में दर्ज है, जिसे बदलाव का युग माना गया। इसी समय क्षत्रियों की शाखाएं दो कुलों में विभाजित हुईं। एक सूर्यवंश और दूसरा चंद्रवंश।  चंद्रवंशी पूरे भारतवर्ष में छाए हुए थे और उनके प्रताप की तूती बोलती थी। हैहय अर्जुन वंश चंद्रवंशी था। इन्हें यादवों के नाम से भी जाना जाता था।* *महिष्मती नरेश कार्तवीर्य अर्जुन इसी यादवी कुल के वंशज थे। भृगु ऋषि इस चंद्रवंश के राजगुरु थे। जमदग्नि राजगुरु परंपरा का निर्वाह कार्तवीर्य अर्जुन के दरबार में कर रहे थे। किंतु अनीतियों का विरोध करने के कारण कार्तवीर्य अर्जुन और जमदग्नि में मतभेद उत्पन्न हो गए। परिणामस्वरुप जमदग्नि महिष्मति राज्य छोड़ कर चले गए।*

*इस गतिविधि से रुष्ठ होकर सहस्त्रबाहू कार्तवीर्य अर्जुन आखेट का बहाना करके अनायास जमदग्नि के आश्रम में सेना सहित पहुंच गया। ऋषि जमदग्नि और उनकी पत्नी रेणुका ने अतिथि सत्कार किया। लेकिन स्वेच्छाचारी अर्जुन युद्ध के उन्माद में था। इसलिए उसने प्रतिहिंसा स्वरुप जमदग्नि की हत्या कर दी। आश्रम उजाड़ा और ऋषि की प्रिय कामधेनु गाय को बछड़े सहित बलात् छीनकर ले गया। अनेक ब्राहम्णों ने कान्यकुब्ज के राजा गाधि राज्य में शरण ली। परशुराम जब यात्रा से लौटे तो रेणुका ने आपबीती सुनाई। इस घटना से कुपित व क्रोधित होकर परशुराम ने हैहय वंश के विनाश का संकल्प लिया। इस हेतु एक पूरी सामरिक रणनीति को अंजाम दिया। दो वर्ष तक लगातार परशुराम ने ऐसे सूर्यवंशी और यादववंशी राज्यों की यात्राएं की जो हैहय चद्रवंशीयों के विरोधी थे। वाकचातुर्थ और नेतृत्व दक्षता के बूते परशुराम को ज्यादातर चंद्रवंशीयों ने समर्थन दिया। अपनी सेनाएं और हथियार परशुराम की अगुवाई में छोड़ दिए। तब कहीं जाकर महायुद्ध की पृष्ठभूमि तैयार हुई।*

 
        *इसमें भगवान परशुराम को अवन्तिका के यादव, विदर्भ के शर्यात यादव, पंचनद के द्रुह यादव, कान्यकुब्ज कन्नौज के गाधिचंद्रवंशी, आर्यवर्त सम्राट सुदास सूर्यवंशी, गांगेय प्रदेश के काशीराज, गांधार नरेश मान्धता, अविस्थान (अफगानिस्तान), मुजावत (हिन्दुकुश), मेरु (पामिर), श्री (सीरिया) परशुपुर (पारस, वर्तमान फारस) सुसर्तु (पंजक्षीर वर्तमान पाकिस्तान के बलूचिस्तान का हिस्सा) उत्तर कुरु (चीनी सुतुर्किस्तान) वल्क, आर्याण (ईरान) देवलोक (सप्तसिंधु) और अंग-बंग बिहार के संथाल परगना से बंगाल तथा असम तकद्ध के राजाओं ने परशुराम का नेतृत्व स्वीकारते हुए इस महायुद्ध में भागीदारी की। जबकि शेष रह गई क्षत्रिय जातियां चेदि (चंदेरी) नरेश, कौशिक यादव, रेवत तुर्वसु, अनूप, रोचमान कार्तवीर्य अर्जुन की ओर से लड़ीं। इस भीषण युद्ध में अंततः कार्तवीर्य अर्जुन और उसके कुल के लोग तो मारे ही गए। युद्ध में अर्जुन का साथ देने वाली जातियों के वंशजों का भी लगभग समूल नाश हुआ। भरतखण्ड में यह इतना बड़ा महायुद्ध था कि परशुराम ने अंहकारी व उन्मत्त क्षत्रिय राजाओं को, युद्ध में मार गिराते हुए अंत में लोहित क्षेत्र, अरुणाचल में पहुंचकर ब्रहम्पुत्र नदी में अपना फरसा धोया था। बाद में यहां पांच कुण्ड बनवाए गए जिन्हें समंतपंचका रुधिर कुण्ड कहा गया है। ये कुण्ड आज भी अस्तित्व में हैं। इन्हीं कुण्डों में भृगृकुलभूषण परशुराम ने युद्ध में हताहत हुए भृगु व सूर्यवंशीयों का तर्पण किया। इस विश्वयुद्ध का समय 7200 विक्रमसंवत पूर्व माना जाता है। जिसे उन्नीसवां युग कहा गया है।* 

        *इस युद्ध के बाद भगवान परशुराम ने समाज सुधार व कृषि के प्रकल्प हाथ में लिए। केरल,कोंकण मलाबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी। इस समय कश्यप ऋषि और इन्द्र समुद्री पानी को बाहर निकालने की तकनीक में निपुण थे। अगस्त्य को समुद्र का पानी पी जाने वाले ऋषि और इन्द्र का जल-देवता इसीलिए माना जाता है। परशुराम ने इसी क्षेत्र में परशु का उपयोग रचनात्मक काम के लिए किया। शूद्र माने जाने वाले लोगों को उन्होंने वन काटने में लगाया और उपजाऊ भूमि तैयार करके धान की पैदावार शुरु कराईं। इन्हें जनेऊ धारण कराए। और अक्षय तृतीया के दिन एक साथ हजारों युवक-युवतियों को परिणय सूत्र में बांधा। परशुराम द्वारा अक्षयतृतीया के दिन सामूहिक विवाह किए जाने के कारण ही इस दिन को परिणय बंधन का बिना किसी मुहूर्त्त के शुभ मुहूर्त्त माना जाता है।* 
*दक्षिण का यही वह क्षेत्र हैं जहां परशुराम के सबसे ज्यादा मंदिर मिलते हैं और उनके अनुयायी उन्हें भगवान के रुप में पूजते हैं। दक्षिण में भगवान परशुराम के बने प्रथम मंदिर को "तिरुक्ककर-अप्पण" कहा जाता है। इसी दिन ओणम भी मनाया जाता है।* 
*भगवान परशुराम चिरंजीव माने जाते हैं वे अष्ट चिरंजीवी में से एक चिरंजीवी है अर्थात जिनकी कभी मृत्यु नहीं होती। इसलिए सभी युगों में भगवान परशुराम का उल्लेख मिलता है। गणेश के एकदंत होने की घटना में परशुराम जी का ही योगदान है कहते हैं इनके परशु से ही गणेश जी का एक दांत टूट गया था। भगवान राम को शिव धनुष परशुराम जी ने ही दिया था। भगवान कृष्ण को सुदर्शन दीक्षा परशुराम जी से ही प्राप्त हुई थी।* 
*इसलिए भगवान परशुराम को केवल क्षत्रिय निहंता ब्राह्मणों का आराध्य पुरुष ऐसे विशेषण लगा करके उनके इतने महान कार्य को बौना करने का ही प्रयास है।* 

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Monday, May 6, 2024

भूली बिसरी यादें* श्रीपादावधूत अवधूत की कलम से

*बांगरू-बाण*
*भूली बिसरी यादें*
श्रीपादावधूत अवधूत की कलम से 

     *संघ के चौथे सरसंघचालक परम पूज्य श्री रज्जु भैया ने कहा था कि, १० नये व्यक्ति भले न जुड़े पर एक भी पुराना कार्यकर्ता टूटना नही चाहिए इसका सदैव ध्यान रखें।* 
   *इसलिए पद प्रतिष्ठा और पैसे के इस दौर में पैदल चलकर संगठन खड़ा करने वाले लोगों को कभी ना भूले कोई भी संगठन मशीनी नहीं होता वह मानवीय होता है।*
    
*समय-समय पर सबकी भूमिकाए बदल सकती है। पर आज आप जहां हो उस संगठन को वहां तक लाने के लिए पुराने कार्यकर्ताओं ने बहुत कुछ दांव पर लगाया है।* *इसलिए वर्तमान चकाचौंध में और हर बात में विकल्प की तलाश में अपने पुराने कार्यकर्ताओं को भूलना उनके समर्पण को नजरअंदाज करना मूर्खता ही नहीं पाप भी होता है।*
       *आज तो बहुत अनुकूलता हैं, साधन हैं, गाड़ियां हैं पर जिन लोगों ने पैदल चलकर चने, सेव व परमल खाकर साइकिल, पैदल चलकर संगठन खड़ा करने का काम किया हैं उन लोगों को नजरअंदाज करना या भूलना उसके समर्पण के साथ न्याय नहीं है।*
       
*संगठन मशीनों वाहनों और दिमाग से नहीं होता, संगठन शुद्ध सात्विक प्रेम से होता है शुद्ध सात्विक प्रेम ही कार्यकर्ताओं को दांव पर लगाने की हिम्मत देता है।* 
    
*इसलिए चिर पुरातन नित्य नूतन की हमारी अवधारणा के साथ हमें कार्यकर्ताओं में भी यही भाव जागृत रखना चाहिए।*

*परम पूज्य श्री रज्जु भैया के जन्म जयन्ती वर्ष पर यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।* 
*नोट:-* *इस तरह की बातें केवल श्रद्धांजलि वाले दिन ही याद आती है। दूसरों को उपदेश देने हेतु बौद्धिकों में प्रयोग में लाई जाती है।* 
अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त


Friday, February 23, 2024

*74½ की कसम*

*बांगरू-बाण*

श्रीपादावधूत की कलम से 

*74½ की कसम*

*जो लोग राजस्थान से हैं वे लोग इस 74½ की कसम को बहुत अच्छे से जानते हैं। लगभग 30/40 वर्ष पहले तक  राजस्थान में गोपनीय पत्र व्यवहारों के लिए पत्र के ऊपर या पत्र के अंदर 74½ की कसम लिखने की परंपरा थी।* 
 *यह 74½ एक कसम है गोपनीयता की विश्वसनीयता की भरोसे की जो सरकारी  सील से भी ज्यादा महत्व पूर्ण थी। जो यह कहती ही कसम तुम्हे उन साढ़े चौहत्तर  मन जनेऊ की जिन्होंने अपने स्वाभिमान अपने देश/धर्म/कुल की परंपरा को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दीथी। इसलिए जो तुमने इस पत्र की गोपनीयता को तोड़ा तो।*

*इतिहास में वह दिन था 23 फरवरी 1568 का।* 
*जी हाँ 23 फरवरी ठीक आज से 456 वर्ष पूर्व, यह घटना घटित हुई थी।* *अंग्रेजों के पोषित इतिहासकार एवं कम्युनिस्ट विचारों से ओतप्रोत इस्लामिक विचारधारा को श्रेष्ठ मानने वाले लिब्रांडू शर्मनिरपेक्ष  इतिहासकारों ने इस घटना का उल्लेख ही नहीं किया है न हमे किसी पाठ्यक्रम में यह पढ़ाया गया।* 
*भारत के इतिहास में कुल 12 जौहर और साकाओं का विवरण मिलता है। उसमें 3 चित्तौड़ में हुए थे।* 
*1. रानी पद्मनी का* 
*2. राजा उदय सिंह की माता रानी कर्णावती का जब उसने उदय सिंह को पन्ना धाय को सौंप कर किया था।* 
*3.यह सबसे खूंखार और विभत्स था। इस दिन 23 फरवरी 1568 को तथाकथित "अकबर महान" के सौजन्य से* । 
*हमारे देश का इतिहास इस देश के रंगीले चाचा जिन्हें लोग जवाहरलाल नेहरू के नाम से जानते हैं के द्वारा लिखित एक पुस्तक जिसे नाम दिया गया "भारत एक खोज" मैं लिखा इतिहास सच्चा एवं सही माना जाता है। और आगे जाकर उन्हीं की वर्णसंकर संताने जो अपने आप को कम्युनिस्ट,  मिशनरी एवं इस्लाम प्रणीत शर्मनिरपेक्ष इतिहासकार कहती हैं। जिनमें हबीब तनवीर, रोमिला थापर जैसे इतिहासकारों ने भी वही इतिहास हमारे सामने रखा जिसमें भारतीयों की  हिंदुओं की गुलामी की, पराजय की, और अपमान की कहानियां ही समाज के सामने लाई। इन्होंने मुगल कितने श्रेष्ठ थे आज भारत के विकास में सबसे बड़ा योगदान मुगलों का ही है। इसलिए भारत के इतिहास में मुगलों को कई तमगों से नवाजा गया।* *लेकिन दुर्भाग्य से हिंदुओं के शौर्य का, पराक्रम का, स्वाभिमान का जो इतिहास था वह किसी ने भी समाज के सामने लाने का प्रयत्न जानबूझकर नहीं किया। आज देश स्वतंत्रता के अमृत काल में पहुंच गया है इसीलिए यह इतिहास अब लोगों के सामने धीरे-धीरे आने लगा है उसी कड़ी में यह एक प्रयास है।*
 *इस्लामिक मुस्लिम इतिहासकार अबुल फजल चितौड़ विजय के बारे में जो लिखते हैं वह आंखें खोलने वाला है।* 
*"अकबर के आदेशानुसार प्रथम 8000  राजपूत योद्धाओं को बंदी बना लिया गया और बाद में उनका वध कर दिया गया। उनके साथ-साथ विजय के बाद प्रात:काल से दोपहर तक अन्य 40000 हजार किसानों का भी वध कर दिया गया। जिनमें 3000 बच्चे और बूढ़े थे।"*
(अकबरनामा, अबुल फजल, अनुवाद एच. बैबरिज)
*जिस समय युद्ध का बिगुल बजा तब 25 अक्टूबर 1567 में उदय सिंह उदयपुर की सुरक्षा के लिए पीछे हट गए और किले के अंदर रहने वाले 60,000 नागरिकों के साथ चित्तौड़ की रक्षा के लिए 8,000 योद्धाओं को छोड़ दिया। इनमे राजपूतों के दो प्रमुख योद्धा जयमल राठौर और पत्ता/फत्ता चुंडावत थे।* 
*जयमल और पत्ता/फत्ता का पूरा नाम जयमल मेड़तिया राठौड़ और फतेहसिंह सिसौदिया था। जयमल मेड़तिया राठौड़ , मीरा बाई के सौतेले भाई भी थे। जर्मन इतिहासकार द्वारा अकबर पर लिखी पुस्तक में जयमल को “Lion of Chittod” कहा गया है।* 
*किले के अंदर अन्य लोग सैदास रावत, बल्लू सोलंकी, ठाकुर सांडा और ईसरदास चौहान थे। राजपूतों ने इतने दिनों मुग़लों को रोक रखा पर जब राशन की समाप्ति हो गयी तब इन्होंने चितौड़ के किले का द्वार खोल दिया।* *चित्तौड़ की पराजय होगी यह सोच  महारानी जयमाल  समेत 12000 क्षत्राणियों ने मुगलों के हरम में जाने की अपेक्षा जौहर की अग्नि में स्वयं को जलाकर भस्म कर लिया। जरा कल्पना कीजिए विशाल गड्ढों में धधकती आग और दिल दहला देने वाली चीखों-पुकार के बीच उसमें कूदती 12000 वीर क्षत्राणियां ।*
 *8000 युवक राजपूतों ने माथे पर इस जोहर की राख लगा शाका किया।* *शाका कहते हैं कि वे युद्ध मे मरने के लिए निकल पड़े, एक एक योद्धा ने सैकड़ों का वध किया पर मुग़ल की सवा लाख की सेना के सामने कैसे टिकते।*
*उस एक दिन में मुग़लों ने 8000 राजपूतों के वीरगति प्राप्त होने  के बाद 60000 किसानों, वृद्ध और बच्चों का कत्लेआम किया ।   बच्चों को भाले की नोंक पर उछाल उछाल कर मारा गया वृद्धों को तड़फा-तड़फा कर।* 
*ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड लिखते हैं -* 
*"अकबर ने अपनी सफलता को मारे गए हिंदुओं के शरीर से ली गई जनेउ की मात्रा से मापा जो कि साढ़े चौहत्तर मन हुई। एक मन 40 किलोग्राम का होता है। तो उस काले दिन में मारे गए हिंदुओं पर जनेऊ के धागों का वजन 2,980 किलोग्राम था।* 
*अंदाजन एक जनेऊ एक छंटाक की होती  है तो इस आधार पर जोड़ा जाए तो कुल 47680 हिंदू वीर बलिदान  हुए। ऐसा कत्लेआम भारत के इतिहास में कभी न हुआ। यह सुन कर पढ़ कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।* 
*इतना भयंकर विभत्स अत्याचार इतनी भयंकर नृशंस हत्याएं करने वाला जलालुद्दीन अकबर जिसे चचा नेहरू  "अकबर द ग्रेट" कहते हैं कितनी विडंबना है यह।*
 *हमारे कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने भी अकबर को एक परोपकारी उदार, दयालु और धर्मनिरपेक्ष शासक बताया है।*
*अकबर के जीवन पर शोध करने वाले इतिहासकार विंसेट स्मिथ ने साफ़ लिखा है कि अकबर एक दुष्कर्मी, घृणित एवं नृशंस-हत्याकांड करने वाला क्रूर शासक था।*
*चित्तौड़ की विजय के बाद अकबर ने कुछ फतहनामें प्रसारित करवाये थे।* 
*जिससे हिन्दुओं के प्रति उसकी गहन आन्तरिक घृणा प्रकाशित होती हैं।*
*एक उदाहरण देखिए यह लिखने वाला भी अकबर के काल का एक मुसलमान इतिहासकार था और यह लिखित दस्तावेज आज भी नईदिल्ली के म्यूजियम में सुरक्षित है।*
*"अल्लाह की ख्याति बढ़े, इसके लिए हमारे कर्तव्य परायण मुजाहिदीनों ने अपवित्र काफिरों को अपनी बिजली की तरह चमकीली कड़कड़ाती तलवारों द्वारा वध कर दिया। हमने अपना बहुमूल्य समय और अपनी शक्ति घिज़ा (जिहाद एक अरबी शब्द अर्थात् धर्म युद्ध अर्थ गैर मुस्लिमों का छल कपट से कटाई और गैर मुस्लिम स्त्रियों को वेश्या बनाना) में ही लगा दिया है और अल्लाह के सहयोग से काफिरों के अधीन बस्तियों, किलों, शहरों को विजय कर अपने अधीन कर लिया है। कृपालु अल्लाह उन्हें त्याग दे और उन सभी का विनाश कर दे। हमने पूजा स्थलों उसकी मूर्तियों को और काफिरों के अन्य स्थानों का विध्वंस कर दिया है।"*
(फतहनामा-ए-चित्तौड़ मार्च 1586,नई दिल्ली) 

*स्वतंत्रता के अमृत काल में हमारा यह नैतिक कर्तव्य है कि जो हमारा गौरव का इतिहास है स्वाभिमान का इतिहास है, पुरुषार्थ का और पराक्रम का इतिहास है वह समाज के सामने लाएं और उस इतिहास से वर्तमान समय में सीख ले।* 

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Sunday, February 4, 2024

चीन की सभ्यता 5000 साल पुरानी मानी जाती है, लगभग महाभारत काल का समय, तो चीन का उल्लेख महाभारत में क्यों नहीं है?

चीन की सभ्यता 5000 साल पुरानी मानी जाती है, लगभग महाभारत काल का समय, तो चीन का उल्लेख महाभारत में क्यों नहीं है?
युद्ध तिथि : महाभारत का युद्ध और महाभारत ग्रंथ की रचना का काल अलग अलग रहा है। इससे भ्रम की स्थिति उत्पन्न होने की जरूरत नहीं। यह सभी और से स्थापित सत्य है कि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म रोहिणी नक्षत्र तथा अष्टमी तिथि के संयोग से जयंती नामक योग में लगभग 3112 ईसा पूर्व को हुआ हुआ। भारतीय खगोल वैज्ञानिक आर्यभट्ट के अनुसार महाभारत युद्ध 3137 ईसा पूर्व में हुआ और कलियुग का आरम्भ कृष्ण के निधन के 35 वर्ष पश्चात हुआ। महाभारत काल वह काल है जब सिंधुघाटी की सभ्यता अपने चरम पर थी।

विद्वानों का मानना है कि महाभारत में वर्णित सूर्य और चंद्रग्रहण के अध्ययन से पता चलता है कि युद्ध 31वीं सदी ईसा पूर्व हुआ था लेकिन ग्रंथ का रचना काल भिन्न भिन्न काल में गढ़ा गया। प्रारंभ में इसमें 60 हजार श्लोक थे जो बाद में अन्य स्रोतों के आधार पर बढ़ गए।
अब जानिए महाभारत काल में भारतीयों का विदेशियों से संपर्क।

महाभारत काल में अखंड भारत के मुख्यत: 16 महाजनपदों (कुरु, पंचाल, शूरसेन, वत्स, कोशल, मल्ल, काशी, अंग, मगध, वृज्जि, चे‍दि, मत्स्य, अश्मक, अवंति, गांधार और कंबोज) के अंतर्गत 200 से अधिक जनपद थे।

महाभारत काल में म्लेच्छ और यवन को विदेशी माना जाता था। भारत में भी इनके कुछ क्षेत्र हो चले थे। हालांकि इन विदेशियों में भारत से बाहर जाकर बसे लोग ही अधिक थे। देखा जाए तो भारतीयों ने ही अरब और योरप के अधिकतर क्षेत्रों पर शासन करके अपने कुल, संस्कृति और धर्म को बढ़ाया था। उस काल में भारत दुनिया का सबसे आधुनिक देश था और सभी लोग यहां आकर बसने और व्यापार आदि करने के प्रति उत्सुक रहते थे। भारतीय लोगों ने भी दुनिया के कई हिस्सों में पहुंचकर वहां शासन की एक नए देश को गढ़ा है, इंडोनेशिया, सिंगापुर, मलेशिया, कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड इसके बचे हुए उदाहरण है। भारत के ऐसे कई उपनिवेश थे जहां पर भारतीय धर्म और संस्कृति का प्रचलन था।

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ऋषि गर्ग को यवनाचार्य कहते थे। यह भी कहा जाता है कि अर्जुन की आदिवासी पत्नी उलूपी स्वयं अमेरिका की थी। धृतराष्ट्र की पत्नी गांधारी कंदहार और पांडु की पत्नी माद्री ईरान के राजा सेल्यूकस (शल्य) की बहिन थी। ऐसे उल्लेख मिलता है कि एक बार मुनि वेद व्यास और उनके पुत्र शुकदेव आदि जो अमेरिका मेँ थे। शुक ने पिता से कोई प्रश्न पूछा। व्यास जी इस बारे मेँ चूंकि पहले बता चुके थे, अत उन्होंने उत्तर न देते हुए शुक को आदेश दिया कि शुक तुम मिथिला (नेपाल) जाओ और यही प्रश्न राजा जनक से पूछना।

तब शुक अमेरिका से नेपाल जाना पड़ा था। कहते हैं कि वे उस काल के हवाई जहाज से जिस मार्ग से निकले उसका विवरण एक सुन्दर श्लोक में है:- "मेरोहर्रेश्च द्वे वर्षे हेमवँते तत:। क्रमेणेव समागम्य भारतं वर्ष मासदत्।। सदृष्टवा विविधान देशान चीन हूण निषेवितान।

अर्थात शुकदेव अमेरिका से यूरोप (हरिवर्ष, हूण, होकर चीन और फिर मिथिला पहुंचे। पुराणों हरि बंदर को कहा है। वर्ष माने देश। बंदर लाल मुंह वाले होते हैं। यूरोपवासी के मुंह लाल होते हैं। अत:हरिवर्ष को यूरोप कहा है। हूणदेश हंगरी है यह शुकदेव के हवाई जहाज का मार्ग था।...अमेरिकन महाद्वीप के बोलीविया (वर्तमान में पेरू और चिली) में हिन्दुओं ने प्राचीनकाल में अपनी बस्तियां बनाईं और कृषि का भी विकास किया। यहां के प्राचीन मंदिरों के द्वार पर विरोचन, सूर्य द्वार, चन्द्र द्वार, नाग आदि सब कुछ हिन्दू धर्म समान हैं। जम्बू द्वीप के वर्ण में अमेरिका का उल्लेख भी मिलता है। पारसी, यजीदी, पैगन, सबाईन, मुशरिक, कुरैश आदि प्रचीन जाति को हिन्दू धर्म की प्राचीन शाखा माना जाता है।

ऋग्वेद में सात पहियों वाले हवाई जहाज का भी वर्णन है।- "सोमा पूषण रजसो विमानं सप्तचक्रम् रथम् विश्वार्भन्वम्।''... इसके अलावा ऋग्वेद संहिता में पनडुब्बी का उल्लेख भी मिलता है, "यास्ते पूषन्नावो अन्त:समुद्रे हिरण्मयी रन्तिरिक्षे चरन्ति। ताभिर्यासि दूतां सूर्यस्यकामेन कृतश्रव इच्छभान:"।
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श्रीकृष्ण और अर्जुन अग्नि यान (अश्वतरी) से समुद्र द्वारा उद्धालक ऋषि को आर्यावर्त लाने के लिए पाताल गए। भीम, नकुल और सहदेव भी विदेश गए थे। अवसर था युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ का। यह महान ऋषियोँ और राजाओँ को निमंत्रण देने गए। यह लोग चारों दिशाओं में गए। कृष्ण-अर्जुन का अग्नियान अति आधुनिक मोटर वोट थी। कहते हैं कि कृष्ण और बलराम एक बोट के सहारे ही नदी मार्ग से बहुत कम समय में मथुरा से द्वारिका में पहुंच जाते थे।

महाभारत में अर्जुन के उत्तर-कुरु तक जाने का उल्लेख है। कुरु वंश के लोगों की एक शाखा उत्तरी ध्रुव के एक क्षेत्र में रहती थी। उन्हें उत्तर कुरु इसलिए कहते हैं, क्योंकि वे हिमालय के उत्तर में रहते थे। महाभारत में उत्तर-कुरु की भौगोलिक स्थिति का जो उल्लेख मिलता है वह रूस और उत्तरी ध्रुव से मिलता-जुलता है। हिमालय के उत्तर में रशिया, तिब्बत, मंगोल, चीन, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान आदि आते हैं। अर्जुन के बाद बाद सम्राट ललितादित्य मुक्तापिद और उनके पोते जयदीप के उत्तर कुरु को जीतने का उल्लेख मिलता है।

अर्जुन के अपने उत्तर के अभियान में राजा भगदत्त से हुए युद्ध के संदर्भ में कहा गया है कि चीनियों ने राजा भगदत्त की सहायता की थी। युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ सम्पन्न के दौरान चीनी लोग भी उन्हें भेंट देने आए थे।

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महाभारत में यवनों का अनेका बार उल्लेख हुआ है। संकेत मिलता है कि यवन भारत की पश्चिमी सीमा के अलाव मथुरा के आसपास रहते थे। यवनों ने पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में भयंकर आक्रमण किया था। कौरव पांडवों के युद्ध के समय यवनों का उल्लेख कृपाचार्य के सहायकों के रूप में किया गया है। महाभारत काल में यवन, म्लेच्छ और अन्य अनेकानेक अवर वर्ण भी क्षत्रियों के समकक्ष आदर पाते थे। महाभारत काल में विदेशी भाषा के प्रयोग के संकेत भी विद्यमान हैं। कहते हैं कि विदुर लाक्षागृह में होने वाली घटना का संकेत विदेशी भाषा में देते हैं।

जरासंध का मित्र कालयवन खुद यवन देश का था। कालयवन ऋषि शेशिरायण और अप्सारा रम्भा का पुत्र था। गर्ग गोत्र के ऋषि शेशिरायण त्रिगत राज्य के कुलगुरु थे। काल जंग नामक एक क्रूर राजा मलीच देश पर राज करता था। उसे कोई संतान न थी जिसके कारण वह परेशान रहता था। उसका मंत्री उसे आनंदगिरि पर्वत के बाबा के पास ले गया। बाबा ने उसे बताया की वह ऋषि शेशिरायण से उनका पुत्र मांग ले। ऋषि शेशिरायण ने बाबा के अनुग्रह पर पुत्र को काल जंग को दे दिया। इस प्रकार कालयवन यवन देश का राजा बना।

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महाभारत में उल्लेख मिलता है कि नकुल में पश्चिम दिशा में जाकर हूणों को परास्त किया था। युद्धिष्ठिर द्वारा राजसूय यज्ञ सम्पन्न करने के बाद हूण उन्हें भेंट देने आए थे। उल्लेखनीय है कि हूणों ने सर्वप्रथम स्कन्दगुप्त के शासन काल (455 से 467 ईस्वी) में भारत के भितरी भाग पर आक्रमण करके शासन किया था। हूण भारत की पश्‍चिमी सीमा पर स्थित थे। इसी प्रकार महाभारत में सहदेव द्वारा दक्षिण भारत में सैन्य अभियान किए जाने के संदर्भ में उल्लेख मिलता है कि सहदेव के दूतों ने वहां स्थित यवनों के नगर को वश में कर लिया था।

प्राचीनकाल में भारत और रोम के मध्य घनिष्ठ व्यापारिक संबंध था। आरिकामेडु ने सन् 1945 में व्हीलर द्वारा कराए गए उत्खनन के फलस्वरूप रोमन बस्ती का अस्तित्व प्रकाश में आया है। महाभारत में दक्षिण भारत की यवन बस्ती से तात्पर्य आरिकामेडु से प्राप्त रोमन बस्ती ही रही होगी। हालांकि महाभारत में एक अन्य स्थान पर रोमनों का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस उल्लेख के अनुसार रोमनों द्वारा युद्धिष्ठिर के राजसूय यज्ञ के समापन में दौरान भेंट देने की बात कही गई है।

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महाभारत में शकों का उल्लेख भी मिलता है। शक और शाक्य में फर्क है। शाक्य जाति तो नेपाल और भारत में प्रचीनकाल से निवास करने वाली एक जाति है। नकुल में पश्‍चिम दिशा में जाकर शकों को पराजित किया था। शकों ने भी राजसूय यज्ञ समापन पर युधिष्ठिर को भेंट दिया था। महाभारत के शांतिपर्व में शकों का उल्लेख विदेशी जातियों के साथ किया गया है। नकुल ने ही अपने पश्‍चिमी अभियान में शक के अलावा पहृव को भी पराजित किया था। पहृव मूलत: पार्थिया के निवासी थे।

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प्राचीन भारत में सिंधु नदी का बंदरगाह अरब और भारतीय संस्कृति का मिलन केंद्र था। यहां से जहाज द्वारा बहुत कम समय में इजिप्ट या सऊदी अरब पहुंचा जा सकता था। यदि सड़क मार्ग से जाना हो तो बलूचिस्तान से ईरान, ईरान से इराक, इराक से जॉर्डन और जॉर्डन से इसराइल होते हुई इजिप्ट पहुंचा जा सकता था। हालांकि इजिप्ट पहुंचने के लिए ईरान से सऊदी अरब और फिर इजिप्ट जाया जा सकता है, लेकिन इसमें समुद्र के दो छोटे-छोटे हिस्सों को पार करना होता है।

यहां का शहर इजिप्ट प्राचीन सभ्यताओं और अफ्रीका, अरब, रोमन आदि लोगों का मिलन स्थल है। यह प्राचीन विश्‍व का प्रमुख व्यापारिक और धार्मिक केंद्र था। मिस्र के भारत से गहरे संबंध रहे हैं। मान्यता है कि यादवों के गजपत, भूपद, अधिपद नाम के 3 भाई मिस्र में ही रहते थे। गजपद के अपने भाइयों से झगड़े के चलते उसने मिस्र छोड़कर अफगानिस्तान के पास एक गजपद नगर बसाया था। गजपद बहुत शक्तिशाली था।

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ऋग्वेद के अनुसार वरुण देव सागर के सभी मार्गों के ज्ञाता हैं। ऋग्वेद में नौका द्वारा समुद्र पार करने के कई उल्लेख मिलते हैं। एक सौ नाविकों द्वारा बड़े जहाज को खेने का उल्लेख भी मिलता है। ऋग्वेद में सागर मार्ग से व्यापार के साथ-साथ भारत के दोनों महासागरों (पूर्वी तथा पश्चिमी) का उल्लेख है जिन्हें आज बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर कहा जाता है। अथर्ववेद में ऐसी नौकाओं का उल्लेख है जो सुरक्षित, विस्तारित तथा आरामदायक भी थीं।

ऋग्वेद में सरस्वती नदी को ‘हिरण्यवर्तनी’ (सु्वर्ण मार्ग) तथा सिन्धु नदी को ‘हिरण्यमयी’ (स्वर्णमयी) कहा गया है। सरस्वती क्षेत्र से सुवर्ण धातु निकाला जाता था और उस का निर्यात होता था। इसके अतिरिक्त अन्य वस्तुओं का निर्यात भी होता था। भारत के लोग समुद्र के मार्ग से मिस्र के साथ इराक के माध्यम से व्यापार करते थे। तीसरी शताब्दी में भारतीय मलय देशों (मलाया) तथा हिन्द चीनी देशों को घोड़ों का निर्यात भी समुद्री मार्ग से करते थे।

भारतवासी जहाजों पर चढ़कर जलयुद्ध करते थे, यह ज्ञात वैदिक साहित्य में तुग्र ऋषि के उपाख्यान से, रामायण में कैवर्तों की कथा से तथा लोकसाहित्य में रघु की दिग्विजय से स्पष्ट हो जाती है।भारत में सिंधु, गंगा, सरस्वती और ब्रह्मपुत्र ऐसी नदियां हैं जिस पर पौराणिक काल में नौका, जहाज आदि के चलने का उल्लेख मिलता है।

कुछ विद्वानों का मत है कि भारत और शत्तेल अरब की खाड़ी तथा फरात (Euphrates) नदी पर बसे प्राचीन खल्द (Chaldea) देश के बीच ईसा से 3,000 वर्ष पूर्व जहाजों से आवागमन होता था। भारत के प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में जहाज और समुद्रयात्रा के अनेक उल्लेख है (ऋक् 1. 25. 7, 1. 48. 3, 1. 56. 2, 7. 88. 3-4 इत्यादि)। याज्ञवल्क्य सहिता, मार्कंडेय तथा अन्य पुराणों में भी अनेक स्थलों पर जहाजों तथा समुद्रयात्रा संबंधित कथाएं और वार्ताएं हैं। मनुसंहिता में जहाज के यात्रियों से संबंधित नियमों का वर्णन है। ईसा से 3,000 वर्ष पूर्व का समय महाभारत का काल था।

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अमेरिका का उल्लेख पुराणों में पाताललोक, नागलोक आदि कहकर बताया गया है। इस अंबरिष भी कहते थे। जैसे मेक्सिको को मक्षिका कहा जाता था। कहते हैं कि मेक्सिको के लोग भारतीय वंश के हैं। वे भारतीयों जैसी रोटी थापते हैं, पान, चूना, तमाखू आदि चबाते हैं। नववधू को ससुराल भेजने समय उनकी प्रथाएं, दंतकथाएं, उपदेश आदि भारतीयों जैसे ही होते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के एक ओर मेक्सिको है तो दूसरी ओर कनाडा। अब इस कनाडा नाम के बारे में कहा जाता है कि यह भारतीय ऋषि कणाद के नाम पर रखा गया था। यह बात डेरोथी चपलीन नाम के एक लेखक ने अपने ग्रंथ में उद्धत की थी। कनाडा के उत्तर में अलास्का नाम का एक क्षेत्र है। पुराणों अनुसार कुबेर की नगरी अलकापुरी हिमालय के उत्तर में थी। यह अलास्का अलका से ही प्रेरित जान पड़ता है।

अमेरिका में शिव, गणेश, नरसिंह आदि देवताओं की मूर्तियां तथा शिलालेख आदि का पाया जाने इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि प्रचीनकाल में अमेरिका में भारतीय लोगों का निवास था। इसके बारे में विस्तार से वर्णन आपको भिक्षु चमनलाल द्वारा लिखित पुस्तक 'हिन्दू अमेरिका' में चित्रों सहित मिलेगा। दक्षिण अमेरिका में उरुग्वे करने एक क्षेत्र विशेष है जो विष्णु के एक नाम उरुगाव से प्रेरित है और इसी तरह ग्वाटेमाल को गौतमालय का अपभ्रंष माना जाता है। ब्यूनस आयरिश वास्तव में भुवनेश्वर से प्रेरित है। अर्जेंटीना को अर्जुनस्थान का अपभ्रंष माना जाता है।

पांडवों का स्थापति मय दानव था। विश्‍वकर्मा के साथ मिलकर इसने द्वारिका के निर्माण में सहयोग दिया था। इसी ने इंद्रप्रस्थ का निर्माण किया था। कहते हैं कि अमेरिका के प्रचीन खंडहर उसी के द्वारा निर्मित हैं। यही माया सभ्यता का जनक माना जाता है। इस सभ्यता का प्राचीन ग्रंथ है
 पोपोल वूह (popol vuh)। पोपोल वूह में सृष्टि उत्पत्ति के पूर्व की जो स्थिति वर्णित है कुछ कुछ ऐसी ही वेदों भी उल्लेखित है। उसी पोपोल वूह ग्रन्थ में अरण्यवासी यानि असुरों से देवों के संघर्ष का वर्णन उसी प्रकार से मिलता है जैसे कि वेदों में मिलता है।
Mahesh Sinhaji की वॉल से

हम जिसे अपना आराध्य या गुरु मानते आए हैं। उस गुरु के संदर्भ में कुछ अनुचित बातें सामने आती है तो मन को बड़ा दुख होता है ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिए..??*

*बांगरू-बाण*

*जिज्ञासा-समाधान।*

*मेरे एक सहपाठी मित्र है मकरंद जी उन्होंने एक प्रश्न पूछा है कि "हम जिसे अपना आराध्य या गुरु मानते आए हैं। उस गुरु के संदर्भ में कुछ अनुचित बातें सामने आती है तो मन को बड़ा दुख होता है ऐसी परिस्थिति में क्या करना चाहिए..??* 

श्रीपादावधूत की कलम से 

*मकरंद भाई परेशान होने की कोई बात ही नहीं है।*

*इसके दो पक्ष हैं।*

पहला पक्ष 
*जो है जैसा है इतने वर्षों का विश्वास है तो उस पर किंतु परंतु नहीं करना चाहिए। उस पर पूर्ण विश्वास व श्रद्धा भाव रखना चाहिए।* 
*वैसे भी हमारे आराध्य या उपास्य लौकिक मनुष्य होना ही नहीं चाहिए हमारे आराध्य या उपास्य वैदिक देव धर्म परंपरा से चली आ रही सनातन संस्कृति के लक्ष्मी-नारायण, गिरिजा-शंकर, सीता-राम, राधा-कृष्ण, दत्त, हनुमान, गणपति, दुर्गा आदि होने चाहिए।* 
*संत या कोई महापुरुष केवल मार्गदर्शक के रूप में ही स्वीकार होना चाहिए।* 
*कबीर दास जी के अनुसार।*
*जाति न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान* 
*मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान* 
*जब हम स्कूल में पढ़ने के लिए जाते हैं तो विषय को पढ़ाने वाला शिक्षक किस जाति का है..? स्कूल के बाहर उसका आचरण व्यवहार कैसा है.?? उसका चरित्र कैसा है..? यह हमारे चिंतन का एवं अध्ययन का विषय नहीं होना चाहिए।* 
*आपका और मेरा शिक्षण देवास में ही हुआ है इसलिए उदाहरण भी देवास का ही दे रहा हूं। हम केमेस्ट्री पढ़ने के लिए देवास के एक विख्यात एवं सुप्रसिद्ध सर के यहां जाते थे जो शराब पीने के आदी थे। समाज में उनकी पहचान एक शराबी की ही थी।*
*गणित के ही एक सर जिन्होंने अपने यहां पढ़ने आने वाली एक छात्रा से ही लव मैरिज किया था। अर्थात उनका चारित्रिक पक्ष उपरोक्त कोटि के आधार पर स्वीकार्य नहीं किया जा सकता था। फिर भी पूरे देवास में इन दोनों शिक्षकों के प्रति अपार स्नेह श्रद्धा एवं आदर का भाव था। जो यही सिद्ध करता है कि हमें उनसे केवल ज्ञान की आवश्यकता थी और वह हमारी जिज्ञासाओं की पूर्ति अपने विषय के लौकिक ज्ञान से करते थे। उनका व्यावहारिक जीवन उनका चारित्रिक पक्ष कैसा भी रहा हो हमने उस पर कभी ध्यान नहीं दिया।*
*मेरा मानना है कि आध्यात्मिक जीवन में संत की भी वही भूमिका होनी है।* 

*दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष है परंपराएं*
*जब हम परंपरा का अनुशीलन नहीं करते हैं तो इस तरह की विडंबनाओं का सामना करना पड़ता है।*
*हमारे यहां जीवन के प्रत्येक व्यवहार में परंपराओं का अनुशीलन अनिवार्य माना गया है।*
*हम अपने बच्चों को स्कूल में डालते समय उस स्कूल का ट्रैक रिकॉर्ड देखते है। पढ़ाने वाले कौन लोग हैं.?? किस तरह का परिवेश है..?? अच्छे संस्कार देते हैं या नहीं। शैक्षणिक गतिविधियों के अतिरिक्त अन्य कितने प्रकार की गतिविधियां करते हैं इत्यादि..!! दूसरे शब्दों में कहूं तो परंपराएं ही देखते हैं।*
*विवाह जैसी संस्था में भी सजातीय बंधुओं से विवाह के समय उनके कुल को, परिवार को देखने की परंपरा है। उनके संबंध कहां-कहां है..?? उन लोगों का समाज में किस तरह का स्थान व सम्मान है..!! यह सब देखने के बाद ही विवाह संबंध तय होते हैं। और यही बात अध्यात्म व धर्म में भी स्वीकार करनी चाहिए है।* 
*भारत को सनातन वैदिक संस्कृति से जोड़ने का श्रेष्ठ कार्य करने वाले आदि शंकराचार्य की परंपरा का पूरे भारत में प्रभाव है। इसीलिए आज भी लोग शंकराचार्य जी को पूज्य एवं वंदनीय मानते हैं और वर्तमान में उनके जो उत्तराधिकारी हैं उनको भी वही आदर और सम्मान देते है।* 
*महाराष्ट्र में वारकरी संप्रदाय व दत्त संप्रदाय जो परंपरा से चली आ रही उपासना पद्धति को अक्षुण्ण रखने की परंपरा का निर्वहन कर रहा है। हजारों वर्षों से चले आ रहे धर्म के समस्त क्रियाकलाप आज भी उसी तरह से निर्बाध गति से जारी रखें हुए है।* 
*आषाढी एकादशी के निमित्त लाखों लोगों का जन समुदाय जिसे "जन-समुद्र" कहना ज्यादा समीचीन होगा जो बिना किसी निमंत्रण के, बुलावे के, प्रलोभन के यात्रा में सम्मिलित होता हैं।* 
*यही हमारे श्रेष्ठ सनातन हिंदू धर्म की सबसे बड़ी विशेषता है, व्यवस्था है।* 
*हमारे मध्य प्रदेश में भी अभी हजारों लोग "रामदेवरा" जो राजस्थान का प्रसिद्ध तीर्थस्थल है। इसकी यात्रा के लिए पैदल निकल रहे हैं। गांव/गांव से सैकड़ों/हजारों लोगों का जत्था प्रतिवर्ष रामदेवरा के लिए इसी श्रावण महीने में निकलता है।* 
*तो यह वही परंपराएं हैं जो आज भी अक्षुण्ण बनी हुई है और ऐसी ही परंपराओं का अनुशीलन एवं अनुकरण करना ही हमारा परम कर्तव्य होना चाहिए। परंपराए हमें इस तरह की विषमताओं एवं विडंबनाओं से बचाती है।* 
*दुर्भाग्य से कहे या अज्ञानता वश पिछले कुछ वर्षों में हम व्यक्तिवादी या व्यक्ति केंद्रित विचारधारा का अनुसरण करने लगे हैं और उसी का ही यह परिणाम सामने आ रहा है।* 
*हम मनुष्य को ईश्वर के समकक्ष रखकर उनको ही अपना आराध्य एवं उपास्य देवता मानने लगे हैं। अपने गुरु की मूर्ति स्थापित करना उनके मंदिर बनाना उनके नाम के लॉकेट और अन्य धार्मिक वस्तुएं बनाकर पहनना उनके जीवन चरित्र को धार्मिक ग्रंथ के रूप में निर्मित कर उनका वाचन करना यह वह सारी बातें हैं। जो आज समाज का एक वर्ग करने लगा है। इसका दुष्परिणाम यह होगा कि आने वाले कुछ वर्षों के बाद हमारे जो मूल देवता हैं जैसे राम कृष्ण शिव हनुमान उनके मंदिर उनकी उपासना पद्धति धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएगी जो कि एक चिंता का विषय है।* 
*जब मानवोचित स्वभाव दुर्गुण मनोविकार या वासना के कारण इन संतों और गुरुजन के नैतिक आध्यात्मिक पतन की बातें जब उनके भक्त समुदाय के सामने आएंगी। तब आज जो स्थिति रामपाल, राम-रहीम, आसाराम बापू, सांई के भक्तों की है। वैसे ही उन्हें भी विचलित एवं दिग्भ्रमित करेगी।* 
 *राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में गुरु के रूप में भगवाध्वज को ही अपना गुरु या आराध्य माना है। सिख धर्म में भी गुरु ग्रंथ साहिब को ही गुरु के रूप में स्थान दिया है। जो इस तरह से उत्पन्न होने वाली स्थिति से निपटने के लिए कारगर सिद्ध हो रहा है।*
*समाज में प्रत्येक समय हर तरह के विमर्श प्रेषित एवं प्रसारित किए जाते हैं। फिर वह सच है या झूठ है कल्पनाओं पर आधारित है या जानबूझकर फैलाएं जा रहे हैं इस पर ध्यान नहीं दिया जाता है।*
*इन बाबाओं को भी इन्हीं लोगों के माध्यम से प्रश्रय एवं प्रसिद्धि मिली। जो मीडिया में व्याप्ति के कारण कुछ बातें समाज में वायरल हो जाती हैं और कुछ बातें बच जाती हैं।*
*अभी इसी अधिक मास या श्रावण मास के निमित्त उज्जैन में 84 महादेव, सप्त सरोवर की यात्रा करने के लिए भीड़ उमड़ रही है। लेकिन इस अधिक मास में इन यात्राओं के प्रति जो आकर्षण देखने को मिल रहा है उसके पीछे का कारण क्या है यह वही विमर्श है जो पंडित प्रदीप मिश्रा ने अपनी कथाओं के माध्यम से लोगों में प्रसारित कर दिया है।* 
*आज इन यात्राओं को हम अच्छा या श्रेष्ठ इसलिए मान रहे हैं क्योंकि यह हिंदू धर्म के उन्नयन का कार्य कर रही है।* 
*84 महादेव क्या पिछले कुछ वर्षों से ही स्थापित है। ऐसा भी नहीं है वह तो हजारों वर्षों से उज्जैन में स्थापित हैं। ऐसा माना जाता है कि जितना प्राचीन भगवान महाकालेश्वर का मंदिर है उतने ही पुराने यह 84 महादेव मंदिर हैं। इनमें से अधिकांश मंदिरों की रोज ठीक से पूजा पाठ भी नहीं होती थी। लेकिन परिस्थितियां बदली है और आज हजारों लोग रोज इनके दर्शन कर रहे हैं। जोकि सनातन हिंदू संस्कृति के लिए एक अच्छी बात है।* 
*कम्युनिस्ट और मुस्लिम परस्त व ईसाई मिशनरी समर्थक तथाकथित धर्मनिरपेक्ष समाज जिसे आज हम लिब्रांडू या टुकड़े-टुकड़े गैंग कहते हैं इस विचारधारा के लोगों द्वारा जानबूझकर समाज में कुछ गलत बातें भी प्रचारित एवं प्रसारित की जाती है। जिससे हमारी महान परंपराओं संस्कृति धर्म और अध्यात्म को झूठा गलत एवं निरर्थक बताने का कार्य किया जाता है जो एक प्रोपेगेंडा का एक हिस्सा है।* 
*मनोविज्ञान कहता है कि जो बातें हमारी सोच या विचारधारा को सूट करती है। उसे हम स्वीकार कर लेते हैं और जो हमारी विचारधारा को सूट नहीं करती। उसका हम विरोध करते हैं। फिर चाहे वो राजनीति हो या धर्म हो या अध्यात्म।* 
*"इसलिए किसी भी बात को लेकर ना तो विचलित होने की आवश्यकता है ना परेशान होने की आवश्यकता है।* 
*समाज में जो हो रहा है उसे कर्ता भाव से देखने का प्रयत्न या प्रयास करना चाहिए और हमारे यहां परंपरा से चली आ रही बातों को ही हमारे दैनंदिन जीवन में अपनाना चाहिए।*

*नोट:--आपने जो जिज्ञासा या प्रश्न किया था उसका उत्तर मैंने मेरी सोच समझ या मेरे पास उपलब्ध अनुभव और ज्ञान से देने का प्रयत्न किया है। मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने जो बातें लिखी हैं वह सब आपको स्वीकार्य हो या वह सब आपके अनुकूल सत्य हो क्योंकि सत्य सार्वत्रिक है लेकिन वह प्रत्येक व्यक्ति के समझ देश काल परिस्थिति के अनुसार अलग-अलग हो सकता है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Saturday, January 13, 2024

*बांगरू-बाण*

श्रीपादावधूत स्वामी की कलम से 

*जय भारत* 
*जय पानीपत* 

*मकर संक्रांति* 
*आज से लगभग 263 वर्ष पूर्व हरियाणा के पानीपत पर सवा लाख से ज्यादा  सैनिक भूखे थे। पिछले 1 महीने से उन्हें पेट भर खाना नहीं मिल रहा था। साथ ही उत्तर भारत की हड्डियों को कंपकंपान कर गलानेवाली ठंड का सामना करने वाले गर्म कपड़े भी नहीं थे क्योंकि ये सैनिक जिस प्रदेश से आए थे वहां पर इतनी ठंड नहीं पड़ती थी। ऐसी विषम परिस्थिति में भी मकर संक्रांति के दिन एक भयानक और भीषण लड़ाई की शुरुआत हुई और इन सैनिकों ने प्राणप्रण से शत्रु को पराजित करने के लिए युद्ध करना आरंभ कर दिया।* 

*कौन थे यह लोग....??*

*यह मराठे थे...!!!*

*मराठे....!!!* 
*जी हां मराठे....!!!* 
यह वही मराठे थे जिन्होंने *छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य की स्थापना में अपना तन मन और धन अपना सर्वस्व समर्पित किया था। अपनी हिंदू अस्मिता और मां भारती और मां भवानी की अर्चना में प्राण प्रण से योगदान दिया था।* कहने को तो अनेक जाति के मराठे थे इसमें *पाटिल, देशमुख, चितपावन ब्राह्मण, धनगर, देशस्थ कराडे ब्राह्मण, कुनबी, कोली, लोहार, सिकलीगर, भिश्ती, चर्मकार, महार, माली, बंजारी और अनेक जातियां थी। कुछ मुसलमान भी थे इन सब को मराठे कहते थे।* 

*मारेगा अपितु हटेगा नहीं डटकर खड़ा रहेगा जूझेगा और मारेगा वह मराठा।* 

*मराठा यह शब्द उस समय की परिस्थिति में सकल हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करता था इसलिए इस मराठा शब्द को वर्तमान समय के जातिवाचक संज्ञा से मत तुलना कीजिए। उस समय मां भारती की रक्षा के लिए लड़ने वाला प्रत्येक मावला हिंदू ही था। उस मकर संक्रांति के दिन संपूर्ण महाराष्ट्र एकजुट होकर मराठा बन कर लड़ा था।*
 *उनके साथ तेलंगना कर्नाटक और मध्य प्रांत के भी अनेक वीर योद्धा लड़े थे। बुराड़ी के घाट पर दत्ता जी सिंधिया का जो बलिदान हुआ था। यह घटना पुणे के नाना साहब पेशवा के मन में चुभ गई थी। पेशवा के नेतृत्व में लड़ने के लिए होलकर, शिंदे, गायकवाड, भोसले  सभी तैयार थे । इस युद्ध मैं लड़ने वाले सभी सैनिक विभिन्न जातियों के थे लेकिन वह सब हिन्दू ही थे, मराठा सैनिक थे इसमें कहीं कोई संदेह नहीं था।*
*हिंदवी स्वराज्य के लिए लड़ने वाले सभी सैनिकों के लिए यह युद्ध केवल उनके उदर निर्वाह के लिए किया जाने वाला प्रयत्न या प्रयास नहीं था। उनके लिए छत्रपति शिवाजी महाराज दास्यता मुक्त स्वतंत्रता की प्रेरणा को अक्षुण्ण रखने की अस्मिता का भाव था अपने एक साथी के बलिदान का प्रतिशोध लेने की उत्कट भावना थी इसीलिए सभी मराठा बांधव प्राण प्रण से लड़ें थे।* *सभी इस देश की रक्षा के लिए इस देश पर आपन्न विदेशी आक्रमण से लड़ने के लिए ही महाराष्ट्र से सुदूर उत्तर भारत के पानीपत पर आए थे। इस युद्ध को लड़ने का उद्देश्य साम्राज्यवादी विस्तार नहीं था इसमें कहीं कोई विरोधाभास नहीं है।* 

*14 जनवरी 1761  को युद्ध लड़ते हुए जितने भी बलिदान हुए वे सब मराठा थे जो कैदी पकड़ लिए गए उन्हें बंदी बनाकर अफगानिस्तान ले जाया गया वह आज भी मराठा बुगती या मराठा मारी के नाम से जाने जाते हैं ।* *उनकी जातियां आज विलीन हो गई है। जातियां तो क्या उनका धर्म भी विलीन हो गया है लेकिन आज भी मराठा यह पहचान कायम है।*

*पानीपत के इस युद्ध को पानीपत का तीसरा युद्ध कहा जाता है* और इस लड़ाई को इतिहास में यह कह कर के संबोधित किया जाता है कि यह युद्ध मराठे बुरी तरह से हार गए थे। परंतु वस्तु स्थिति ऐसी नहीं है। *मराठा युद्ध हारे जरूर थे लेकिन उनकी हार हार नहीं थी क्योंकि अब्दाली ने कहने को युद्ध जीता था लेकिन उसका इतना नुकसान हो गया था कि वह कभी भारत पर अपना शासन कायम न कर सका।* 
*नाना साहब पेशवा को लिखे गए पत्र में अब्दाली अपने अफगान पुराणों के नायक रुस्तम और इस्पिंदियार (अपने कृष्ण और अर्जुन जैसे) के रूप में मराठी हुतात्मा वीरों को नवाजता है। युद्ध के 3 महीने बाद ही वह मराठों से संधि कर हमेशा के लिए अफगानिस्तान वापस लौट गया। इस युद्ध के पश्चात वायव्य सरहद सीमा क्षेत्र से कोई भी विदेशी आक्रांता हिंदुस्तान की सीमा में प्रवेश नहीं कर पाया और ईसा पूर्व 327 में अलेक्जेंडर द्वारा खोले गए हिंदुस्तान के प्रवेश द्वार खैबर और गोलन दर्रे को पुरुषार्थी मराठों ने अपने लहू से अपने बलिदान से बंद कर दिया। इस युद्ध के पश्चात कोई भी विदेशी आक्रांता भारत की तरफ देखने की भी हिम्मत नहीं उठा सका आक्रमण करना तो दूर की बात रही।* 
*पानीपत के सिर्फ 10 वर्षों के बाद ही महादजी सिंधिया ने नजीब खान की जो कबर थी उसे खोद कर नष्ट भ्रष्ट कर दिया। और दिल्ली पर फिर से मराठों का आधिपत्य हो गया था।  पानीपत के इस युद्ध के 30/35 वर्षों के बाद भी मराठे मराठे बनकर ही लड़े और विजयी भी हुए।* 

*युद्ध तभी होता है जब दो अलग-अलग साम्राज्यों विचारधाराओं में अपने-अपने हितों के लिए टकराव होता है और यही टकराव एक बड़े युद्ध का कारण बनता है। उस समय भारत की परिस्थिति को देखते हुए यही एक विचार मराठों का था जो छत्रपति शिवाजी महाराज के हिंदवी स्वराज्य के दिशानिर्देशों के अनुरूप था। देश व धर्म पर आक्रमण करने वाले सारे आतंकवादी होते हैं और इनका प्रतिकार होना ही चाहिए इसी बात को लेकर मराठे पानीपत का युद्ध लड़ने गए थे।* 

*परंतु दुर्भाग्य से आज हम सब लोग अपनी पहचान को भूल रहे हैं और केवल जाति संप्रदायों में विभक्त होकर रह गए हैं। आज हमारे सामने राष्ट्र बोध राष्ट्रवाद यह पहचान नहीं है । हम केवल और केवल जाति को ही आधार मानकर धर्म को ही आधार मानकर स्वयं को ब्राह्मण मराठा दलित ओबीसी और फलाना ढिकाना के नाम से अपनी अस्मिता को ढूंढने का प्रयत्न कर रहे हैं।*

*इस मकर संक्रांति के अवसर पर जब हम सारे हिंदू बांधव एक दूसरे को तिल और गुड़ देकर शुभकामनाएं देंगे तब सैकड़ों वर्ष पूर्व हड्डियों को कंपकंपाने वाली ठंड में भूखे प्यासे रहकर देश की अखंडता और अस्मिता की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले अपने रक्त से इस भारत भू का अभिसिंचन करने वाले उन लाखों लाख मराठा सैनिकों के बलिदान को याद अवश्य रखिएगा क्योंकि उस दिन बलिदान देने वाला हर सैनिक वहां मराठा के रूप में  ही गया था और मराठा के रूप में ही उसने अपना बलिदान दिया था।*

*नोट:-- पूरे आलेख में मराठा शब्द बार-बार प्रयुक्त हुआ है मराठा शब्द उस समय की परिस्थिति में संपूर्ण हिंदू समाज का प्रतिनिधित्व करता था इसलिए इस मराठा गुणवाचक शब्द को वर्तमान समय के जातिवाचक संज्ञा से तुलना मत कीजिए। उस समय विदेशी आतंकवादियों के विरुद्ध लड़ने वाला प्रत्येक मावळा हिंदू था।*

Saturday, July 8, 2023

बांगरू बाण 
श्रीपादावधूत की कलम से 

*शाब्दिक सुबह*
          *अर्थपूर्ण दिवस*

*यूनेस्को के अनुसार भाषा मात्र संपर्क, शिक्षा या विकास का माध्यम न होकर व्यक्ति की विशिष्ट पहचान और उसकी संस्कृति, परंपरा एवं इतिहास का भंडार है। इसके साथ ही सांस्कृतिक मूल्यों की विरासत को संजोने का कार्य भी मातृभाषा ही करती है। मातृभाषा का महत्व धर्म जाति पंथ संप्रदाय आदि से भी अधिक है। जब कहीं कोई भाषा विलुप्त होती है तो उसके साथ एक संस्कृति और परंपरा भी विलुप्त हो जाती है।*

भारत अपनी भाषाई विविधता के कारण अनेक देशों का एक देश प्रतीत होता हैं। लगभग एक सहस्त्र वर्ष की अवधि के बाद पराधीनता के कारण भारत में समय-समय पर विविध भाषाओं का प्रसार होता रहा। 
*वस्तुतः " यदि किसी जाति, धर्म अथवा देश को पराधीन रखना है तो उसके साहित्य को नष्ट कर देना चाहिए, वह स्वयं नष्ट हो जायेगा।"* 

इस बात को ध्यान में रखते हुए *विदेशियों द्वारा हमारी सभ्यता, संस्कृति, साहित्य पर निरन्तर कुठाराघात होता रहा। साधारण आदमी कभी-कभी आत्म-बल की कमी के कारण, तो कभी उदर पालन की समस्याओं के कारण उनसे टक्कर लेने में असमर्थ रहा और उन्हीं के रंग में उसने अपने को रंग लिया।* 
*भारत की संस्कृति एवं विरासत को अगर किसी भाषा ने सबसे अधिक नुकसान पहुंचाया है तो वह निश्चित रूप से अंग्रेजी है। फिर भी हर एक भाषा की अपनी एक पहचान अपनी एक विशेषता होती है जिसके शब्दों से विशिष्टता झलकती है तो आज हम इसे अंग्रेजी भाषा के कुछ शब्दों के माध्यम से अंग्रेजी भाषा को जानने का प्रयास करेंगे।*

अंग्रेजी भाषा में प्रेम की अभिव्यक्ति या परस्पर प्रेम अनुभूति के लिए इन तीन शब्दों का प्रयोग किया जाता है .......

1. *Boyfriend*
 2. *Girlfriend*
  3. *Family*

किन्तु एक बात ध्यान देने वाली है कि .....

*Boyfriend* और 
*Girlfriend*   
 इन दो शब्दों के अन्तिम तीन अल्फाबेट है *end*  
इसलिये ये सम्बन्ध एक ना एक दिन ख़त्म हो जाते हैं ।

 परन्तु .....

तीसरा शब्द है :
*FAMILY* = *FAM* + *ILY*      
जिसके पहले तीन अल्फाबेट से बनता है :

*FAM* = *Father* And *Mother*  

और अन्तिम तीन अल्फाबेट से :
*ILY* = *I Love You*

अत: जिस शब्द का आरम्भ पिता एंव माता से और अन्त प्यार के साथ हो, *वह शब्द सही अर्थों में परिवार है !!!* 

*यही परिवार भारतीय संस्कृति की मूल अवधारणा का प्रतीक रहा है अंग्रेजी भाषा में तो केवल शब्दों के माध्यम से इसे समझाने का प्रयास किया है लेकिन भारत ने इसे अपने दैनंदिन व्यवहार में उतारकर जीवन जीने का एक आदर्श दृष्टिकोण समाज में स्थापित किया है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Friday, June 16, 2023

अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई

 *बांगरू बाण*


*संकलित:--* 

श्रीपादावधूत 


*एक संन्यासी  अपने शिष्यों के साथ गंगा नदी के तट पर नहाने पहुंचा। वहां एक ही परिवार के कुछ लोग अचानक आपस में बात करते-करते एक दूसरे पर क्रोधित हो उठे और जोर-जोर से चिल्लाने लगे। संन्यासी यह देख तुरंत पलटा और अपने शिष्यों से पुछने लगा,*

*"क्रोध में लोग एक दूसरे पर चिल्लाते क्यों हैं ?"* 

*शिष्य कुछ देर सोचते रहे, एक ने उत्तर दिया, "क्योंकि हम क्रोध में शांति खो देते हैं इसलिए !”*

 *"पर जब दूसरा व्यक्ति हमारे सामने ही खड़ा है तो भला उस पर चिल्लाने की क्या ज़रुरत है। जो कहना है वो आप सामान्य आवाज़ में भी तो कह सकते हैं"* 

*संन्यासी ने पुनः प्रश्न किया। कुछ और शिष्यों ने भी उत्तर देन का प्रयास किया पर बाकि लोग संतुष्ट नहीं हुए।*

*अंततः संन्यासी ने समझाया…!!!!*

*“जब दो लोग आपस में नाराज होते हैं तो उनके दिल एक दूसरे से बहुत दूर हो जाते हैं! और इस अवस्था में वे एक दूसरे को बिना चिल्लाये नहीं सुन सकते… वे जितना अधिक क्रोधित होंगे उनके बीच की दूरी उतनी ही अधिक हो जाएगी और उन्हें उतनी ही तेजी से चिल्लाना पड़ेगा। लेकिन जब दो लोग प्रेम में होते हैं ? तब वे चिल्लाते नहीं बल्कि धीरे-धीरे बात करते हैं, क्योंकि उनके दिल करीब होते हैं, उनके बीच की दूरी नाम मात्र की रह जाती है, और जब वे एक दूसरे को हद से भी अधिक चाहने लगते हैं तो क्या होता है ? तब वे बोलते भी नहीं, वे सिर्फ एक दूसरे की तरफ देखते हैं और सामने वाले की बात समझ जाते हैं.”* 

*इसी को सच्चा प्रेम कहते है जहाँ दिल की बात को दिल समझ लेता है उसे शब्दों की जरुरत नहीं होती।*

*इसीलिए हिंदू समाज में ईश्वर आराधना मौन होकर की जाती है क्योंकि हम उस परमपिता परमेश्वर से असीम प्रेम और श्रद्धा रखते हैं। जिन धर्मावलंबियों का ईश्वर से प्रेम ना होकर किसी पुस्तक या किसी व्यक्ति विशेष की बातों पर ही केवल भरोसा हो उन्हें अपनी बात कहने के लिए लाउडस्पीकर जैसे साधनों की आवश्यकता पड़ती है क्योंकि उनकी और उनके ईश्वर से इतनी दूरी है कि उन्हें चिल्लाकर ही अपनी बात को अभिव्यक्त करना पड़ता है।*


*कबीर ने कहा है*

*"अकथ कहानी प्रेम की, कछु कही न जाई ।* 

*गुंगे केरी सरकरा, खाई और मुसकाई ।। "* 

*कबीर दास जी कहते है कि "प्रेम की कहानी बड़ी अजीब है, इसे कहा नहीं जा सकता जैसे कोई कोई गूंगा आम का मीठा रस खाता है लेकिन उसकी मिठास को कह नहीं पाता  इसी प्रकार  जिसने इस प्रेम रस को पिया है वह सिर्फ मुसकाता है । वह गूंगे जैसा हो जाता है बोलने के लिए कुछ भी नही बचता।*


*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

अमरनाथ की पवित्र गुफा के समान ही आस्ट्रिया में भी गुफा की खोज

भगवान अमरनाथ की पवित्र गुफा के समान ही आस्ट्रिया में भी गुफा की खोज हुई है जिसमें ठीक उसी तरह का बर्फ से बना शिवलिंग मिला है। जैसा कि सैकड़ों सालों से अमरनाथ धाम में बनता आया है। इस तरह की शिवलिंग की शिलाएं सिर्फ यूरोप में पाई गईं। यूरोप मे
ं आस्ट्रिया की ईस्रीसनवेल्ट और स्लोवालिया में डिमेनोवस्का की गुफाएं अमरनाथ की तरह है। ईस्रीसनवेल्ट गुफाएं सबसे बड़ी है और इनकी बर्फ शिलाओं का आकार पवित्र अमरनाथ की तुलना में शिवलिंग से बहुत अधिक मिलता है।
ये आस्ट्रिया में सेल्जबर्ग क्षेत्र में गुफाओं के जाल के रूप में 40 किमी के दायरे में फैला है। 1879 में सेल्जबर्ग के एन्टन पोसेल्ट नामक वैज्ञानिक ने इन गुफाओं में 200 मीटर तक जाकर इनकी औपचारिक खोज अपने नाम दर्ज कराई और इसे माउन्टनोयरिंग मेगजीन में छपवाया, इससे पहले यहां सिर्फ शिकारी जाया करते थे। 1920 से यहां पर्यटकों का आवागमन शुरू हुआ। भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक परीक्षणों से ज्ञात होता है कि ये बर्फ की शिलाएं करीब 1000 साल पुरानी है।

ये बिल्कुल बर्फ के शिवलिंग के समान दिखती है।अमरनाथ के शिवलिंग मंदिर और ईस्रीसनवेल्ट गुफाओं में एक अन्यसमानता यह भी है कि यहां बर्फ का गठन बारहमासी नहीं है। ये दोनों गुफाएं गतिशील और चक्रीय मौसम परिवर्तनों से प्रभावित होती है। इनमें पड़ी दरारें यहां आने वाली हवा को तरल रूप में यहां से वहां प्रवाहित होने देती है। गुफाओं के भीतर का तापमान बाहर के तापमान की तुलना में सर्दियों में गर्म और गर्मियों में ठंडा रहता है। सर्दियों में जब गुफाओं में हवा अपेक्षाकृत गर्म होती है तो बाहर के वायुमण्डल की ठंडी हवा आकार गुफाओं की निचली सतह के क्षेत्र को जमाव बिंदु से नीचे ले आती है। गर्मियों में ये बर्फ की शिलाएं गलना शुरू हो जाती है और इनका प्रतिरूप उत्कृष्ठ प्रतिमाओं के रूप देखा जा सकता है ।

बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय।

*बांगरू बाण*

*संकलित:--*
श्रीपादावधूत 

*प्रस्तुत कथानक के बारे में लोगों की भिन्न-भिन्न राय है कि बाज इस प्रकार की कोई प्रक्रिया नहीं अपनाता यह केवल एक मिथक है लेकिन जो भी इस कथानक में वर्णित घटनाक्रम से एक सीख तो मिलती ही है। जीवन को किस प्रकार जीया जाये, बदलती परिस्थितियों से किस प्रकार सामंजस्य या तालमेल बैठाया जाय। अपने आप को किस प्रकार फिर तैयार किया जाय।*  

*बाज लगभग 70 वर्ष जीता है.... परन्तु अपने जीवन के 40 वें वर्ष में आते-आते उसे एक महत्वपूर्ण निर्णय लेना पड़ता है । उस अवस्था में उसके शरीर के 3 प्रमुख अंग निष्प्रभावी होने लगते हैं.....*
*1. पंजे लम्बे और लचीले हो जाते है, तथा शिकार पर पकड़ बनाने में अक्षम होने लगते हैं ।*
*2. चोंच आगे की ओर मुड़ जाती है, और भोजन में व्यवधान उत्पन्न करने लगती है ।*
*3. पंख भारी हो जाते हैं, और सीने से चिपकने के कारण पूर्णरूप से खुल नहीं पाते हैं, उड़ान को सीमित कर देते हैं ।* *इस कारण भोजन ढूँढ़ना, भोजन पकड़ना, और भोजन खाना.. तीनों प्रक्रियायें अपनी धार खोने लगती हैं ।*
*उसके पास तीन ही विकल्प बचते हैं....*
*1. देह त्याग दे,*
*2. अपनी प्रवृत्ति छोड़ गिद्ध की तरह त्यक्त भोजन पर निर्वाह करे !!*
*3. या फिर "स्वयं को पुनर्स्थापित करे आकाश के निर्द्वन्द्व एकाधिपति के रूप में।"*
*जहाँ पहले दो विकल्प सरल और त्वरित हैं, अंत में बचता है तीसरा लम्बा और अत्यन्त पीड़ादायी रास्ता। लेकिन बाज तीसरा रास्ता चुनता है और स्वयं को पुनर्स्थापित करता है।*
*वह किसी ऊँचे पहाड़ पर जाता है, एकान्त में अपना घोंसला बनाता है .. और तब स्वयं को पुनर्स्थापित करने की प्रक्रिया प्रारम्भ करता है !!"*
*सबसे पहले वह अपनी चोंच चट्टान पर मार मार कर तोड़ देता है, चोंच तोड़ने से अधिक पीड़ादायक कुछ भी नहीं है पक्षीराज के लिये ! और वह प्रतीक्षा करता है चोंच के पुनः उग आने का । उसके बाद वह अपने पंजे भी उसी प्रकार तोड़ देता है, और प्रतीक्षा करता है .. पंजों के पुनः उग आने का ।*
*नयी चोंच और पंजे आने के बाद वह अपने भारी पंखों को एक-एक कर नोंच कर निकालता है ! और प्रतीक्षा करता है .. पंखों के पुनः उग आने का ।*
*150/160 दिनों की पीड़ा और प्रतीक्षा के बाद... उसे मिलती है वही भव्य और ऊँची उड़ान पहले जैसी.... इस पुनर्स्थापना के बाद वह लगभग 30 साल और जीता है .... ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ ।*

*ऐसी ही कुछ परिस्थिति हम मनुष्यों के साथ भी आती है जब हम 40/50 की उम्र में पहुँचते है तब इसी प्रकार इच्छा, सक्रियता और कल्पना, तीनों निर्बल पड़ने लगते हैं क्योंकि हम भूतकाल से जकडे हुए रहते है और आने वाली कठिनाईयों से लड़ने के लिए हम तैयार नहीं होते और इन परिस्थितियों से परिवार के नाम पर, समाज के नाम पर समझौता कर लेते है लेकिन हमें अस्तित्व के इस भारीपन को त्याग कर कल्पना की उन्मुक्त उड़ाने भरनी होंगी तभी हम उसी ऊर्जा, सम्मान और गरिमा के साथ जी पायेंगे।* 
*इसके लिए हमें 150 दिन न सही.....पर कम से कम 30/40 दिन ही बिताए जा सकते है स्वयं को पुनर्स्थापित करने में ! इस प्रक्रिया को हम 15/15 या 20/20 दिनों के दो हिस्सों में बाँट कर भी कर सकते है* 
*किसी एकांत जगह में जाकर प्रकृति के सानिध्य में तन मन को स्वस्थ रखने की प्रक्रिया अपनाए।* *आरएसएस द्वारा संचालित OTC केम्प या वर्ग भी एक अच्छा माध्यम हो सकता है। या योग और विपश्यना की साधना की जा सकती हैं। जो आसान नहीं है लेकिन जो शरीर और मन से चिपका हुआ है, उसे तोड़ने और नोंचने में पीड़ा तो होगी ही !! और इसका परिणाम यह होगा कि आप फिर से बाज की तरह उड़ानें भरने को तैयार होंगे.. इस बार उड़ानें और ऊँची होंगी, अनुभवी होंगी, अनन्तगामी होंगी ।*
*हर दिन कुछ चिंतन किया जाए और आप ही वो व्यक्ति हैं जो स्वयं को दुसरो से बेहतर जानता है ।*
*इसी तरह एक सफल व्यक्ति भी परिवर्तनों से ही आगे बढ़ता है। समाज में कई बार ऐसे परिवर्तनों के कारण उसकी आलोचना होती है, उसे गलत कहा जाता है। लेकिन वो व्यक्ति अपने ध्येय की ओर लक्ष्य की ओर बढ़ जाता है। जिस तरह बाज एकांत में खुद को बदलता है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता की कोई क्या कहेगा। उसी प्रकार हमें भी एकचित्त होकर ईमानदारी से मेहनत करनी चाहिए और नकारात्मक चीजों से सदा दूर रहना चाहिए।*

*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

Wednesday, June 14, 2023

गुंडा शब्द का सही एवं समीचीन अर्थ।*

*बांगरू-बाण*

श्रीपादावधूत की कलम से 

*शाब्दिक सुबह*
     *अर्थपूर्ण दिवस*

      🌹 *गुंडा* 🌹

*यह शब्द सुनते ही हमारे मन-मस्तिष्क में एक बहुत ही दुर्दांत अपराधी समाजकंटक ऐसी तस्वीर उभरती है लेकिन क्या वास्तव में गुंडा शब्द इन लोगों के लिए जो प्रयुक्त होता है वह सही एवं सटीक है क्या..??* 

*जी नहीं गुंडा शब्द का अर्थ होता है गुणों से युक्त*

 *फिर प्रश्न उत्पन्न होता है कि गुंडा यह शब्द अपराधी बदमाश के अर्थ में कब क्यों और कैसे प्रचलित हो गया तो आइए आज जानते हैं गुंडा शब्द का सही एवं समीचीन अर्थ।*

*कबीर ने "गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?*

*नहीं।* 

*सूरदास ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं।* 

*तुलसी ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

 *नहीं ।*

*जायसी , बिहारी , मतिराम , चिंतामणि आदि प्राचीन कवियों में से किसी ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं ।*

*प्राचीन काल के कवियों को छोड़िए , आधुनिक काल में हिंदी साहित्य के पुरोधा माने जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र ने " गुंडा " शब्द का प्रयोग किया ?* 

*नहीं ।*

*20 वीं शताब्दी से पहले दुनिया में किसी ने भी बदमाश के अर्थ में " गुंडा " शब्द का प्रयोग नहीं किया है ।* 

*तो आइए जानते हैं गुंडा शब्द का असली अर्थ क्या है और यह कैसे प्रचलन में आया।*

*आज "गुंडा"  एक गाली है।* इसे आजकल किसी के ऊपर भी बड़ी सहजता से चस्पां कर दिया जाता है। और तो और *हमारे आर्मी चीफ, जनरल रावत, तक को “सड़क का गुंडा” बता दिया* गया। *बेनी प्रसाद वर्मा ने मोदी जी के प्रधान-मंत्री बनने से पहले आर एस एस के “सबसे बड़े गुंडे”* कहकर सम्मानित (?) किया था।

*अजब नहीं तुक्का, जो तीर हो जाए।*
*दूध फट जाए कभी तो, पनीर हो जाए।*
*मवालियों को न देखा करो, हिकारत से* 
*न जाने कौन सा गुंडा, वजीर हो जाए।*

*पुलिस को तो“वर्दी वाला गुंडा”* कहना आम बात है। *छोटे-मोटे अपराधी "गली-छाप गुंडे"* कहलाते हैं। कुछ टेक्स सरकार लगाती है, *कुछ गुंडे वसूल करते हैं। इसे "गुंडा-टेक्स"  कहा जाता है।* *गुंडों से बचने के लिए हमारे यहाँ बाकायदा "गुंडा-एक्ट" हैं, एंटी-रोमियो "गुंडा एक्ट" भी है। "गुंडा-स्क्वाड" है। आम जनता जो "गुंडों" और "गुंडा-एक्ट", दोनों से ही त्रस्त है,* अक्सर सवाल करती है, क्या गुंडा स्क्वैड वास्तव में गुंडों को बचाने के लिए गुंडों का ही स्क्वाड तो नहीं है ? और उसे कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल पाता। सभी को विदित है कि *बहुत से सफ़ेद-पोश, नेता लोग अपने स्वार्थ साधने के लिए "किराए के गुंडे" भी पाल लेते हैं।*

 *उत्तर भारत में जो हिन्दुस्तानी ज़बान बोली जाती है, उसमें गुंडा शब्द का अर्थ बदमाश, दुर्वृत्त, खोंटे चाल-चलन वाला, उदंड और झगड़ालु व्यक्ति से लगाया जाता है।* 

*गुंडाशाही, गुंडागर्दी, गुंडई और गुंडाराज जैसे पद भी "गुंडा" शब्द से ही बने हैं। किन्तु दक्षिण भारत की भाषाओं में प्राय: "गुंड" और "गुंडा" शब्दों में कोई अनैतिक और नकारात्मक भाव नहीं है।* 

*मराठी में "गाँव-गुंड" ग्राम नायक या ग्राम-योद्धा है। वहां गुंडा के मूल में प्रधान या नेता का भाव है।* 
*इसी प्रकार मराठी के संत कवि जगद्गुरु तुकाराम महाराज ने भी अपने अभंग में  गुंडा शब्द का प्रयोग किया है वह अभंग इस प्रकार है।* 

*"पुत्र व्हावा ऐसा गुंडा। त्याचा तिही लोकी झेंडा। कन्या ऐसी देई। जैसी मिरा मुक्ताबाई ।।"*

*अर्थात पुत्र ऐसा होना चाहिए जिसका यश तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना चाहिए। यहां गुंडा शब्द का अर्थ उसका यश उसके प्रसिद्धि के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।*

*तमिल में भी गुंडा शब्द एक शक्तिशाली और ताकतवर नायक की अर्थवत्ता प्रदान करता है। "गुंडराव" "गुंडराज" जैसे पद इसके उदाहरण हैं। दक्षिण भारत के राज्य कर्नाटक के एक बड़े कांग्रेसी नेता का नाम आप सबको याद होगा आर. गुंडू राव। जो कर्नाटक के मुख्यमंत्री रहे। वर्तमान में कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार बनी है और इस सरकार में एक मंत्री इन्हीं आर. गुंडूराव के पुत्र हैं जिनका नाम है दिनेश गुंडू राव।*

*वस्तुत: "गुंड" का अर्थ किसी उभार या गाँठ से है। किसी समतल जगह पर कोई भी उभार अपनी एक विशिष्ठता की छाप छोड़ता है। इसी तरह समाज में किसी व्यक्ति का उभार उसे ख़ास बना देता है। वह समाज का नायक हो जाता है। गुंड का अर्थ इस प्रकार नायक, योद्धा या शूरवीर से लगाया जाता है।*

*हिन्दी के अधिकतर कोशों में "गुंड" और "गुंडा" शब्दों की व्युत्पत्ति संस्कृत के “गुन्डक:” पद से बताई गई है। संस्कृत में "गुन्डक:" का अर्थ "धूलि या धूलमिला आटा" है। तैलपात्र तथा मंद स्वर" को भी गुन्डक कहा जाता है। संस्कृत के गुन्डक में इस प्रकार न तो नायकत्व की भावना है और न ही कोई दुर्वृत्ति है।*

*हिंदी में " गुंडा " शब्द अंग्रेजों की फाइल से आया है , तब जब 20 वीं शताब्दी के पहले दशक में बस्तर के आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी "वीर गुंडा" को अंग्रेजों ने गुंडा ( बदमाश ) मान लिया ।* 

*भारतीयों की नजर में वीर गुंडा स्वतंत्रता सेनानी थे, मगर अंग्रेजों की नजर में बिगड़ैल, बदमाश अंग्रेजी सत्ता को चुनौती देने वाले।* 

*इसलिए अंग्रेजों ने एक कानून बनाया और उसे नाम दिया "गुंडा-एक्ट" । और जो भी भारतीय अंग्रेजी सत्ता के खिलाफ खड़ा होता या विरोध करता उसे वे "गुंडा-एक्ट" के तहत जेल में बंद कर देते थे।*  

*वस्तुत:  "गुंडा" एक जनजाति के नायक और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का नाम है, जिसने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी।* 
*इसीलिए "गुंडा" शब्द का प्रयोग पहली बार अंग्रेजों ने बदमाश" के अर्थ में किया।*

*इस योद्धा का पूरा नाम "गुंडा धुर" था। 1910 में अंग्रेजों के खिलाफ छत्तीसगढ़ के बस्तर में  "भूमकाल-विद्रोह" में इस "गुंडा धुर" वीर ने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए थे। अंग्रेजी शासन के दस्तावेजों में "गुंडा धुर" को विद्रोही और "गुंडा"  (बदमाश, उद्दंडतापूर्वक आचरण करनेवाला) बतलाया गया है।* 

*अंग्रेजों की नजर में "गुंडा धुर" की छवि उद्दंड और बदमाश की थी पर अपने देशवासियों की नजर में वे स्वतंत्रता सेनानी और वीर थे। कालेन्द्र सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ क्रांति की सुनियोजित रूपरेखा तैयार की गई थी। रानी सुबरन कुँवर ने क्रांतिकारियों की सभा में "मुरिया राज" की स्थापना की घोषणा की। रानी के सुझाव पर "वीर गुंडा धुर" को "भूमकाल-विद्रोह" का नेता निर्वाचित किया गया।*
 *1 फरवरी, 1910 को संपूर्ण बस्तर में अंग्रेजी दासता के विरुद्ध विद्रोह का बिगुल बज उठा।*

*विडंबना देखिए गुलामी की मानसिकता से ग्रस्त भारत के कोशकारों ने अंग्रेजों का अनुगमन करके "गुंडा" का अर्थ "बदमाश" कर दिया है।* 

*अब जब स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने को है और एक नया इतिहास लिखा जाना है भारतीय कोशकारों की जिम्मेदारी है कि अंग्रेजों द्वारा प्रयुक्त "बदमाश" के अर्थ में "गुंडा" शब्द को डिक्शनरी से बाहर करके, "वीर स्वतंत्रता सेनानी" के अर्थ में उसे प्रचलित किया जाना चाहिए। "बदमाश" के अर्थ में "गुंडा" शब्द एक जनजाति समाज के स्वतंत्रता सेनानी का अपमान है।*

 
*यह कहानी है गुंडा शब्द के कानून बनने और उसके बदमाश के अर्थ में प्रचलित होने की लेकिन दुर्भाग्य देखिए इस देश को स्वतंत्र हुए 75 वर्ष हो गए हैं और आज भी आजाद भारत में "गुंडा-एक्ट" अस्तित्व में है।* 

*क्यों ?* 

*जिसने देश को आजाद कराया, वहीं गुंडा धुर* 
*गुंडा है बदमाश है*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त।

मोक्षपट, मोक्षपात, मोक्ष पटामू, परम पदम अर्थात आज का "सांप-सीढीं" का खेल।*

*बांगरू बाण*

श्रीपादावधूत की कलम से

*मोक्षपट, मोक्षपात, मोक्ष पटामू, परम पदम अर्थात आज का सांप सीढ़ी का खेल।*

*किसी भी देश की संस्कृति सभ्यता धरोहर को नष्ट करना हो तो सबसे पहले उस देश के निवासियों को उनकी भाषा और उनके इतिहास से अलग किया जाता है। क्योंकि भाषा और इतिहास उस देश के निवासियों में आत्म गौरव का स्वाभिमान का भाव जागृत करते हैं। यही कार्य इस देश में पहले मुसलमानों ने और बाद में अंग्रेजों ने किया। अंग्रेजों ने तो सुनियोजित षड्यंत्रपूर्वक इस देश के समस्त बौद्धिक संपदा को लूट कर उसका अनुवाद अंग्रेजी में कर संपूर्ण दुनिया में प्रसारित किया। पूरे विश्व में जितनी भी खोजें हुई है वह सारी खोजें 17 वी शताब्दी के बाद ही अस्तित्व में क्यों आती हैं? कारण स्पष्ट है अगर आप समझना चाहे तो। यह वही काल है जब इस देश पर अंग्रेजों का आक्रमण होता है । संपूर्ण देश पर धीरे-धीरे एकछत्र राज्य स्थापित हो जाता हैं और यहां की धन संपत्ति खनिज व बौद्धिक संपदा को लूटकर  इंग्लैंड भेजा जाता है और वही से वह सारी खोज व सारे आविष्कार वह सारी बातें अंग्रेजों के नाम से संपूर्ण विश्व में प्रचारित की जाती है। इसी का एक उदाहरण है यह सांप सीढ़ी का खेल।* 
*कई लोगों के लिए आश्चर्य की बात होगी कि मोक्षपट या मोक्ष पटामू के रूप में जाना जाने वाला खेल मूल सांप और सीढ़ी था।* *"भारत महान आविष्कारों और नवाचारों की भूमि रहा है, हालांकि अधिकांश भारतीय शायद ही उनके बारे में जानते हैं। क्योंकि हमें यह सब ना तो बताया गया है ना पढ़ाया गया है जो पढ़ाया है वह गुलामी का इतिहास है और इस इतिहास में हम कितने जाहिल थे गंवार थे। यही सारी गलत बातें हमें इतिहास में पढ़ाई जाती हैं और यहां का व्यक्ति उस इतिहास को पढ़कर यह मान्य भी कर लेता है।* 

*तो आइए जानते हैं कि मोक्षपट क्या है?*
*हालाँकि इस खेल की उत्पत्ति का श्रेय संत ज्ञानेश्वर जी को दिया जाता है, लेकिन ऐसी मान्यता है कि यह दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व से खेला जाता रहा है। इस खेल का उद्देश्य बच्चों में नैतिक शिक्षा देना था ।जिन चौकों पर सीढ़ी शुरू होती है वे पुण्य के लिए खड़े होते हैं जबकि सांप के सिर वाले वर्ग पाप या बुराई की विशेषता का प्रतीक होते हैं।*

 *1892 में औपनिवेशिक शासकों द्वारा इसे ब्रिटेन में संशोधनों के साथ पेश किया गया था। जब खेल को इंग्लैंड ले जाया गया तो इसमें नैतिक पाठ और धार्मिक पहलुओं हटा दिया गया पाश्चात्य सभ्यता से परिपूर्ण मूल्यों में इसे बदल कर स्नेक एंड लैडर  के रूप में प्रचारित किया। पुराने भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत इस खेल में सांपों की संख्या अधिक थी एवं सीढ़ियां कम थी लेकिन अंग्रेजों ने सांप-सीढ़ी की संख्या भी बराबर कर दी गई। खेल को अमेरिका में च्यूट्स एंड लैडर्स के रूप में पेश किया गया था।"*

*प्राचीन भारतीयों की अन्य खोजें सिर्फ सांप-सीढ़ी ही नहीं बल्कि भारत कई प्राचीन खेलों का जन्मस्थान है। शतरंज की उत्पत्ति भारत में सिंधु सरस्वती सभ्यता के पुरातात्विक स्थलों में *"शतरंज"* *के समान एक खेल के प्रमाण के साथ हुई थी। इसे मूल रूप से "अष्टपद" कहा जाता था और *गुप्त काल" के दौरान "चतुरंग" के रूप में जाना जाने लगा। "लूडो" पहली बार छठी शताब्दी में खेला गया था, इसकी उत्पत्ति "पांडवों और कौरवों" द्वारा खेले जाने वाले "चौसर" नामक प्राचीन खेल से हुई है। इतिहासकार इस बात को प्रमाणित करते हैं कि एलोरा की गुफाओं में इस खेल का चित्रण है। मार्शल आर्ट जो बौद्ध भिक्षुओं के माध्यम से चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया में फैला, भारत में उत्पन्न हुआ। दिलचस्प बात यह है कि बैडमिंटन का आधुनिक रूप भी भारत में पैदा हुआ था और बाद में औपनिवेशिक शासकों द्वारा इसे ब्रिटेन ले जाया गया।*

*भारत को अध्यात्म की भूमि के रूप में जाना जाता है, हमारे पूर्वज कई क्षेत्रों में बहुत उन्नत थे। हमारे ऋषि कई अन्य क्षेत्रों के अलावा गणित और खगोल विज्ञान से लेकर चिकित्सा जैसे विविध क्षेत्रों के विशेषज्ञ थे। उन्होंने इन शक्तियों का उपयोग किया और कई वैज्ञानिक खोजें कीं। इनका उपयोग आम नागरिकों के जीवन को आसान बनाने के लिए किया गया था। इन प्रतिभाशाली ऋषि-मुनियों दिमागों की एक झलक है, जिन्होंने भारत को ज्ञान की भूमि बनाया और यहां तक कि खेलों के माध्यम से मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा के दोहरे उद्देश्य को भी बहुत आसान ढंग से समाज में स्थापित किया।*

*"तो चलिए आज चर्चा सांप सीढ़ी के खेल पर करते हैं।*
*इस खेल के बारे में सबसे पहला उल्लेख 13वीं शताब्दी के महाराष्ट्र के संत श्री ज्ञानेश्वर महाराज से मिलता है।* 
*डेनमार्क के इतिहासकार मिस्टर जेकॉब और पुणे के  इतिहास संशोधक वा. ल. मंजुळ इन्होंने सबसे पहले ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर यह सिद्ध किया कि इस खेल को संत ज्ञानेश्वर महाराज ने अपने दो छोटे भाई बहनों सोपान और मुक्ताबाई को खेलने हेतु यह खेल उनके निवास स्थान के बाहर एक चट्टान पर  बना करके दिया था। आपको विदित ही होगा कि संत ज्ञानेश्वरजी, निवृत्ति नाथ, सोपानदेव और मुक्ताबाई यह चार भाई बहन थे। इनमें दो बड़े भाई ज्ञानेश्वर और निवृत्तिनाथ जब भिक्षा लेने ने के लिए जाते थे तब अपने दो छोटे भाई बहनों को यह खेल खेलने के लिए देते थे। यह खेल खिलाने के पीछे उनका उद्देश्य सिर्फ इतना ही था कि 2 बड़े भाइयों की अनुपस्थिति में दो छोटे भाई बहन इस खेल को खेल कर अपना समय व्यतीत करें, साथ ही छोटे बच्चों को इस खेल के माध्यम से अच्छे संस्कार भारतीय संस्कृति के उद्देश्य उनकी शिक्षा यह सब मिलती रहे। इतनी उदात्तता को लेकर तैयार किया गया था यह "सांप-सीढ़ी" का खेल। लेकिन दुर्भाग्य देखिए अंग्रेजों ने इसे अपने नाम से चिपका कर हमारे सामने रखा और हमने आंख मूंदकर विदेशी है; आयातित हैं; तो अच्छा ही होगा इसके आधार पर स्वीकार कर लिया।* 
*डेनमार्क के इतिहासकार मिस्टर जेकॉब ने "मध्ययुगीन भारत में खेले जाने वाले खेल" यह विषय लेकर अपनी पीएचडी की उपाधि प्राप्त की तब उन्हें "इंडियन कल्चर ट्रेडीशन के संदर्भ में डेक्कन महाविद्यालय पुणे" के "प्रोफेसर रा. चि. ढेरे" के हस्तलिखित संग्रह से दो मोक्षपट प्राप्त हुए अर्थात "सांप सीढ़ी" के खेल प्राप्त हुए।* 
*इसी प्रकार विजुअल फैक्टफाइंडर हिस्ट्री टाइमलाइन इस पुस्तक में वर्ष 1199 से 1209 इस कालखंड में पूरे दुनिया में जो भी कोई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी या अविष्कार हुए उसमें संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा कौड़ी और पांसो के माध्यम से एक खेल खेला गया इस प्रकार का उल्लेख प्राप्त हुआ।* 

*13 वीं शताब्दी के कवि संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा रचित इस खेल में सीढ़ियां सद्गुणों का प्रतिनिधित्व करती हैं और सांप अवगुणों का। खेल कौड़ियों और पासों से खेला जाता था। बाद में समय के साथ, खेल में कई संशोधन हुए लेकिन अर्थ वही है अर्थात अच्छे कर्म हमें स्वर्ग में ले जाते हैं और बुरे कर्म पुनर्जन्म के चक्र में ले जाते हैं।* 

*एक बोर्ड पर सौ वर्ग होते हैं; सीढ़ियां ऊपर ले जाती हैं, सांप नीचे ले आते हैं। यहाँ अंतर यह है कि वर्ग सचित्र हैं। सीढ़ी का शीर्ष एक भगवान, या विभिन्न स्वर्गों ( कैलाश, वैकुंठ, ब्रह्मलोक ) और इसी तरह से एक को दर्शाता है, जबकि नीचे एक अच्छी गुणवत्ता का वर्णन करता है। इसके विपरीत, प्रत्येक साँप का सिर एक नकारात्मक गुण या एक असुर (राक्षस) है। जैसे-जैसे खेल आगे बढ़ता है, विभिन्न कर्म और संस्कार, अच्छे कर्म और बुरे, आपको बोर्ड में ऊपर और नीचे ले जाते हैं।*
*मूल खेल वर्ग में 12 विश्वास था,* 
*51 विश्वसनीयता थी,* 
*57 उदारता थी,* 
*76 ज्ञान था,* और *78 वैराग्य था।* 
*ये वे चौक थे जहां सीढ़ी मिली थी।* 
*वर्ग 41 अवज्ञा के लिए,* 
*44 अहंकार के लिए,* 
*49 अश्लीलता के लिए,* 
*52 चोरी के लिए,* *58 झूठ बोलने के लिए,* 
*62 नशे के लिए,* *69 कर्ज के लिए,* *84 क्रोध के लिए*, *92 लालच के लिए*, *95 अभिमान के लिए,* *73 हत्या के लिए* और 
*99 वासना के लिए था।* 
*ये वो चौक थे जहां सांप मिला था।* 
*वर्ग 100 निर्वाण या मोक्ष का प्रतिनिधित्व करता है ।*

*यह खेल एक दोहरे उद्देश्य को पूरा करता है: मनोरंजन, साथ ही क्या करें और क्या न करें, दैवीय पुरस्कार और दंड, नैतिक मूल्य और नैतिकता। अंतिम लक्ष्य वैकुंठ या स्वर्ग की ओर जाता है, जिसे विष्णु अपने भक्तों से घिरे हुए, या शिव, पार्वती, गणेश और स्कंद और उनके भक्तों के साथ कैलाश द्वारा दर्शाया गया है। धार्मिक सामाजिक और नैतिक पतन के इस युग में, यह उन बच्चों को मूल्य सिखाने का एक अच्छा तरीका था। यह खेल नैतिक मूल्यों की शिक्षा देता था, एकाग्रता, धैर्य जैसे कौशल और त्वरित सोच विकसित करता था।" क्षेत्रीयता, जाति और धार्मिक विविधताओं के साथ यह बच्चों, वृद्धों महिलाओं के बीच बहुत लोकप्रिय था और इसके लिए एक अच्छी स्मृति और सतर्कता की आवश्यकता थी, क्योंकि उन्हें प्रतिद्वंद्वी द्वारा जमा किए गए सिक्कों या बीजों की संख्या को गिनना और याद रखना था।* 

*हमारा प्राचीन ज्ञान संस्कृति सभ्यता कितनी श्रेष्ठ थी यह इन छोटी-छोटी बातों से सिद्ध होती है लेकिन दुर्भाग्य देखिए हम हमारे पुराने वैभवशाली गौरवशाली इतिहास को झांकना ही नहीं चाहते उसमें हमारे विश्वगुरु होने के ऐसे कितने ही सबूत आज भी मौजूद हैं । आवश्यकता है केवल उन्हें ढूंढने की और ढूंढ कर समाज के सामने लाने की। और यही एक छोटा सा कार्य करने का प्रयत्न आपके सामने प्रस्तुत है।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त।

Friday, June 9, 2023

नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।

बांगरू बाण

श्रीपादावधूत की कलम से 

नकारात्मक भावनाओं से जीवन में जटिलता ।
आधुनिक युग की किसी भी शिक्षा को जानने का अर्थ उसे समझना नहीं है। जानने और समझने में अंतर है। एक व्यक्ति जिसने आठ बार शोधकार्य कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की थी वह एक संन्यासी से मिला। अपनी उपलब्धि पर उसे गर्व था इसी कारण वह अपनी आत्मप्रशंसा उस संन्यासी के सामने कर रहा था। उसके गर्व को देखकर संन्यासी ने कहा, 'तुम अपने जीवन में इतने मूर्ख क्यों रहे?' सन्यासी की इस बात से वह व्यक्ति थोड़ा विचलित हुआ और उस व्यक्ति ने कहा, 'आपको गलतफहमी हुई है, मैंने आठ बार पीएचडी की उपाधि प्राप्त की है।' 

'मैंने तुम्हें ठीक समझा है। चिडिय़ों, चांद और तारों का आनंद उठाने के बजाय जीवन के सर्वोत्तम भाग में केवल पढ़ते रहना मूर्खता ही तो है।' व्यक्ति के पास सारी विधाएं हो सकती हैं, पर स्पष्टता न हो और उसे बहुत कुछ मालूम हो, तो क्या लाभ? 

समझ और जानने के बीच स्पष्टता की कमी उलझन को उत्पन्न करती है। व्यक्ति को समझना चाहिए कि व्यक्ति के कई केंद्र होते हैं। बौद्धिक केंद्र, भावनात्मक केंद्र और शरीर का केंद्र। प्रत्येक केंद्र में यांत्रिक और चुंबकीय भाग होता है। यांत्रिक भाग यंत्र की तरह काम करता है। जबकि चुंबकीय भाग अधिक सचेतना के साथ काम करता है। व्यक्ति को स्वयं को परिवर्तित करना होता है। यांत्रिक गतिविधियों को बदलना पड़ता है। पसंद और नापसंद को बदलनी चाहिए। यांत्रिक भावना जैसे ईर्ष्या और घृणा को भी रूपांतरित होना चाहिए। 

चेतना को जाग्रत करो और जीवन को रूपांतरित होते देखो। जड़ वस्तु में भी प्राण होते हैं। प्रेम-भरी चेतना के साथ किसी भी वस्तु के साथ व्यवहार करो। यह रहस्यपूर्ण तरह से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगी। इस संदेश को पाकर तुम्हारी सहज बुद्धि और पवित्रता बढ़नी चाहिए। जब तुम स्नान करते हो, तो प्रेम से पानी से बात करो। जब तुम सोते हो तो प्रेम-भरी चेतना के साथ तकिए से बात करो और एक दिव्य संबंध स्थापित हो जाता है। और यह मैंने स्वयं अपनी आंखों से देखा है मेरी नानी रात को सोते समय तकिए को बोलकर सोती थी कि सुबह मुझे इतनी बजे उठना है उस जमाने में गांव में हर किसी के घर अलार्म घड़ी नहीं होती थी। और ठीक उसी समय उनकी नींद खुल जाती थी और वह अपने दैनंदिन कार्य कर लेती थी बचपन में मुझे बड़ा आश्चर्य होता था कुतूहल होता था लेकिन अब जाकर के समझ में आ रहा है कि जिन्हें हम अनपढ़ मूर्ख गंवार कहते हैं वस्तुतः वही जीवन के असली सौंदर्य को आनंद को अनुभूत कर पाते हैं ।

नकारात्मक भावनाएं जीवन को विषमय बना देती हैं। विषैले भोजन की तरह नकारात्मक भावनाओं को मत अपनाओ। अब तो विज्ञान ने भी सिद्ध कर दिया है कि नकारात्मक भावनाओं के कारण आपके शरीर में विषैले हारमोंस स्त्रावित होते हैं जो आपके शरीर को नुकसान पहुंचाते हैं वर्तमान समय में डायबिटीज ब्लड प्रेशर इन सब के पीछे सबसे प्रमुख कारण नकारात्मक विचारों से उत्पन्न  वे विषैले हारमोंस ही हैं जो आपको बीमारियों के रूप में आकर पीड़ित करते हैं। आजकल तो एक आम आदमी भी यह कहते हुए सुना जाता है की टेंशन बढ़ने से उसकी शुगर बढ़ गई है अत्यधिक क्रोध से उसका ब्लड प्रेशर बढ़ गया है यह सब इन्हीं हारमोंस की वजह से होता है। नकारात्मक भावों के प्रति सावधान और सचेत रहो। उन्हें आने दो, क्योंकि उनका आना स्वाभाविक है परिस्थितिजन्य है पर उनके साथ जुड़ो या एकरूप मत हो। अपने प्रिय व्यक्ति को आलिंगन करने से हमारे शरीर में ऑक्सीटॉनिन नामक हार्मोन सक्रिय होता है जो हमें पूर्णानंद परिपूर्णता सुरक्षा साहस आदि प्रदान करता है।
इसके साथ एक और कार्टिसोल नामक हार्मोन स्रावित होता है। जो हमें तनाव एंग्जाइटी ट्रेस आदि को नष्ट करता है।
किसी अच्छे स्पर्श से मस्तिष्क का सेरेब्रल ब्रेन सिस्टम (यह वह हिस्सा है जो हमारे अंदर प्यार और विश्वास की अनुभूति करवाता है) सक्रिय होता है।
कनाडा की एक यूनिवर्सिटी में हुए शोध के अनुसार नियमित गले लगने हाथ मिलाने से संबंधों में प्रगाढ़ता आती है। जादू की झप्पी से पूरे दिन आपके अंदर उत्साह का भाव बना रहता है आत्मीय और पारिवारिक संबंधों के लिए रोज जादू की झप्पी अनिवार्य होती है।
द हग थेरेपी पुस्तक की लेखिका प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉक्टर कैथलीन किटिंग ने अपने अनुभव के आधार पर लिखा है कि हग अर्थात आलिंगन गले लगाना दवाइयों के सेवन के मुकाबले में अधिक फायदेमंद साबित होते हैं।
वृद्ध लोगों को प्यार से पकड़ने उन्हें गले लगाने से उनमें जीवन जीने की इच्छा शक्ति बढ़ती है गले लगाने से अकेलापन डर और भूलने की बीमारी अनिद्रा से मुक्ति मिलती है। इसलिए
नई इच्छाशक्ति की रचना करने का चुनाव करो। नकारात्मक भावों से चलित मत हो। वे तुम्हारी शक्ति को नष्ट करते हैं। वे तुम्हें सुलाए रखते हैं। वे हानिकारक और बोझिल हैं। वे तुम्हारे जीवन को जटिल बनाते हैं।

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

*बदन दर्द, कमर दर्द, सर्वाइकल और चारपाई/खाट/खटिया*

*बांगरू-बाण*

 श्रीपादावधूत की कलम से 


*बदन दर्द, कमर दर्द, सर्वाइकल और चारपाई/खाट/खटिया* 

*बदन दर्द, कमर दर्द और सर्वाइकल का चारपाई या खाट से क्या संबंध है यह प्रश्न आपके मन में उत्पन्न हुआ होगा?* 
*प्रथम दृष्टया तो इनका खटिया से कोई संबंध है यह हमारी जानकारी में ही नहीं होगा। लेकिन सच यही है। वर्तमान समय में अधिकांश लोगों को कमर दर्द सर्वाइकल का प्रॉब्लम केवल और केवल गैर पारंपरिक इंग्लिश बेड जिसे सामान्य भाषा में हम पलंग कहते हैं और जिस पर फोम के गद्दे बिछाए जाते हैं के कारण ही उत्पन्न होता है।*

*हमारे पूर्वज बहुत ही जानकार थे वह विज्ञान को अच्छी तरह से जानते थे शरीर विज्ञान आरोग्य शास्त्र का उन्हें पूरा पूरा ज्ञान था और इसीलिए उनके प्रत्येक आचार, विचार, व्यवहार में विज्ञान व आयुर्वेद का मिलाजुला स्वरूप प्रयुक्त होता था जो उन्हें स्वस्थ रखने में सहायक होता था । सोने के लिए खाट हमारे पूर्वजों की सर्वोत्तम खोज है। हमारे पूर्वज क्या लकड़ी को चीरना नहीं जानते थे ? वे भी लकड़ी चीरकर उसकी पट्टियाँ बनाकर डबल बेड बना सकते थे। डबल बेड बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। लकड़ी की पट्टियों में कीलें ही ठोंकनी होती हैं। चारपाई भी भले कोई साइंस नहीं है, लेकिन एक समझदारी है कि कैसे शरीर को अधिक आराम मिल सके। चारपाई बनाना एक कला है। उसे रस्सी से बुनना पड़ता है और उसमें दिमाग और श्रम लगता है।*
*जब हम सोते हैं, तब सिर और पांव के मुकाबले पेट को अधिक खून की आवश्यकता होती है ; क्योंकि रात हो या दोपहर में लोग अक्सर खाने के बाद ही सोते हैं। पेट को पाचनक्रिया के लिए अधिक खून की आवश्यकता होती है। इसलिए सोते समय चारपाई की झोली ही इस स्वास्थ का लाभ पहुंचा सकती है।*
*दुनिया में जितनी भी आरामकुर्सियां देख लें, सभी में चारपाई की तरह झोली बनी होती है। बच्चों का पुराना पालना सिर्फ कपडे की झोली का था, लकडी का सपाट बनाकर उसे भी बिगाड़ दिया गया है।* *चारपाई पर सोने से कमर और पीठ का दर्द  कभी नही होता है। आजकल डॉक्टरों के द्वारा दर्द होने पर चारपाई पर सोने की सलाह दी जाती है। आज भी गांव में जच्चा और बच्चा को खटिया पर ही सुलाया जाता है। अधिकांश गांव में इस तरह की खटिया या चारपाई केवल और केवल उन महिलाओं के लिए ही बनी होती है जिन्होंने अभी अभी बच्चा पैदा किया है और वह इस खटिया पर लगभग सवा महीने तक सोती है।* 
*डबलबेड के नीचे अंधेरा होता है, उसमें रोग के कीटाणु पनपते हैं, वजन में भारी होता है तो रोज-रोज सफाई नहीं हो सकती। चारपाई को रोज सुबह खड़ा कर दिया जाता है और सफाई भी हो जाती है, सूरज का प्रकाश बहुत बढ़िया कीटनाशक है।* *खटिया को धूप में रखने से खटमल इत्यादि भी नहीं लगते हैं। अगर किसी मरीज को डॉक्टर Bed Rest लिख देता है तो दो तीन दिन में उसको English Bed पर लेटने से Bed -Soar शुरू हो जाता है । भारतीय चारपाई ऐसे मरीजों के बहुत काम की होती है । चारपाई पर Bed Soar नहीं होता क्योकि इसमें से हवा आर पार होती रहती है। गर्मियों में इंग्लिश Bed जो कि फोम का या फाइबर का बना होता है गर्म हो जाता है इसलिए AC की अधिक जरुरत पड़ती है जबकि सनातन चारपाई पर नीचे से हवा लगने के कारण गर्मी बहुत कम लगती है ।*
*सूत की रस्सियों से बुनी चारपाई पर सोने से सारी रात Automatically सारे शरीर का Acupressure होता रहता है ।*
*गर्मी में छत पर चारपाई डालकर सोने का आनंद ही कुछ और है। ताज़ी हवा, बदलता मौसम, तारों की छांव ,चन्द्रमा की शीतलता जीवन में उमंग भर देती है । हर घर में एक स्वदेशी बाण(सूत की रस्सी) की बुनी हुई (प्लास्टिक की नहीं ) चारपाई होनी चाहिए ।50 वर्ष की आयु के बाद तो सोने के लिए चारपाई से अच्छा कोई साधन ही नहीं है। दिन में सोने के लिए या बैठने के लिए केवल चारपाई का प्रयोग करना चाहिए उस पर कुछ भी नहीं डालना चाहिए। उस पर बैठने या सोने से आपके शरीर के अधिकांश अंग सूत की रस्सी के संपर्क में आने से एक तरह से एक्यूप्रेशर का काम करते हैं। रात्रि में आवश्यक हो तो आप गादी या गद्दा बिछा लें लेकिन अगर केवल मोटी दरी डालकर सोएंगे तो ज्यादा लाभदायक रहेगा। अंग्रेजी में जिसे आप रिलैक्स कहते हैं वह रिलैक्सेशन की प्रक्रिया केवल और केवल चारपाई या खाट पर सोने से ही प्राप्त होती है।* 
*इसलिए प्राचीन सनातन भारतीय संस्कृति के आचार, विचार, व्यवहार और संस्कारों को अपनाते चलें जो आपके हित में है।* 

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त..!!!

Monday, May 29, 2023

संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*

*बांगरू बांण* 
श्रीपादावधूत की कलम से 

*संसद भवन में सेंगोल स्थापित कर प्राचीन सनातन वैदिक हिन्दू संस्कृति की महान परंपरा को भारत के घर घर में पुनर्जीवित करने के मोदी जी के प्रयासों का हृदय की गहराइयों से आभार।*

*भारतीय पारिवारिक #सेंगोल जो प्रत्येक परिवार में हर बुजुर्ग के हाथ में सदैव रहता था।जिससे वे पूरे परिवार को नियंत्रित करते थे। वे ग़लती करने पर इसी #सेंगोल राजदंड से दंड भी देते थे। जो बहुत पीड़ादायक होता था और गलती करने वाला कभी भी उस गलती को दोहराने की हिम्मत नहीं करता था। लेकिन आजकल हमारे #बुजुर्गों का ये सेंगोल भी कहीं #विलुप्त हो गया है और इसी के परिणामस्वरूप सब परिवार #बिखराव की ओर बढ़ रहे हैं।* 
*मास्टरजी के पास भी यह कुटाई वाला #सेंगोल होता था। जो पढ़ाई-लिखाई में सहायक होता था। जो बच्चे अनुशासनहीनता करते थे। उनकी अच्छी तरह से खबर लेता था।*
*छड़ी बाजे छम छम* 
*विद्या आये घम घम* 
*यह शिक्षण का मूलमंत्र था। इसी कारण छात्रों को शिक्षित करने का यह रामबाण उपाय था। लेकिन मैकाल की शिक्षण पद्धति से इसे विस्मृत कर दिया गया। इसका ही यह परिणाम है कि वर्तमान में हमारे अपने बच्चे भी कई बार #विपक्षियों वाला बर्ताव करने लगते हैं।* 
*धर्मगुरुओं के पास भी धर्मदंड होता था जो राजदंड के गलत निर्णयों पर समाज की कुरीतियों पर सदैव चलता था।* 
*गांव के पंच परमेश्वरों के पास भी यह न्यायदंड होता था। जिससे वे पंचायत में न्याय करते थे।*

*जिस जिस घर/मंदिर/पंचायत में ये सब होता है उस घर/मंदिर/पंचायत के बड़े बुजुर्ग से #विनंती है के वो भी अपने सेंगोल को तलाश करें उसका #उपयोग करें।*
*फिर देखिए कैसे #बिखरे हुए और #अनियंत्रित लोग #एकजुट होते हैं फिर वो चाहे आपका परिवार हो या आपका देश।*

अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त

Tuesday, May 23, 2023

आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये

 *बांगरू बाण*


*संकलित:-* श्रीपादावधूत 


*जापान में हमेशा से ही मछलियाँ खाने का एक ज़रुरी हिस्सा रही हैं और ये जितनी ताज़ी होतीं हैं लोग उसे उतना ही पसंद करते हैं । लेकिन जापान के तटों के आस-पास इतनी मछलियाँ नहीं होतीं की उनसे लोगों की डिमांड पूरी की जा सके ।नतीजतन मछुआरों को दूर समुद्र में जाकर मछलियाँ पकड़नी पड़ती हैं। जब इस तरह से मछलियाँ पकड़ने की शुरुआत हुई तो मछुआरों के सामने एक गंभीर समस्या सामने आई । वे जितनी दूर मछली पकडने जाते उन्हें लौटने में उतना ही अधिक समय लगता और मछलियाँ बाजार तक पहुँचते-पहुँचते बासी हो जातीं, और फिर कोई उन्हें खरीदना नहीं चाहता । इस समस्या से निपटने के लिए मछुआरों ने अपनी बोट्स पर फ्रीज़र लगवा लिये । वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें फ्रीजर में डाल देते । इस तरह से वे और भी देर तक मछलियाँ पकड़ सकते थे और उसे बाजार तक पहुंचा सकते थे । पर इसमें भी एक समस्या आ गयी । जापानी फ्रोजेन फ़िश ओर फ्रेश फिश में आसनी से अंतर कर लेते और फ्रोजेन मछलियों को खरीदने से कतराते। उन्हें तो किसी भी कीमत पर ताज़ी मछलियाँ ही चाहिए होतीं है। एक बार फिर मछुआरों ने इस समस्या से निपटने की सोची और इस बार एक शानदार तरीका निकाला, उन्होंने अपनी बड़े-बड़े जहाजों पर फ़िश टैंक्स बनवा लिए और अब वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें पानी से भरे टैंकों मे डाल देते । टैंक में डालने के बाद कुछ देर तो मछलियाँ इधर उधर भागती पर जगह कम होने के कारण वे जल्द ही एक जगह स्थिर हो जातीं, और जब ये मछलियाँ बाजार पहुँचती तो भले वे ही सांस ले रही होतीं लेकिन उनमें वो बात नहीं होती जो आज़ाद घूम रही ताज़ी मछलियों मे होती, और जापानी चखकर इन मछलियों में भी अंतर कर लेते । तो इतना कुछ करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई थी। अब मछुवारे क्या करते ? वे कौन सा उपाय लगाते कि ताज़ी मछलियाँ लोगों तक पहुँच पाती ? उन्होंने कुछ नया नहीं किया, वें अभी भी मछलियाँ टैंक्स में ही रखते, पर इस बार वो हर एक टैंक मे एक छोटी सी शार्क मछली भी डाल देते। शार्क कुछ मछलियों को जरूर खा जाती पर ज्यादातर मछलियाँ बिलकुल ताज़ी पहुंचती। ऐसा क्यों होता ? क्योंकि शार्क बाकि मछलियों की लिए एक चैलेंज की तरह थी। उसकी मौज़ूदगी बाकि मछलियों को हमेशा चौकन्ना रखती ओर अपनी जान बचाने के लिए वे हमेशा अलर्ट रहती। इसीलिए कई दिनों तक टैंक में रहने के बावज़ूद उनमे स्फूर्ति और ताजापन बना रहता।* 


*अब यह तो हो गई घटना की बात लेकिन इस सत्य घटना की आज क्या प्रासंगिकता है इस पर चर्चा करते हैं। आज बहुत से लोगों की ज़िन्दगी टैंक में पड़ी उन मछलियों की तरह हो गयी है जिन्हें जगाने के लिए कोई शार्क मौज़ूद नहीं है। और अगर दुर्भाग्य से आपके साथ भी ऐसा ही हो रहा है तो आपको भी आपने जीवन में नये चैलेंजेस स्वीकार करने होंगे।* *आप जिस रूटीन के आदी हों चुकें हैं उससे कुछ अलग़ करना होगा।आपको अपना दायरा बढ़ाना होगा और एक बार फिर ज़िन्दगी में रोमांच और नयापन लाना होगा तभी आप समाजोपयोगी व सार्थक बने रहेंगे । नहीं तो, बासी मछलियों की तरह आपका भी मोल कम हों जायेगा और लोग आपसे मिलने-जुलने की बजाय बचते नजर आएंगे। और दूसरी तरफ अगर आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैं, बाधाएं है तो उन्हें कोसते मत रहिये, कहीं ना कहीं ये आपको fresh and lively बनाये रखती हैं , इन्हें accept करिये, इन्हे overcome करिये और अपना तेज बनाये रखिये।*


*अवधूत चिंतन श्री गुरुदेव दत्त*

Thursday, March 30, 2023

*राम..!*

 *बांगरू बाण*

*श्रीपादावधूत की कलम से* 


*राम..!*


*ये राम का देश है। यहां कण कण में राम हैं।* भाव की हर हिलोर में राम हैं। कर्म के हर छोर में राम हैं। राम यत्र-तत्र हैं। राम सर्वत्र हैं। जिसमें रम गए वही राम है। यहां सबके अपने-अपने राम हैं। *वाल्मीकि और तुलसी के राम में भी फर्क है*। *भवभूति के राम दोनों से अलग हैं।* *कबीर ने राम को जाना। तुलसी ने माना। निराला ने बखाना।* राम एक ही हैं पर दृष्टि सबकी भिन्न। भारतीय समाज में मर्यादा, आदर्श, विनय, विवेक, लोकतांत्रिक मूल्यवत्ता और संयम का नाम है राम। आप ईश्वरवादी भले ही न हो, तो भी घर-घर में राम की गहरी व्याप्ति से उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम तो मानना ही पड़ेगा। स्थितप्रज्ञ, असंम्पृक्त, अनासक्त। *एक ऐसा लोक नायक, जिसमें सत्ता के प्रति निरासक्ति का भाव है। जो जिस सत्ता का पालक है, उसी को छोड़ने के लिए सदा तैयार है।*

*राम हमारे देश की उत्तर दक्षिण एकता के अकेले सूत्रधार है*। *कबीर राम को परम ब्रह्म मानते है। “कस्तूरी कुण्डल बले मृग ढूँढे बन माही ऐसे घट घट राम है दुनिया देखे नाहीं “* 

हमारे *राम लोकंकमंगलकारी है*। *मर्यादा पुरूषोत्तम है*। राम का आदर्श, लक्ष्मण रेखा की मर्यादा है। लांघी तो अनर्थ। सीमा में रहे तो खुशहाल और सुरक्षित जीवन। *राम जाति वर्ग से परे है। नर, वानर, आदिवासी, पशु, मानव, दानव सभी से उनका करीबी रिश्ता है।* *अगड़े पिछड़े से ऊपर निषादराज हों या सुग्रीव, शबरी हों या जटायु, सभी को साथ ले चलने वाले वे अकेले देवता हैं। भरत के लिए आदर्श भाई। हनुमान के लिए स्वामी। प्रजा के लिए नीतिकुशल न्यायप्रिय राजा हैं।* परिवार नाम की संस्था में उन्होंने नए संस्कार जोड़े। पति पत्नी के प्रेम की नई परिभाषा दी। ऐसे वक्त जब खुद उनके पिता ने तीन विवाह किए थे। पर राम ने अपनी दृष्टि सिर्फ एक महिला तक सीमित रखी। उस निगाह से किसी दूसरी महिला को कभी देखा नहीं। जब सीता का अपहरण हुआ वे व्याकुल थे। रो-रो कर पेड़, पौधे, पहाड़ से उनका पता पूछ रहे थे। *अपरिमित असीमित सामर्थ्य शक्ति  से अहंकार का एक खास रिश्ता हो जाता है। पर उनमें अंहकार छू तक नही गया था। यही वजह है कि  अपार शक्ति के बावजूद राम मनमाने फैसले नहीं लेते थे। वे लोकतांत्रिक हैं। सामूहिकता को समर्पित विधान की मर्यादा जानते हैं*। धर्म और व्यवहार की मर्यादा भी और परिवार का बंधन भी। *नर हो या वानर इन सबके प्रति वे अपने कर्तव्यबोध पर सजग रहते हैं। वे मानवीय करुणा जानते हैं। वे मानते हैं- परहित सरिस धर्म नहीं भाई।*



*राम* का अर्थ है *‘प्रकाश’*। किरण एवं आभा (कांति) जैसे शब्दों के मूल में राम है। *‘रा’ का अर्थ है आभा* और *‘म’ का अर्थ है मैं; मेरा और मैं स्वयं।* राम का अर्थ है मेरे भीतर प्रकाश, मेरे ह्रदय में प्रकाश। निश्चय ही ‘राम’ ईश्वर का नाम है,

राम शब्द में दो अर्थ व्यंजित हैं,*सुखद होना..! और ठहर जाना..!!*


*राम शब्द की व्युत्पत्ति* 


*राम शब्द* संस्कृत के दो धातुओं, *रम् और घम* से बना है। *रम् का अर्थ है रमना या निहित होना* और *घम का अर्थ है ब्रह्मांड का खाली स्थान।* इस प्रकार राम का अर्थ सकल ब्रह्मांड में निहित या रमा हुआ तत्व यानी चराचर में विराजमान स्वयं ब्रह्म। शास्त्रों में लिखा है, *“रमन्ते योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते”* अर्थात, *योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते हैं।* 

*'राम' ही मात्र एक ऐसे विषय हैं, जो योगियों की आध्यात्मिक-मानसिक भूख हैं, भोजन हैं, हर्ष, आनन्द और उल्लास के मूल स्त्रोत हैं।* 


*पुराण अनुसार राम नाम का अर्थ*

*ब्रह्मवैवर्त पुराण* को सबसे प्राचीनतम पुराण माना जाता हैं। राधा रानी कहती हैं -

*राशब्दो विश्ववचनो मश्चापीश्वरवाचक:।*

*विश्वानामीश्वरो यो हि तेन राम: प्रकीर्तत:।।*

*" रा " शब्द विश्ववाचक* है और *"म " शब्द ईश्वरवाचक* है, इसलिए जो *विश्व का ईश्वर* है , उसे *" राम "* कहा जाता है।


इसके अतिरिक्त *अग्नि पुराण , शिव पुराण , विष्णु पुराण, पद्म पुराण , स्कंद पुराण एवं भागवत पुराण आदि में राम जी की महिमा का वर्णन है ।*


*भगवान शिव पद्म पुराण में मां पार्वती जी से कहते हैं* -

*राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे।*

*सहस्रनाम तत्तुल्यं रामनाम वरानने।।*

सुमुखी ! मैं तो राम ! राम ! राम ! इस प्रकार जप करते हुए परम मनोहर श्री राम नाम में ही निरंतर रमण करता हूं । राम नाम संपूर्ण सहस्रनाम के समान है ।


*राम नाम का उपनिषदों में वर्णन*


प्रभु श्री राम के अनंत महिमा का वर्णन पुराणों के साथ साथ उपनिषदों में भी हैं। जैसे - *महोपनिषद , भिक्षुकोपनिषद , पैंगलोपनिषद , शांडिल्योपनिषद तथा योगशिखोपनिषद* । इतना ही नहीं, *प्रभु श्री राम के नाम से 2 उपनिषद (रामरहस्योपनिषद और श्रीरामपूर्वतापनीयोपनिषद)* का नाम भी राम नाम से प्रारंभ होता है

*रामरहस्योपनिषद* के अनुसार सभी पुराणों, शास्त्रों, चारों विद्याओं और आध्यात्मिक दर्शन का मूल तत्व प्रभु श्रीराम को माना गया है। इस नाम का प्रताप इतना विशाल हैं कि *आदि कवि महर्षि वाल्मीकि* जी उल्टा राम नाम (मरा- मरा) जप कर भी पवित्र हो गए।


*अपने मार्ग से भटका हुआ कोई क्लांत पथिक किसी सुरम्य स्थान को देखकर ठहर जाता है। उसी ठहराव का नाम राम है क्योंकि उसमें विराम है, आराम है, विश्राम है।*


*अभिवादन के समय राम नाम 2 बार क्यों बोलते हैं* 

*'राम-राम' शब्द* जब भी अभिवादन करते समय बोला जाता है तो हमेशा 2 बार बोला जाता है। इसके पीछे एक वैदिक दृष्टिकोण माना जाता है। वैदिक दृष्टिकोण के अनुसार *पूर्ण ब्रह्म का मात्रिक गुणांक 108 है।* वह राम-राम शब्द दो बार कहने से पूरा हो जाता है, क्योंकि *हिंदी वर्णमाला में ''र" 27वां अक्षर है।* *'आ' की मात्रा 2रा अक्षर और 'म' 25 वां अक्षर*, इसलिए सब मिलाकर जो योग बनता है वो है *27 + 2 + 25 = 54,* अर्थात *एक “राम” का योग 54* हुआ। और *2 बार राम राम कहने से 108* हो जाता है जो पूर्ण ब्रह्म का द्योतक है। जब भी हम कोई जाप करते हैं तो हमे 108 बार जाप करने के लिए कहा जाता है। 


*108 का वैज्ञानिक महत्व*

यहां हम अगर *वैज्ञानिक तथ्य की बात करें तो 108 मनके की माला और सूर्य की कलाओं का एक दूसरे से संबंध माना गया है।* वैज्ञानिक तथ्य के अनुसार *1 वर्ष में सूर्य 216000 कलाएं बदलता हैं।* इसमें वह 6 माह उत्तरायण रहता है और 6 माह दक्षिणायन रहता है। इस तरह से *6 माह में सूर्य की कलाएं 108000 बार बदलती हैं।* इसी तरह से अंत के *3 शून्य को अगर हटा दिया जाए तो 108 की संख्या बचती है।108 मनको को सूर्य की कलाओं का प्रतीक माना जाता है।* 


हमने सुखद ठहराव का अर्थ देने वाले जितने भी शब्द गढ़े सभी में *राम* अंतर्निहित है.

यथा,

*आराम..!*

*विराम..!*

*विश्राम..!*

*अभिराम..!*

*उपराम..!*

*ग्राम..!*

#जो *रमने* के लिए *विवश* कर दे वह *राम..!*

जीवन की आपाधापी में पड़ा *अशांत* मन जिस आनंददायक *गंतव्य* की सतत तलाश में है, वह गंतव्य है *राम..!*


भारतीय मन हर स्थिति में *राम* को साक्षी बनाने का आदी है।

👉दुःख में,

*हे राम..!*

👉पीड़ा में,

*हे राम..!*

👉लज्जा में,

*हाय राम..!*

👉अशुभ में,

*अरे राम राम..!*

👉अभिवादन में,

*राम राम..!*

👉शपथ में,

*रामदुहाई..!*

👉अज्ञानता में,

*राम जाने..!*

👉अनिश्चितता में,

*राम भरोसे..!*

👉अचूकता के लिए,

*रामबाण..!*

👉मृत्यु के लिए,

*रामनाम सत्य..!*

👉सुशासन के लिए,

*रामराज्य..!*


जैसी अभिव्यक्तियां पग-पग पर *राम* को साथ खड़ा करतीं हैं।

*राम* भी *इतने सरल हैं कि हर जगह खड़े हो जाते हैं। इसलिए  हर भारतीय उन पर अपना अधिकार मानता है।* 

👉जिसका कोई नहीं उसके लिए *राम हैं-*

*निर्बल के बल राम..!*

असंख्य बार देखी सुनी पढ़ी जा चुकी *रामकथा* का आकर्षण कभी नहीं खोता।

*राम पुनर्नवा हैं।*

हमारे भीतर जो कुछ भी अच्छा है, वह *राम* है। जो *शाश्वत* है, वह *राम* हैं।

*सब-कुछ लुट जाने के बाद जो बचा रह जाता है, वही तो राम है। घोर निराशा के बीच जो उठ खड़ा होता है, वह भी राम ही है।*

*सीमाओं के बीच छुपे असीम को देखना हो तो राम को देखिए..!!*

  


*सियाराम मय सब जग जानी।* 

*करहूँ प्रणाम जोरि जुग पानी।।*

Monday, March 27, 2023

बांगरू बाण

 *बांगरू बाण*

*श्रीपादावधूत की कलम से* 


**आइए आज जानते हैं ठाकुर, भंवर/भंवरी, तंवर/तंवरी, कुंवर, यह नाम नहीं उपाधियां है और यह किन को प्राप्त होती है।*


*राजस्थानी संस्कृति में राजपूतों को ठाकुर कहने की परंपरा है। लेकिन हमें यह नहीं पता कि ठाकुर कहते किसको है।*

*शोले का संजीव कुमार का कैरेक्टर ठाकुर सबको पता है इसीलिए हम सभी राजपूत भाइयों को ठाकुर कह देते हैं जो सही नहीं है।*

*ठाकुर यह वह पदवी है जो किसी पुत्र को तब मिलती है जब वह परिवार का मुखिया बनता है अर्थात जब उसके पिता का देहांत होता है और पिता के स्थान पर जब उसके पास मुखिया का पद आता है तब वह ठाकुर कहलाता है इसलिए कोई भी व्यक्ति ठाकुर कहलाना इसलिए पसंद नहीं करता क्योंकि इसके लिए उनके पिता का देहांत होना आवश्यक होता है और कोई भी बेटा अपने पिता का देहांत नहीं चाहता।* *इसलिए आगे से आप ठाकुर उसी व्यक्ति को कहिए जिसके पिता जीवित नहीं है और वह घर का मुखिया है।*

*इसी प्रकार एक नाम आपने भंवर सुना होगा। आपने कई लोगों के नाम भंवर या भंवरी सुना होगा यह भी एक तरह की पदवी है। जिस बच्चे के दादा जीवित होते हैं और वह बच्चा होता है तो उसका नामकरण भंवर अगर वह लड़का है और लड़की है तो भंवरी यह रखा जाता था।* 

*हां जी यह सुनकर आपको बड़ा अजीब लग सकता है कि दादा के जीवित रहते हर व्यक्ति का नाम भंवर या भंवरी रखना इसमें क्या औचित्य है। क्योंकि सामान्यतया हर बच्चे के जन्म के समय उसके दादा जीवित रहते ही हैं इसलिए यह तो एक सामान्य प्रक्रिया है इसी को आधार बनाया जाए तो लगभग 90 से 95% बच्चों का नाम भंवर या भंवरी होना चाहिए। लेकिन यह घटना है उस समय की है जब राजस्थान की राजपूताना कौम सदैव युद्ध में रत रहती थी और युद्ध में राजपूत वीरों का बलिदान होते ही रहता था इसलिए बहुत ही वीर और पराक्रम शाली राजपूत ही अपने जिंदा रहते दादा बन पाता था । अर्थात अपने आंखों से अपने पोते या पोती को देख पाता था। इसीलिए वह अपने पोते या पोती का नाम भंवर या भंवरी रखता था। भंवर या भंवरी यह नाम समाज में उस बच्चे को एक अलग से प्रतिष्ठा दिलाते थे कि वह कितना सौभाग्यशाली है कि उसके सर पर उसके दादा का आशीर्वाद अभी तक बना हुआ है।*

*इसी प्रकार तंवर या तंवरी यह नामकरण भी भंवर या भंवरी से ज्यादा श्रेष्ठ माना जाता था। क्योंकि तंवर या तंवरी यह नाम उस बालक या बालिका का रखा जाता था जिसके परदादा जीवित रहे हो जो अपने आप में बहुत ही रेयर ऑफ द रेयर अर्थात बहुत ही कम देखने को मिलता था। इसलिए तंवर नाम की श्रेष्ठता भंवर नाम से अधिक मानी गई है*

*बाकी आप सब लोग तो जानते ही हैं कुंवर यह उपाधि हर उस बालक को प्राप्त होती है जिनके पिताजी जीवित हैं।*

Thursday, February 3, 2022

Shrimant Bajirao Peshwa samadhi Raverkhedi

 *मध्य प्रदेश पर्यटन विभाग ने श्रीमंत बाजीराव पेशवा समाधि स्थल रावेर खेड़ी के पुनरुद्धार के कार्यों के टेंडर जारी कर दिए ।* 


 *पहला टेंडर 5 जनवरी 2022 को जारी किया गया था इस टेंडर में समाधि के आसपास के जीर्णोद्धार हेतु 782.48 लाख रुपए अर्थात (7 करोड़ 82 लाख 48 हजार रुपए) स्वीकृत किए गए थे। इसमें समाधि स्थल के पास घाट समाधि से रामेश्वर मंदिर तक पुल वृंदावन दरवाजे के पास एक बगीचा आदि अन्य निर्माण सम्मिलित हैं।*


*इसी प्रकार दूसरा टेंडर* 


*31 जनवरी 2022 को जारी किया गया इसमें श्रीमंत बाजीराव पेशवा समाधि स्थल के समीप म्यूजियम, टीएफसी यात्री निवास, जन सुविधाएं टॉयलेट बाथरूम आदि, सोविनियर शॉप, एक ऑडियो वीडियो के लिए सभागृह जिसकी क्षमता 250 लोगों के बैठने की होगी, और अन्य छोटे-मोटे निर्माण जिसमें रामेश्वर मंदिर का सौंदर्य करण व जीर्णोद्धार भी सम्मिलित है।* 

इस कार्य हेतु *शासन ने 800.91 लाख रुपए अर्थात 8 करोड़ 91 लाख रुपए स्वीकृत किए हैं।* 


*इस प्रकार दोनों टेंडर मिलाकर अब तक 1583.39 रुपए अर्थात 15 करोड़ 83 लाख 29 हजार रुपए स्वीकृत हो चुके हैं।* 


लाखों लाख श्रीमंत बाजीराव पेशवा के भक्तों और प्रेमियों की वर्षों पुरानी लंबित मांग को पूरा करने में निम्नलिखित महानुभावों का महत्वपूर्ण योगदान है। इसीलिए *समस्त श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रेमियों एवं श्रीमंत बाजीराव पेशवा स्मृति प्रतिष्ठान के समस्त कार्यकर्ताओं की तरफ से *धन्यवाद कोटि-कोटि आभार*


 *देश के गृह मंत्री श्री अमित भाई शाह* 


*नागरिक उड्डयन मंत्री श्रीमंत ज्योतिरादित्य सिंधिया* 


*राज्यसभा सांसद श्री विनय जी सहस्त्रबुद्धे*


*मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान* 


*पर्यटन मंत्री मध्यप्रदेश शासन श्री उषा दीदी ठाकुर*


*एवं समस्त श्रीमंत बाजीराव पेशवा प्रतिष्ठान के सदस्य गण।*


भवदीय


*संस्थापक एवं संरक्षक*


*श्रीपाद कुलकर्णी बांगर*


*श्रीमंत बाजीराव पेशवा स्मृति प्रतिष्ठान मध्य प्रदेश*